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दुनिया मेरे आगे: बाजार में दिवाली

विडंबना यह है कि जो विज्ञापन भावनात्मक चीजों, व्यवहारों को दिखा कर गाढ़ी कमाई कर रहे हैं, हम उनमें दिखाए जा रहे उत्पादों को तो झट से खरीदने का प्रयास करते हैं, लेकिन उसी विज्ञापन के संदेश को अपनाने का प्रयास नहीं करते।

Author November 6, 2018 2:08 AM
प्रतीकात्मक फोटो

प्रियंका गुप्ता

पिछले दो-ढाई दशकों के दौरान ही त्योहारों का रूप बदल-सा गया है और इसमें सबसे ज्यादा बदलाव दिवाली में दिखता है। मुझे याद है तब दिवाली का मतलब होता था घर के कोने-कोने की सफाई, साज-सज्जा, दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों से पूरी गर्मजोशी से मिलना, घर की बनी मिठाई का आदान-प्रदान, दिवाली पूजन, फूलझड़ियां और चकरी जैसी आतिशबाजी! लेकिन अब वह उल्लास, आनंद, हर्ष महसूस नहीं होता। अब साफ-सफाई की न तो जरूरत होती है और न वक्त। हम अपनी-अपनी दुनिया में इतने सिमट गए हैं कि पास-पड़ोस तो दूर, एक परिवार के चार लोग ही बमुश्किल एकत्र हो पाते हैं। आभासी दुनिया ने हमें इतना जकड़ लिया है कि हम परिवार के लोगों को अभिवादन और गले लगा कर त्योहारों की शुभकामनाएं देना तो भूल जाते हैं, लेकिन फेसबुक पर आभासी दुनिया के मित्रों को न जाने कितनी बार शुभकामनाएं प्रेषित करते रहते हैं।

बचपन के घनिष्ठ मित्रों को भी हम वाट्सऐप के एक औपचारिक संदेश से शुभकामनाएं भेज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। दिल दुखता है, जब देखती हूं कि दिवाली सिर्फ दिखावे का पर्याय बन गई है। पहले त्योहार एक ऐसा अवसर होते थे, जिनके बहाने हम अपने से कमजोर आर्थिक स्थिति वाले लोगों को उपहार और मिठाई देकर उनका मान-सम्मान बनाए रखने का प्रयास करते थे। लेकिन अब अपने से ऊंची हैसियत वाले लोगों को मिठाई और तोहफा देकर अपने संपर्क बढ़ाने की कोशिश में लगे रहते हैं। हर त्योहार बाजारवाद को बढ़ाने का जैसे माध्यम बन कर रह गया है। बाजार ने हमें हर चीज उपलब्ध करा दी है। हमारे पास चीजों की इतनी अधिकता है कि त्योहार के समय न तो नए वस्त्रों का चाव बचा और न घर पर मिठाई बनाने का।हम कृत्रिमता में सिर से पांव तक डूब गए हैं। मिट्टी के दीए की जगह कृत्रिम लाइटों ने ले ली है। जबकि गौर करें तो एक पंक्ति में रखे दीए और उनकी टिमटिमाती रोशनी ऐसी जान पड़ती हैं, मानो सोने के मोती बिखरे हुए हैं! ये इतने सुंदर दिखते हैं कि इनके सामने बाजार में मिलने वाली कृत्रिम रोशनियां कहीं नहीं ठहरतीं। लेकिन धीरे-धीरे हम प्रकृति से दूर ‘रेडीमेड त्योहारों’ की संस्कृति की ओर आगे बढ़ रहे हैं।

मुझे याद है कि बचपन के दिनों में मैं आटा, चावल, हल्दी, सिंदूर आदि इकट्ठा करके रंगोली बनाती थी। इसमें मैं उतनी पारंगत तो नहीं थी, लेकिन तीन-चार घंटों की मेहनत के बाद एक सुंदर और आकर्षक रंगोली बन कर तैयार होती थी। उसमें घर के सभी सदस्य अपने-अपने तरीके से योगदान करते थे। आज बाजार में बनी-बनाई रंगोलियां मिलती हैं, डिजाइन बनाने के सांचे मिलते हैं। इसमें कुछ बुराई तो नहीं, लेकिन हम रचनात्मकता से दूर होते जा रहे हैं। सच कहूं तो कभी-कभी लगता है कि दिवाली अमीरों के दिखावे का माध्यम हो गई है। अब दिवाली दिलवाली न रही, बल्कि नीरसता से भर गई है। इस त्योहार के कुछ दिन पहले ही लोगों के आवास दिवाली की लाइटों से पट जाते हैं। बाजारों में खूब चकाचौंध होती है, जिसकी रोशनी आह्लादित नहीं करती, बल्कि चुभती-सी है। दिवाली की रात पटाखों का अंधाधुंध शोर होता है, जिससे हमारे बुजुर्गों को बहुत परेशानी होती है। हवा में धुआं छोड़ते पटाखे दिवाली के तुरंत बाद पर्यावरण प्रदूषण के बढ़ते स्तर का कारण बनते हैं। दरअसल, हम तेज आवाज को जश्न मनाने का आधुनिक तरीका मानते हैं। फिर वह तेज आवाज पटाखों की हो या कानफोड़ू संगीत की। हम जमीन पर घूमती हुई चकरी पर कूदना तो जैसे भूल ही गए।

इस तरह की दिवाली के बाद पैदा हुए सन्नाटे और खालीपन को कभी आपने महसूस किया है? पहले हर उत्सव इतनी आत्मीयता और आनंद से भरे होते थे कि उनके गुजर जाने के बाद भी मिठास मन में घुली रहती थी। हाल ही में एक विज्ञापन देखा। ‘कैडबरी सैलिब्रेशंस’ के इस विज्ञापन में एक बुजुर्ग के घर के बाहर लगी नेम प्लेट पर ‘नो डिस्टरबेंस, नो स्ट्रेंजर्स’ लिखा देख कर भी नया पड़ोसी और युवा दंपति दरवाजे की घंटी बजा देता है। बुजुर्ग दरवाजा खोलने पर सामने खड़े अजनबियों को देख कर अपनी नेम प्लेट की ओर जैसे ही इशारा करते हैं, वह जोड़ा तपाक से चॉकलेट का डिब्बा उनको थमाते हुए बोल पड़ता है- ‘अंकल आपकी नेम प्लेट पर ‘नो मीठा’ तो नहीं लिखा न! हम आपके नए पड़ोसी हैं।’ बुजुर्ग चॉकलेट खाकर अपने बाल स्वरूप के साथ खिलखिलाने लगते हैं और अपने नए पड़ोसियों को अंदर आने के लिए कहते हैं। विडंबना यह है कि जो विज्ञापन भावनात्मक चीजों, व्यवहारों को दिखा कर गाढ़ी कमाई कर रहे हैं, हम उनमें दिखाए जा रहे उत्पादों को तो झट से खरीदने का प्रयास करते हैं, लेकिन उसी विज्ञापन के संदेश को अपनाने का प्रयास नहीं करते। क्यों न इस दिवाली पर हम फिर उस पुराने व्यवहार की ओर लौटें, आसपास के बुजुर्गों से खुद जाकर मिलें, उन्हें मिठाई दें, उनके साथ वक्त बिताएं। वैसे लोगों की दिवाली रोशन करें, जो थोड़े कम समर्थ हैं। अपने बच्चों को त्योहारों का असली मतलब सिखाएं।

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