duniya mere aage city of images - दुनिया मेरे आगेः छवियों में शहर - Jansatta
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दुनिया मेरे आगेः छवियों में शहर

दामोदर नदी के घाट और पाट बेहद उदास थे। शाम धुंधलाने लगी थी, लेकिन आसमान में कहीं-कहीं हलका प्रकाश छितराया हुआ था।

Author May 30, 2018 5:10 AM
रानीगंज रेलवे स्टेशन के मुख्य द्वार पर एक तरफ दीवार पर गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की चित्रकृति बनाई गई है।

सुधीर विद्यार्थी

उस दिन बंगाल के रानीगंज स्टेशन पर ट्रेन सुबह छह बजे पहुंच गई थी। कोलकाता यहां से एक सौ अस्सी किलोमीटर दूर है। उस समय सड़कें भीगी थीं। शायद थोड़ी देर पहले ही बरसात होकर थमी थी। आसमान गोया धुली हुई चादर की मानिंद हमारे ऊपर तना था। सुबह उठ कर हम रानीगंज के बाजार, सड़कों, गलियों और पुराने मकान को देखते हुए गुजर रहे थे तो वहीं कुछ खंडहर कभी बुलंद इमारत होने का सबूत दे रहे थे। सर्राफा की दुकानों पर दुकानदार भीतर लोहे के जाल के भीतर बैठे थे। ऐसा सुरक्षा की दृष्टि से किया गया है, लेकिन वहां कभी कोई लूटपाट की घटना नहीं हुई। चाय के एक खोखे पर ग्राहकों की भीड़ थी। सब खड़े होकर ही चाय पी रहे थे। बैठने की कोई व्यवस्था नहीं थी। चाय खूब स्वादिष्ट थी, लेकिन बहुत छोटे कुल्हड़ में सिर्फ दो घूंट। खोखे के ठीक पीछे एक बड़ा-सा कुआं था। किसी ने बताया कि यह पानी का नहीं, कोयला निकालने का पुराना कुआं है, जिस पर पेड़ और झाड़ उग आए हैं।

हम जिस इलाके में थे, उसे कोयलांचल कहा जाता है। वहां कोयला निकालने की खानें हैं। खनन अब नई आधुनिक तकनीक से होता है। एक श्रमिक नेता का कहना है कि अघोषित निजीकरण की प्रक्रिया के तहत आमरासोता कोलियरी का निजीकरण कराने का प्रयास हो रहा है। कोल व्यवसाय में दो तरह के कामगार हैं। एक वे जो काम करके बहुत लाभ ले रहे हैं और दूसरे जिनका प्रबंधन शोषण कर रहा है। जब इस उद्योग का राष्ट्रीयकरण हुआ तब उम्मीद की गई थी कि बिचौलिए कोयले के व्यापार से अलग हो जाएंगे। लेकिन अब तो जनसाधारण को कोयला दस-पंद्रह गुना अधिक कीमत पर मिल रहा है। कोयले जैसी आवश्यक वस्तु को ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955’ से अलग कर दिया गया है। कोयले की कमी से गांव वाले, लोहे का काम करने वाले और हलवाई आदि चोरी से कोयला बेचने वालों पर आश्रित हो गए हैं। कोयला खदानों में बिजली की आपूर्ति भी अब एक समस्या बन गई है जिससे प्रबंधन और मजदूर दोनों जूझ रहे हैं।

रानीगंज रेलवे स्टेशन के मुख्य द्वार पर एक तरफ दीवार पर गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की चित्रकृति बनाई गई है। बेहद आकर्षक कला का नमूना। हमने उसे देर तक निहारा। वहां हिंदी अखबार खूब बिक रहे थे। हम रानीगंज के उस विद्यालय में गए, जहां काजी नजरूल इस्लाम ने शिक्षा पाई थी। उन्होंने वहां 1913 से 1917 तक पढ़ाई की थी। वे अपने गांव चुरलिया से आते-जाते थे जो करीब चौदह किलोमीटर दूर है। भीतर प्रांगण में हरीतिमा के बीच नजरूल की सफेद आवक्ष प्रतिमा है। हम वहां ‘आमि विद्रोही चिर अशांत’ गुनगुना रहे थे। विद्यालय के खपरैलपोश कमरों की लाल छतें हरीतिमा के बीच बेहद सुंदर चित्रकृति रच रही थीं।

दामोदर नदी के घाट और पाट बेहद उदास थे। शाम धुंधलाने लगी थी, लेकिन आसमान में कहीं-कहीं हलका प्रकाश छितराया हुआ था। गोया किसी चितेरे ने अपनी तूलिका से नदी की धारा और उसके आसपास गहरा सुरमई रंग बिखेर दिया हो। चूंकि बरसात हुई थी, इसलिए मौसम में थोड़ी सिहरन थी। वृक्षों की टहनियां हवा में एक ओर झुक कर इस प्राकृतिक चित्रावली को और भी मोहक बना रही थीं। यह जगह नारायण कुड़ी कही जाती है। दामोदर घाट से दूसरी ओर बांकुड़ा जाने वाला लंबा रेलवे पुल दिखाई पड़ रहा था और नजदीक ही कोयला निकालने वाली पुरानी कोलियरी के अवशेष हमें अपनी कहानी बताने को बेताब थे। यह एक अंग्रेज और रवींद्रनाथ ठाकुर के परिवार की मिली-जुली कोयला खान थी- ‘कार ऐंड टैगोर कंपनी’। हम कुछ पल तक दामोदर घाट की सीढ़ियों पर खड़े होकर नदी के ठहरे-से बहाव को देखते और उसके जल को स्पर्श करते रहे। क्या यहां बैठ कर गुरुदेव से बातें की जा सकती हैं!

फिर हम शहर की ओर लौट कर एक बेहद तंग गली से गुजरते हुए जिस सीलन भरे घर के छोटे दालान में दाखिल हुए, वह यहां के बजुर्ग शायर रौनक नईम का घर है, जिसने कभी कहा था- ‘जो चिराग जल रहे हैं सरे-बज्म हल्के-हल्के, मेरा दाग दिल की लौ से कहीं रह न जाएं जल के।’ रौनक नईम का एक काव्य संकलन हिंदी में छपा था- ‘पानी बहता जाए’, लेकिन अब तो पानी पूरी तरह ठहर गया है। दामोदर नदी की गहराती शाम की जलधारा की मानिंद सब कुछ वहां धुंधलके और सन्नाटे में कैद था, जहां उदासियों को तोड़ना पत्थर दरकाने की तरह सख्त हो गया है। बाहर हलकी बारिश होने लगी थी। ऐसे में मुझे नईम साहब की एक गजल की कुछ पंक्तियां याद आर्इं- ‘उसकी यादों का नगर बारिश में/ छोड़ कर जाऊं किधर बारिश में।’ हमें वहां से भीगते हुए लौटना पड़ा।

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