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दुनिया मेरे आगे: संवाद के सेतु

अहं की मौजूदगी में होने वाले संवाद के तीन स्तर माने जा सकते हैं। पहला, जब बोलने वाले और सुनने वाले दोनों का अहं सक्रिय हो। दूसरा, जब बोलने वाले का अहं जागृत हो और सुनने वाले का नहीं। तीसरा, जब सुनने वाले का अहं सक्रिय हो और बोलने वाले का नहीं। और चौथा, जब दोनों का अहं सक्रिय नहीं हो।

Author Published on: July 8, 2020 1:12 AM
कॉलेज से लेकर घरों तक सोशल मीडिया ने हमारी सोशल लाइफ बदल दी है।

मेधा
जब डायरी के पुराने पन्ने पलटे जाते हैं, तो स्मृतियों के कई दृश्य चलचित्र की मानिंद आंखों के सामने तैर जाते हैं। वे मुश्किलों और कड़ी मेहनत के दिन थे, शायद इसीलिए बहुत रचनात्मक सक्रियता के भी दिन थे। श्रम और रचनात्मकता ही तो वे असली शृंगार हैं, जिनसे मनुष्य आनंद तक पहुंचता है। उन दिनों कॉलेज मेरे घर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर था और मैं सार्वजनिक वाहन से जाया करती थी। संघर्ष से सजे उन सुंदर दिनों के कुछ अनुभवों को मैंने अपनी डायरी में सुरक्षित कर लिया था। पिछले दिनों पुरानी डायरी से गुजरते हुए लगा कि संवाद के बारे में ये कुछ बातें जीवन के लिए जरूरी हैं।

कॉलेज जाते समय बस में एक नई शिक्षिका से मुलाकात हुई। वे हाल ही में तदर्थ सहायक प्राध्यापक के बतौर कॉलेज परिवार में शामिल हुई हैं। मैंने ही पहल की बात करने की। उनसे बात करते हुए एहसास हुआ कि शायद संवाद के अवसर ही कम होते जा रहे हैं। इसकी वजह मुझे यह लगती है कि हमने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा टीवी और फेसबुक, वॉट्सएप, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया के मंचों के नाम कर रखा है।

हमारी संवेदना और संवाद का कितना हिस्सा ये मंच खा रहे हैं, यह हमें भी पता नहीं। आभासी संसार में रहते-रहते हम वास्तविक संसार के लोगों के सान्निध्य को भूलते ही जा रहे हैं। बल्कि अब तो दो लोगों के बीच सहज संवाद एक दुर्लभ घटना बनती जा रही है। जीवन यंत्रवत हो चला है। टीवी और सोशल मीडिया से अगर थोड़ा समय बच जाए और समय की इन दो-चार बूंदों से हम संवाद की ठंडक पैदा भी करना चाहें तो कुछ रुकावटें आज के ‘आधुनिक मानस’ में अनायास ही उत्पन्न हो जाते हैं।

विडंबना यह है कि अक्सर ही इन रुकावटों से हम अनभिज्ञ रह जाते हैं और हमें लगता है कि हम सहज संवाद के चरण में प्रवेश कर चुके हैं और वक्त से चुराए गए चंद बूंद तोष के घनीभूत संवाद में तब्दील हो रहे हैं। लेकिन ऐसा अक्सर हो नहीं पाता। आखिर ऐसा क्यों नहीं संभव हो पाता है?

दरअसल, अक्सर ‘आधुनिक मनुष्य’ के लगभग सभी कार्य के केंद्र में किसी न किसी रूप में उसका अहं होता है। यह आधुनिकता जिसे व्यक्ति-संपन्न होना बताती है, उसमें अच्छा-खासा हिस्सा अहंकार का होता है। जब हम किसी से संवाद कर रहे होते हैं, तब भी हमारा अहं जाने-अनजाने जागृत रहता है। इससे दो व्यक्तियों के बीच होने वाले संवाद की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

अहं की मौजूदगी में होने वाले संवाद के तीन स्तर माने जा सकते हैं। पहला, जब बोलने वाले और सुनने वाले दोनों का अहं सक्रिय हो। दूसरा, जब बोलने वाले का अहं जागृत हो और सुनने वाले का नहीं। तीसरा, जब सुनने वाले का अहं सक्रिय हो और बोलने वाले का नहीं। और चौथा, जब दोनों का अहं सक्रिय नहीं हो।

पहली तीनों स्थितियों में संवाद का भ्रम तो होता है, लेकिन वास्तविक संवाद नहीं हो पाता। पहली स्थिति में बोलने वाला सामने वाले से कुछ बांटना नहीं चाहता। बल्कि अपने होने के महत्त्व का प्रदर्शन और स्थापन कर रहा होता है। ठीक उसी क्षण सुनने वाला भी कहीं न कहीं अपने मन में अपनी श्रेष्ठता के दावे को अपनी वाणी दे रहा होता है। और ऐसे में वास्तविक तौर पर न तो बोलने की घटना घटित होती है और न ही सुनने की। दोनों के बीच संबंध का कोई पुल ही नहीं बन पाता। दोनों ही अपने-अपने द्वीपों में कैद रह जाते हैं। हम अंदाजा लगा सकते हैं कि ऐसे में संवाद संभव हो सकेगा क्या!

दूसरी और तीसरी स्थिति में आंशिक रूप से संवाद होने की संभावना भर होती है। कहने वाला सहजता से कह देता है, पर दूसरा उसी भाव में सुन नहीं पाता। तीसरी स्थिति में सुनने वाला तो तैयार है, पर कहने वाला सहज नहीं है। वास्तविक संवाद तो चौथी स्थिति में ही संपन्न होता है, जब दोनों ही अहं से मुक्त होते हैं।

संवाद के इस संदर्भ में मुझे अचानक ही वियतनामी बौद्ध गुरु थिक नत हान की याद आ गई। वे प्रेमिल बात (लविंग स्पीच) और सजग श्रवण (माइंडफुल लिस्निंग) की बात करते हैं। ‘प्रेमिल बात’ और ‘सजग श्रवण’ की उनकी अवधारणा दरअसल अहं-शून्य संवाद की ही अवधारणा है। और ऐसा संभव हो सके, इसके लिए दो व्यक्तियों के बीच अनुकूल वातावरण होना पहली शर्त है।

जाहिर है, यह अनुकूल वातावरण आपस में विश्वास से बनता है। एक ठोस पुख्ता विश्वास कि मैं जो भी कहूंगा, उसके आधार पर कोई मुझे छोटा या बड़ा नहीं समझेगा। और कहते हैं कि जब दो व्यक्तियों के बीच ऐसा वातावरण पैदा हो जाता है और अहं-शून्य संवाद स्थापित हो जाता है, तो ऐसे संवाद से संवादकर्ता का सही मायने में विरेचन हो जाता है और कभी-कभी तो रूपांतरण जैसी बड़ी घटना भी घटित हो जाती है।

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