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दुनिया मेरे आगेः बाजार की मांग

करीब बीस या पच्चीस वर्ष पहले एक प्रकाशक ने अपने प्रकाशन का नाम बदल दिया था। सत्र की शुरुआत में एक सहायक के साथ किताबों के बंडल लिए हर संस्था में घूमा करता था। ‘स्पेसिमेन’ किताबें बांटा करता था। उस वक्तटेक्स्ट-बुक का चलन था। टेक्स्ट-बुक के साथ वह ‘क्यूबी’ की एक प्रति भी भेंट करता जाता था।

Author Published on: July 18, 2019 1:11 AM
कुछ बरस पहले एक स्थानीय प्रकाशक मेरे पास आया था। मुझसे उसने अपने विषय की किताब लिखने की गुजारिश की थी। उसके हाथ में विषयों की सूची थी। बोला- ‘नया-नया प्रकाशन है। इन विषयों में से आप अपना पसंदीदा विषय चुन लीजिए।’ मैंने एक-दो विषय उसे बताए थे। वह उत्साहित था। लेकिन उसके बाद उसने कहा कि टेक्स्ट बुक नहीं लिखना है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

हेमंत कुमार पारीक

दिल्ली के चांदनी चौक में घूम रहा था। पहले कभी यह प्रकाशकों से भरा साफ-सुथरा बाजार था। अब इतनी भीड़भाड़ हो गई है कि पैदल चलना मुश्किल होता है। ढूंढ़ते हुए उस प्रकाशक तक पहुंचा था। एक छोटी-सी किताबों की दुकान थी उसकी। मिलने की वजह यह थी कि उस प्रकाशन से मेरी पहली पुस्तक छपी थी। मैंने अपना परिचय दिया तो वे गद्गद हो गए। कारण यह था कि मैं पहली बार उनसे रू-ब-रू हो रहा था। हालांकि फोन पर बातें होती थीं। इधर-उधर की अनौपचारिक बातें करने के बाद मैंने अपनी पुस्तकों की बिक्री के विषय में पूछा तो वे निराश हो गए। बोले कि टेक्स्ट-बुक का बाजार अब खत्म-सा हो गया है। बस हम प्रकाशन का नाम चला रहे हैं। अब पहले वाली बात कहां, जब बाजार में कोई नई पुस्तक आते ही भीड़ लग जाया करती थी। अब इस इंटरनेट के जमाने में तो सब ऑनलाइन हो गया है। पुस्तकें भी ऑनलाइन आने लगी हैं। और तो और, टेक्स्ट-बुक का चलन ही खत्म हो रहा है। बच्चे एक रात में पढ़ कर पास होने वाली मानसिकता रखते हैं। ‘प्रश्न-पत्रों के बैंक’ यानी ‘क्यूबी’ को ढूंढ़ते फिरते हैं। उनके चेहरे पर उभर आई पीड़ा को मैं समझ रहा था। मैंने पूछा कि कुछ तो बिकी होंगी, तब उन्होंने बताया कि हां, इक्का-दुक्का बिक जाती हैं। पहले तो ऐसी ही किताबों के लिए स्कूल-कॉलेजों की ओर से ऑर्डर आते थे। अब सन्नाटा है। वे प्रकाशित पुस्तकों की तरफ इशारा करते हुए बोले कि देख लीजिए, थप्पियां लगी हैं… धूल चढ़ रही है। यह सब देख कर मैं भी निराश था। इतनी मेहनत से किताब लिखी और उसका खरीदार कोई नहीं!

कुछ बरस पहले एक स्थानीय प्रकाशक मेरे पास आया था। मुझसे उसने अपने विषय की किताब लिखने की गुजारिश की थी। उसके हाथ में विषयों की सूची थी। बोला- ‘नया-नया प्रकाशन है। इन विषयों में से आप अपना पसंदीदा विषय चुन लीजिए।’ मैंने एक-दो विषय उसे बताए थे। वह उत्साहित था। लेकिन उसके बाद उसने कहा कि टेक्स्ट बुक नहीं लिखना है। क्वेश्चन बैंक यानी प्रश्न-पत्रों का बैंक बनाना है। जब मैंने पूछा कि टेक्स्ट बुक क्यों नहीं तो उसने कहा- ‘बच्चे रेडीमेड चाहते हैं। इतना लंबा-चौड़ा कोई पढ़ना नहीं चाहता। कहते हैं कि समय की बर्बादी है।’ उसने प्रश्न-पत्रों का बंडल खोला और पुराने प्रश्न-पत्र निकालने लगा। मैंने उसे रोकते हुए कहा- ‘महोदय, यह काम मैं नहीं कर पाऊंगा। यह तो बच्चों को जहर देने जैसा है। अधूरा ज्ञान जहर के समान होता है।’ वह मुस्कुराया। बोला- ‘सर, मुझे अपनी दुकान चलानी है। हम बाजार की मांग के हिसाब से चलते हैं। अगर मैं भी आपकी तरह आदर्शवादी हो गया तो अगले दिन ही मुझे अपना प्रकाशन बंद करना पड़ेगा। आखिरकार उसने अपना सामान समेटा और वापस लौट गया।

समय तेजी से बदल रहा है। कभी कहीं ‘बायवा’ यानी मौखिक परीक्षा लेने जाता हूं तो निराशा हाथ लगती है। आठ-दस बच्चों में कोई एक ऐसा विद्यार्थी दिखता है, जिसे विषय का अधिकाधिक ज्ञान होता है। जबकि पहले इसके उलट होता था। आठ-दस विद्यार्थियों में से कोई एक ऐसा मिलता था, जिसे विषय का अल्प ज्ञान होता था। पहले टेक्स्ट-बुक लिए बच्चे दिखते थे। अब उनके हाथों में केवल दो चीजें होती हैं- एक क्वेश्चन बैंक और दूसरी मोबाइल! अधिकतर मोबाइल ही हाथों में दिखता है। आजकल किसी तरह परीक्षा पास कर लेना ही विद्यार्थियों का उद्देश्य बचा है।

करीब बीस या पच्चीस वर्ष पहले एक प्रकाशक ने अपने प्रकाशन का नाम बदल दिया था। सत्र की शुरुआत में एक सहायक के साथ किताबों के बंडल लिए हर संस्था में घूमा करता था। ‘स्पेसिमेन’ किताबें बांटा करता था। उस वक्तटेक्स्ट-बुक का चलन था। टेक्स्ट-बुक के साथ वह ‘क्यूबी’ की एक प्रति भी भेंट करता जाता था। शिक्षक ‘क्यूबी’ पर ध्यान नहीं देते थे। टेक्स्ट-बुक रख लेते और ‘क्यूबी’ लौटा देते थे। दरअसल, उसे हेय दृष्टि से देखा जाता था। मगर आश्चर्य हुआ कि टेक्स्ट बुक और चाक हाथ में लिए वे शिक्षक आजकल क्यूबी लेकर क्लास में जाते हैं। और क्यूबी की इतनी मांग बढ़ गई है कि प्रकाशन आॅर्डर की पूर्ति नहीं कर पाता। लगभग हर विषय की क्यूबी उसके प्रकाशन में उपलब्ध होती है। और तो और, सुन कर आश्चर्य हुआ कि मेडिकल साइंस में भी क्यूबी का चलन तेजी से बढ़ रहा है। खाज की तरह ‘क्यूबी’ संस्कृति पूरे देश में फैल रही है। किसी की किताब या पेपर से उद्धरण लेकर शोध पत्र लिख दिया जाता है। अगर शिक्षा का यही हाल रहा तो आखिर हम कहां जाएंगे… क्या हासिल कर पाएंगे? इस संदर्भ में एक उक्ति है- ‘जिन खोजा तिन पाईयां गहरे पानी पैठ…।’ टेक्स्ट बुक समुद्र की तरह गहरा ज्ञान लिए होती है और ‘क्वेश्चन बैंक’ का ज्ञान उथले पानी की तरह होता है।

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