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दुनिया मेरे आगे: रुचियों का पाठ

मैं जिन हालात में जी रहा था, उनमें वे बाल पत्रिकाएं मेरे लिए जीवन का आधार थीं। मैं उनके बिना अपना दिन-रात अधूरा समझता था। स्कूली किताबों के समांतर मैं उन्हीं में खोया रहता था। एक-एक शब्द ऐसे पढ़ता बारंबार, जैसे कोई प्यासा अपनी अतृप्त प्यास बुझा रहा हो।

Author Published on: July 16, 2020 1:25 AM
किताबें ज्ञान के साथ-साथ मन को शांति देने और कठिन हालात से निपटने की शक्ति भी देती हैं।

किताबों का अपना संसार है और अपना अनोखा आकर्षण। एक दिन बैठे-बैठे जब मैं किताबों से अपने प्रथम परिचय के संदर्भ में विचारों में डूब-उतरा रहा था तो वह सब स्मरण करके सुखद अनुभूति हुई। लगभग पांच-छह की वय का रहा होऊंगा, जब पहली किताब मेरे हाथ अनायास लगी थी। यह एक अखबार का दीपावली विशेषांक था। जैसा कि मैं कड़ियां जोड़ कर कह सकता हूं, जब मैं अक्षर ज्ञान से विहीन था, तब उस पहली किताब, जो धूल खाती अलमारी के ऊपर पड़ी थी, मेरे हाथ अनायास लगी थी। पहली ऐसी किताब, जिसे मैं चित्रों और कार्टून के माध्यम से ललक भाव से देखता, पढ़ने की कोशिश करता रहा। यह एक प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका थी, जो अपने कार्टून, मनोरंजक कथाओं के कारण जानी जाती है।

उस दौरान एक पत्रिका के ‘मोटू पतलू’ के अलावा अन्य पत्रिकाओं के ऐसे चरित्र आज भी आकर्षित करते हैं। उस दरमियान मेरी सात-आठ वर्ष की उम्र रही होगी। आसपास के सभी लोगों से अपनी सीमा के मुताबिक बोलना-बतियाना तो शुरू कर चुका था, लेकिन वह मेरे औपचारिक रूप से किताबी अक्षरों से वाकिफ होने का वक्त था। यह पत्रिका पलटते समय ही यह खयाल उठा कि क्या मेरा नाम भी कभी ऐसा रुपहला लगेगा, कभी किसी पत्रिका मे प्रकाशित होगा!

यह आकर्षण व्यामोह उस दिन ऐसा बंधा कि मैं धीरे-धीरे किताबों के संसार में डूबता-उतरता चला गया। हालांकि जाहिर है, तब वह आकर्षण अपने आसपास की स्कूली किताबों और मुहैया हो सकने वाली पत्रिकाओं तक सीमित था। तब परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि किताबें खरीद कर पढ़ सकता। इसलिए मैंने अपनी पारिवारिक परचून की दुकान पर जो रद्दी की किताबें, पत्रिकाएं, अखबार आते, उन्हीं से अपनी ज्ञान-क्षुधा को बुझाने का प्रयास शुरू कर दिया।

आज आश्चर्य होता है कि अपनी छोटी-सी वय में दुकान पर बैठे-बैठे रद्दी की किताबों के बरक्स मैं देश की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं से वाकिफ होता चला गया। मैं अपने नन्हें हाथों से नन्ही अंगुलियों में कलम पकड़ कर कुछ-कुछ लिखने की चेष्टा करने लगा। परिस्थितिवश ही सही, लेकिन याद करता हूं तो उन पत्र-पत्रिकाओं के जरिए मेरे सामने ज्ञान की नई खिड़कियां खुल रही थीं।

एक बाल पत्रिका में कहानी पढ़ी- ‘किताबी कीड़ा’ और मैं विहंस पड़ा। मुझे लगा कि यह तो मेरी ही कहानी है। बालपन में किताबें मेरा संसार थीं, बाल पत्रिकाएं परी और शैतान, राजा और मंत्री, राजकुमार, राजकुमारी की कहानियां मेरा अपना संसार बन गईं, जिनमें मैं डूबा रहता। आज पीछे लौट कर सोचता हूं तो बार-बार उन खयालों में डूब जाता हूं। एक कसक उठती है कि आह, वे भी क्या दिन थे और कैसा दौर था। अब समझता हूं कि वे रुपहले, सुनहरे अविस्मरणीय दिन फिर लौट कर नहीं आएंगे, मगर वे हसीन और प्रेरणादायक दिन थे।

दरअसल, मैं जिन हालात में जी रहा था, उनमें वे बाल पत्रिकाएं मेरे लिए जीवन का आधार थीं। मैं उनके बिना अपना दिन-रात अधूरा समझता था। स्कूली किताबों के समांतर मैं उन्हीं में खोया रहता था। एक-एक शब्द ऐसे पढ़ता बारंबार, जैसे कोई प्यासा अपनी अतृप्त प्यास बुझा रहा हो। आंखों के आगे सिर्फ किताबें थीं, वह चाहे फिर कैसी भी किताब हो। इसी क्रम में बाल उपन्यास और लुगदी साहित्य से मुलाकात हुई, आगे साहित्य से।

हो सकता है कि मेरी यह किताब-यात्रा किसी को निजी प्रसंग लग रही हो, लेकिन मेरे कहने का आशय यह कि कैसे और किन हालात में कोई बच्चा किताबों की दुनिया से रूबरू होता है और किस तरह उसके मानस में किताबें रचने-बसने लगती हैं। दरअसल, छोटी उम्र में स्कूली किताबों के बरक्स कहानियों या कॉमिक्स वाली किताबें जब हाथ लगती हैं तो बच्चों के सामने एक नई दुनिया खुलती है। बालमन वैसे भी कहानियों के सिरे और स्वाद के साथ ज्ञान के साथ जैसे एकाकार हो पाता है, उतना औपचारिक माध्यम में तैयार की गई किताबों के जरिए नहीं।

इसीलिए अक्सर शिक्षाविद् यह सलाह देते हैं कि औपचारिक शिक्षण के लिए तैयार की गई सामग्री में बाल-मनोविज्ञान का ध्यान रखा जाना चाहिए, ताकि बच्चों के दिमाग में वह सहज तरीके से उतरे और वे उसे बोझ न समझें। कई बार बहुत महत्त्वपूर्ण पाठ की नीरस प्रस्तुति बच्चों के लिए भारी पड़ जाती है और उसे समझना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। जबकि किसी कुशल और प्रशिक्षित शिक्षक की आकर्षक और रोमांचकारी प्रस्तुति की वजह से वही पाठ उन्हें खेल-खेल में समझ में आ जाता है। गतिविधि आधारित शिक्षा पद्धति बच्चों के लिए बेहद असरकारी माना गया है।

बहरहाल, आज अपनी स्थिति पर गौर करता हूं तो इस बात का अहसास होता है कि मेरे लिए पुस्तकों का माहात्म्य तब भी था और आज भी है। थोड़ा बड़ा होने पर एक कहानी पढ़ी थी, टालस्टाय की ‘शर्त’। दो मित्र शर्त खेलते हैं कि एकांत में रहना है और किताबें पढ़ना है, दुनिया से दूर। टालस्टाय की यह कहानी मेरे मनोभाव को एक नया मुकाम देकर चली गई।

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