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दुनिया मेरे आगे: वर्चस्व के विद्रूप

सबसे पहले और आखिरकार मानसिक स्तर पर दी गई स्वीकृति ही मनुष्य को व्यावहारिक स्वीकृति के लिए प्रेरित करती है। लेकिन अगर महिलाओं के अधिकारों की स्वीकृति ही मानसिक स्तर पर न हो तो उसे व्यावहारिक स्वीकृति में लाना बेहद मुश्किल होगा।

Author October 11, 2018 3:14 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

वंदना तिवारी

आज हम जिस समय और समाज में जी रहे हैं, वह रोज नए बदलावों को रेखांकित करता है। मानव सभ्यता के विकास की चतुर्दिक कहानी कहते बड़े-बड़े मल्टीप्लेक्स, शॉपिंग मॉल, पांच सितारा होटल, फ्लाइओवर आखिरकार मनुष्यता के आगे घुटने टेक देते हैं। कोई भी समाज प्रगतिशील होने का दावा तभी कर सकता है, जब वह स्त्री की गरिमा, सुरक्षा और सम्मान को लेकर सजग और जागरूक है। स्त्री किसी दूसरे ग्रह से नहीं आई है। वह अपने कर्तव्य और अधिकार को इसी समाज में जीना चाहती है। स्त्री को अलग करके उसे सुरक्षित और सम्माननीय नहीं बनाया जा सकता है। स्त्री और पुरुष प्रथमत: और अंतत: एक-दूसरे के पूरक हैं। लेकिन आज जब हम मेट्रो में महिलाओं के लिए अलग कोच देकर उनकी सुरक्षा और सुविधा का ध्यान रखते हैं, तब एक प्रश्न बार-बार उभरता है कि क्या महिलाएं सामूहिक जीवन से इतर हैं। यह गंभीर प्रश्न है, क्योंकि जब महिलाएं सामान्य कोच में जाती हैं तो उन्हें कहा जाता है कि आपको तो महिला कोच में सफर करना चाहिए था… आप यहां क्यों आ गर्इं! दरअसल, यह मानसिकता स्त्री-पुरुष के बीच विभाजन की पूर्वपीठिका है। क्या स्त्रियां पुरुषों के संग असुरक्षित हैं? क्या स्त्री अपनी सुरक्षा, सम्मान और दुविधा पुरुषों के संग नहीं खोज सकती?

आखिर हम कैसा समाज बना रहे हैं? किस तरह की संस्कृति विकसित कर रहे हैं? स्त्रीत्व का संकट पुरुषों से विलग क्यों है? साहचर्य और सहमति की भावनाएं कहां विलुप्त हो गई हैं? हम रोज ऐसी घटनाएं देखते-सुनते और झेलते हैं जो स्त्री की मान-मर्यादा को तार-तार करती हैं। इसी संदर्भ में एक घटना की मैं प्रत्यक्ष गवाह बनी। उस दिन घर की ओर जाते हुए रात में थोड़ी देर हो गई थी। मेट्रो में इतनी भीड़ थी कि दम घुटने लगा। इस बीच एक महिला का हाथ किसी पुरुष ने भीड़ या फिर अभद्र सोच के चलते दबा दिया। महिला ने जोर से आवाज लगाई, उसकी पुकार सभी सुन रहे थे, लेकिन किसी ने भी उसके लिए कुछ नहीं बोला। आखिर उस महिला ने उस व्यक्ति का हाथ पकड़ कर मरोड़ दिया। जैसे ही उस व्यक्ति ने चिल्लाना शुरू किया, महिला की आवाज बुलंद होती गई। उसने बेहद गुस्से से कहा कि कैसा लगा अब? इस पर बगल में खड़ा एक पुरुष टपका कि जब महिलाओं के लिए अलग से कोच है तो आप लोग इस कोच में आती ही क्यों हैं… आप को सिर्फ पुरुषों में खामियां दिखाने का मौका चाहिए। इस घटना ने मेरे मन में सवाल यह पैदा किया कि जब वह महिला दर्द से चीख रही थी, तब हमारी नैतिकता कहां चली गई थी? क्या दुख से निजता का रिश्ता तभी होता है, जब दुख खुद पर बीतता है? जब दुख दूसरे या किसी अन्य पर बीते तो अक्सर हम उस दर्द से दूरी का रिश्ता कायम करने की कोशिश करते हैं।

अक्सर हम आधुनिक होने का दावा करते हैं। लेकिन सवाल है कि क्या सिर्फ आधुनिक वस्तुओं के प्रयोग से हम आधुनिक हो जाएंगे? क्या आधुनिकता का सीधा संबंध हमारी सोच के साथ नहीं है? आज भी हम सामान्य कोच में पुरुषों के बीच महिलाओं की उपस्थिति को लेकर चिंतित क्यों हैं? क्या महिलाओं के लिए अलग कोच की व्यवस्था से उनके खिलाफ आपराधिक घटनाओं-यातनाओं को समाप्त किया जा सकता है? क्या महिलाओं की सुरक्षा केवल इस बात से सुनिश्चित की जा सकती है कि वे एक कोच तक सीमित रहें? क्या केवल एक कोच महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेगा और बाकी के कोच इस बात की खुली छूट देंगे कि महिलाएं अपने साथ हो रहे अनाचार और शोषण के लिए खुद ही जिम्मेदार होंगी? लैंगिक स्तर पर विभाजन कर देना ही समाधान होगा? इस बात को कौन सुनिश्चित करेगा कि महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार न हो? महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार की संभावनाएं साफतौर पर महिलाओं की स्वतंत्रता पर लगाम लगाता हैं।

पुरुषों द्वारा प्रश्न उठाना कि महिलाएं केवल महिला कोच तक सीमित रहें दरअसल पुरुषों का वर्चस्व और पुरुषसत्तात्मक सोच की संकीर्ण मानसिकता को दिखाता है। महिलाओं के सामान्य कोच में सवार होने पर उठे सवाल उनकी स्वतंत्रता और अस्मिता पर लगाम लगाने का कुरूप प्रयास हैं। यह उन तमाम महिलाओं को एक परिधि में बांधने की सोची-समझी राजनीति का हिस्सा है, जिसका निर्माता पुरुष समाज है। एक स्वस्थ और जिम्मेदार समाज की निर्मिति स्त्री-पुरुष के सहयोग, सद्भाव और मानवीय संबंध पर आधारित होती है। दुनिया की पूर्णता आधी दुनिया के बगैर संभव नहीं है। सबसे पहले और आखिरकार मानसिक स्तर पर दी गई स्वीकृति ही मनुष्य को व्यावहारिक स्वीकृति के लिए प्रेरित करती है। लेकिन अगर महिलाओं के अधिकारों की स्वीकृति ही मानसिक स्तर पर न हो तो उसे व्यावहारिक स्वीकृति में लाना बेहद मुश्किल होगा। मेट्रो से हम भौतिक रूप से आधुनिक तो हो सके हैं, लेकिन मानसिक स्तर पर आज भी पिछड़े हुए हैं। हमारी समाजीकरण की प्रक्रिया जब तक महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का सम्मान नहीं देगी, तब तक आधुनिकता केवल अर्थहीन शब्द बनी रहेगी।

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