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कितने मालिक

दुनिया भर में जिनके दस हजार मंदिर हैं, जिनकी सादगी, सहजता, सरलता और सौम्यता का जमाना कायल रहा है, उनके संदेशों, प्रतीकों की भाषा को बदला जा रहा है।

चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है

संतोष उत्सुक

माना जाता है कि सृष्टि के रचयिता ने मानव जीवन शुरू करने के लिए आदम और हव्वा को धरती पर भेजा। सेब जैसे स्वादिष्ट फल का स्वाद उन्होंने लिया और उसके बाद जितने भी आदम और हव्वा पैदा हुए उन्होंने प्रजनन की समृद्ध परंपरा का पीछा नहीं छोड़ा। अब हाल यह है कि उससे आगे चलते हुए मनुष्य की जनसंख्या ज्यों-ज्यों बढ़ती रही, इंसान ने गोत्र से शुरू कर स्थिति, शौक व इच्छाओं के अनुरूप अपने-अपने समूहों का स्थापन और विस्तार किया। शक्तिशाली धनवान व्यक्ति समूह का मालिक बनता गया। जहां तक विश्वास की बात है, हमेशा यही माना जाता रहा कि सबका मालिक एक है।

शायद इसका आशय ‘नीली छतरी वाले मालिक’ से रहा होगा। लेकिन यह सोच अंदरखाने में निरंतर बदलती भी रही। सामाजिक और आर्थिक बदलाव और विकास के कारण विश्वास के वृक्ष की शाखाएं फैलती रहीं और उनमें उगी असंतुष्टि ने नए धर्म, विश्वास, मत और आस्थाएं पैदा कीं। हर आंगन से यही प्राचीन प्रवचन बार-बार दोहराया जाता रहा कि सबका मालिक एक है। बड़े धर्म की बैठकों में जब काफी लोगों को परायापन और उपेक्षा मिली तो औपचारिकताएं कम करने के लिए सादगी, सरलता, सहजता और समानता लाने के लिए नए संप्रदाय पैदा हुए। इन नए समूहों में लाखों लोग जुड़े। यहां स्पष्ट कह सकते हैं कि नए मालिक बनने लगे। ताकत धन बटोरती है और धन ताकत खरीदता है। नए मत जब संप्रदायों से लेकर डेरों में परिवर्तित होने लगे तो धन प्रधान होते गए। कहा जा सकता है कि धीरे-धीरे धन उनका मालिक हो गया। यह समूह शक्ति केंद्रित होते गए। ठीक इसी मोड़ पर राजनीति का प्रवेश हुआ, जिसने इन मालिकों को ज्यादा ताकतवर और प्रभावशाली होने का अवसर दिया। राजनेताओं, मंत्रियों ने इन्हें संभालना शुरू किया। ठीक समांतर शैली में इन समूहों ने राजनीति को संभालना और आश्रय देना शुरू किया। पहले भगवान को एक ही माना जाता था, अब ‘भगवान’ भी अनेक हो गए। हमारे यहां तो पहले से ही तैंतीस करोड़ देवी देवता हैं। इन तथाकथित भगवानों ने खुद को स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और हो भी गए! धर्म के तालाब में राजनीति ने अपनी बढ़िया पैठ बना कर काफी गाद इकट्ठी कर दी। शासक अपनी जरूरत और अवसर के हिसाब से समाज और जनता को धकियाने का प्रयास करते रहे और सफल भी रहे, क्योंकि उनके पास शक्ति और धन के हथियार होते हैं।

यह भी स्वाभाविक है कि समाज में जिस धर्म, मत और संप्रदाय के ज्यादा लोग हैं, उनके नियंत्रक और संचालक अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए दूसरे धर्म, मत और संप्रदाय के लोगों को नकारना शुरू कर देते हैं। हमारा देश और समाज भी इस परिवर्तन से अछूता नहीं है। हिंदू धर्म में ही दर्जनों डेरे हैं जो कहते रहते हैं कि सबका मालिक एक है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह मालिकाना हक छोटी-छोटी रियासतों में बंटा हुआ है। ये छोटे ‘मालिक’ राग तो पीर-पैगंबरों या इतिहास पुरुषों वाला अलापते हैं, लेकिन सत्ताधारियों की गोद में बैठे रहने से इन्हें कोई परहेज नहीं होता।दरअसल, ये लोग समाज की एकजुटता को खारिज करते रहते हैं, ताकि इनका शासन चलता रहे। पिछले लगभग डेढ़ सौ बरसों से एक फकीर की स्मृति में सद्भाव, समानता और एकजुटता की जो परंपरा चल रही थी, अब कुछ शक्तियां उन्हें भी अपने रंग में रंग रही हैं। दुनिया भर में जिनके दस हजार मंदिर हैं, जिनकी सादगी, सहजता, सरलता और सौम्यता का जमाना कायल रहा है, उनके संदेशों, प्रतीकों की भाषा को बदला जा रहा है। जो सर्वधर्म के प्रतीक रहे, जिनके पास हिंदू मुसलिम भक्त समान रूप से आशीर्वाद लेने और मुसीबतों से छुटकारे की उम्मीद में जाते रहे। उनकी आस्था और विश्वास के रंग हटाए जा रहे हैं। जिन लोगों पर यह दायित्व है कि उनके सिद्धांतों को स्थापित रखें, वही उनके साथ विश्वासघात कर रहे हैं, क्योंकि वर्तमान शक्तिशाली राजनीति ने उन्हें अपने रंग में ढाल दिया है।

राजनीति अपने नए रंग भरने के साथ ऐतिहासिक रंगों को बदरंग करने का काम भी करती है। राजनीति डंके की चोट पर कहती है कि उसने सब बदरंग कर दिया। समझने की बात यह है कि सीने में कहीं न कहीं आग सलामत रहती है। राम और रहीम को एक ही माना जाता रहा है, लेकिन व्यक्ति वे दो हैं। क्या यह वही बात नहीं हुई जब हम देश की विविधता को खूबसूरती मानते हुए कहते हैं कि ‘हम सब एक हैं’, लेकिन वास्तव में इतनी विविधता के कारण अनेक हैं हम। आज जब पहचान से पहचान लड़ रही है, इसीलिए सभी मालिकों को अलग-अलग किया जा रहा है। जो बाबा हमेशा फक्कड़ फकीर रहे, जिन्होंने सच्चा फकीर होने का मानवीय कल्याण का कर्तव्य निभाते हुए कभी धर्म की राजनीति नहीं की, उन्हें राजनीति में घसीटा जा रहा है। ऐसा करना समाज के लिए सकारात्मक तो नहीं कहा जा सकता।

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