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दुनिया मेरे आगे: जीवन अनमोल

युवाओं को सपने देखने की आदत होती है। जब वे टूट जाते हैं तो उनकी दिशा भटक सकती है। राजेंद्र प्रसाद का लेख।

Author September 26, 2016 04:40 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

राजेंद्र प्रसाद

आज समाज और देश के सामने सबसे बड़े यक्ष-प्रश्न ये हैं कि हमारी युवा पीढ़ी कैसी हो, उसकी चाल-चलन कैसा हो, उसके जेहन में बसे सपने कैसे हों और काम करने का ढंग कैसा हो। किसी भी देश या समाज के चरित्र के बारे में पता करना हो तो उसका सबसे बड़ा जरिया युवा-पीढ़ी का आचरण है। युवाओं का मन बहुत चंचल होता है। इसे गलत रास्ते पर ले जाना हो तो कुछ नहीं करना होता। इसलिए जरूरी है कि पूरे दिन क्या गलत और क्या सही किया, इस पर विचार करने की आदत हमारी युवा पीढ़ी को डालनी चाहिए। असली सुंदरता केवल बाहरी दिखावे-पहनावे में नहीं, बल्कि अच्छे व्यवहार और विचारों में बसती है। खेद है कि तेजी से बदलते परिवर्तन चक्र में युवकों में व्यापक व्यक्तित्व-विकास की भावना छूट-सी गई है। उथल-पुथल के काल में उसका लक्ष्य उपाधि या परिणाम हासिल करने तक सिमट गया है। दूसरी तरफ दिक्कत यह भी आ रही है कि समाज शिक्षक को आज भी अन्य वर्गों की तुलना में जिस सम्मान से देखता है और यह उम्मीद करता है कि वह युवाओं को मांजने का काम करे, वह विफल हो रहा है।

यह सही है कि युवाओं को सपने देखने की आदत होती है। जब वे टूट जाते हैं तो उनकी दिशा भटक सकती है। यह बेवजह नहीं है कि समाज में फैले अपराध, खासकर साइबर अपराध, हिंसा, भ्रष्टाचार और खतरनाक नशे के जाल में जाने-अनजाने काफी युवा लिप्त हो रहे हैं। नशे की बढ़ती प्रवृत्ति ने हत्या और बलात्कार जैसे संगीन अपराधों में इजाफा किया है। शराब की बिक्री से होने वाली आमदनी के लालच में सरकार और नशे के व्यापारी बेपरवाह बने हुए हैं। सिनेमा और समाज का परंपरागत संबंध है। विडंबना यह है कि सिनेमा और टीवी धारावाहिकों में मादक पदार्थों का प्रदर्शन अब आम हो चुका है। एक कड़वा सच यह भी है कि अधिकतर युवा अपने सामने वाले का सम्मान करना भूल-से गए हैं। आम बोलचाल की भाषा में गाली जैसे घुल-मिल गई है। दहेज प्रथा, स्वच्छंदता, फूहड़पन, अनुशासनहीनता और महिलाओं के खिलाफ अपराध में उनकी बढ़ती दिलचस्पी यह सोचने को मजबूर कर रही है कि देश का भविष्य आखिर क्या होगा, क्योंकि देश की बागडोर इन्हीं को संभालनी है। दुखद है कि सफलता के मौजूदा मापदंड पर अगर खरे नहीं उतरे, तो युवाओं के लिए सबसे आसान रास्ता है विकृति के रास्ते पर निकल पड़ना। सहनशीलता और धैर्य की कमी चारों तरफ दिखाई देती है। बात-बात पर जान लेने और देने के समाचार सुनने को मिलते हैं।

सोचने वाली बात है कि आखिर क्यों युवा पीढ़ी जिंदगी को इतनी आसानी से खंडित करना चाहती है? क्या जीवन का उनकी नजर में कोई मोल नहीं है? परिवार की ध्वस्त होती अवधारणा, अनाथ माता-पिता, फ्लैटों में सिकुड़ते-घुमड़ते परिवार, प्यार के लिए तरसते बच्चे, अपनों के बजाय दूसरों के सहारे अंगड़ाई लेती नई पीढ़ी हमें क्या संदेश दे रही है? क्या उसकी गूंज सुनने की हमें जरूरत नहीं है? इस जमाने ने नई पीढ़ी को अकेला होते और पुरानी पीढ़ी वालों को अकेला किए जाते भी देखा है। एक मुश्किल सवाल है कि जीवन का सही रास्ता क्या हो! युवा पीढ़ी अनुभवहीन है। रास्ता बनाने के लिए दो चीजों की जरूरत है- अनुभव और शक्ति की। अनुभव हमारे बड़ों के पास है और शक्ति युवाओं के पास। अगर उन दोनों के बीच कोई तालमेल नहीं होगा, तो रास्ता बनेगा कैसे? लेकिन पुरानी पीढ़ी केवल निंदा करने में लगी है कि सब बिगड़ गए हैं।

तेजी से बदलते आर्थिक और सामाजिक परिवेश का चक्र तेजी से घूम रहा है। आज का समय बीते तमाम मुश्किल दौरों से कहीं अधिक कठिन है, जहां मनुष्य परंपराओं, आचरण और जीवन संघर्षों के बीच घिरा है। इसलिए समाज में ऐसे रोल मॉडलों की जरूरत है, जो युवा पीढ़ी को सकारात्मक और बेहतर रास्ता दिखा सकें। यह कहना भी सही नहीं है कि सारे युवा पथभ्रष्ट हैं। ऐसे वातावरण में भी आशा की किरणों की कमी नहीं है। समस्या केवल इतनी है कि युवाशक्ति को बिगड़ने से किस तरह बचाया जाए! जिस तरह देश में तरक्की हो रही है, उसी तरह नए-नए विचारों की शृंखला युवाओं के दिमाग में करवट ले रही है। युवाओं के बल पर हमने बहुत-सी उपलब्धियां हासिल की हैं। युवाओं से सही परिणाम चाहिए तो उन्हें सही राह पर चलने की जरूरत है। उनकी ऊर्जा और प्रतिभा सार्थक काम में लगनी चाहिए। जीवन एक बार ही मिलता है और यह अनमोल है। उसे यों ही नहेीं बीतने नहीं देना चाहिए।

 

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