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दुनिया मेरे आगे: तैयारी के मोर्चे

हम सब जब भी ‘होमवर्क’ शब्द सुनते हैं तो स्कूल के दिन याद आ जाते हैं। स्कूल में अध्यापक के सहयोग के बाद दिया हुआ वह अभ्यास-कार्य जो हमें अपने बलबूते घर पर पूरा करके अगले दिन कक्षा में ले जाना होता था।

Author May 5, 2018 4:01 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सांकेतिक तौर पर किया गया है।

एकता कानूनगो बक्षी

हम सब जब भी ‘होमवर्क’ शब्द सुनते हैं तो स्कूल के दिन याद आ जाते हैं। स्कूल में अध्यापक के सहयोग के बाद दिया हुआ वह अभ्यास-कार्य जो हमें अपने बलबूते घर पर पूरा करके अगले दिन कक्षा में ले जाना होता था। अपना काम हम किस तरह पूरा करते हैं और यह कितना अच्छा होगा, यह इस बात पर निर्भर करता था कि पढ़ाई के समय हमारी कक्षा में मानसिक उपस्थिति और शिक्षक के कहे को सुनने-समझने में रुचि और एकाग्रता है या नहीं।

हर दिन अभ्यास और एकाग्रता से पढ़ाई करने के बाद उस श्रम की परीक्षा की घड़ी जब आती है, तब होनहार विद्यार्थी के भी पसीने छूट जाते हैं और वह आत्म अवलोकन के लिए मजबूर हो जाता है। लेकिन ऐसे समय में विद्यार्थी को जरा भी नहीं घबराना चाहिए। अच्छे अंक लाना जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि हर विषय पर विशेषज्ञ की तरह पकड़ हो। मात्र दो-तीन घंटे के प्रदर्शन में हमें खुद को और दूसरों को बिल्कुल नहीं आंकना चाहिए। पूरी तैयारी के साथ परीक्षा कक्ष में विवेक और धैर्य के साथ उतरना ही सफलता की ओर पहला कदम है। फिर वह परीक्षा जीवन की ही क्यों न हो! कई विचारकों ने कहा भी है कि हम सब अपनी काबिलियत और कमियों के बावजूद प्रकृति की खूबसूरत रचना होते हैं। यह भी सच है कि अगर हम जीवन और आचरण को लगातार निखारते और संवारते रहें तो इस कृति को और बेहतर बनाते चले जाते हैं। जरूरत है, पूरी निष्ठा और ईमानदारी से की जाने वाली कोशिश की।

परीक्षाओं के बाद रिजल्ट की घोषणा के साथ विद्यार्थियों की साल भर की मेहनत रंग बिखेरने लगती है। अपनी लगन और मेहनत के नतीजे में हर क्षेत्र में नित-नई प्रतिभाओं का उदय और विकास देखने को मिलने लगता है। कुशल इंजीनियर, चिकित्सक, चार्टर्ड एकाउंटेंट और प्रबंधकों के साथ-साथ साहित्य, संस्कृति और कला क्षेत्र में भी कोई नया गायक, लेखक, चित्रकार, फोटोग्राफर, अभिनेता, मॉडल जैसी प्रतिभाएं प्रकट होने लगती हैं। देखते ही देखते उनके हुनर का डंका देश-दुनिया में प्रतिध्वनित होने लगता है। अब सोशल मीडिया भी प्रतिभा प्रोत्साहन का एक बेहतरीन मंच बन गया है। अगर इसका विवेकपूर्ण इस्तेमाल किया जाए तो अपनी योग्यताओं, क्षमताओं का सार्थक प्रस्तुतीकरण यहां किया जा सकता है। लोगों की अच्छी-बुरी प्रतिक्रिया उपलब्धि का मिष्ठान्न तो चखाती ही है, निखरने और अपनी गलतियां सुधारने का मौका भी देती है।

मगर यहां एक बड़ा सवाल गुणवत्ता का आता है कि जो हम दूसरों के सामने पेश कर रहे हैं, क्या उस पर हमने पर्याप्त मेहनत की है या क्या वह इस लायक है! क्या हमने खुद उसका अवलोकन पूरी तरह आलोचनात्मक दृष्टि से किया है? हमारे ‘होम वर्क’ में कुछ कमी तो नहीं रह गई है? बहुत-सी प्रतिभाओं की प्रस्तुति देख कर उनकी साधना और लगन की खुशबू अपने आप ही आ जाती है। उनका ‘होमवर्क’ उनके सिर का ताज बन जाता है। दरअसल, सोशल मीडिया पर एकाएक उभर कर आई प्रतिभाएं जरूरी नहीं है कि सचमुच बहुत मेहनत के बाद सामने आई हों। बिना अभ्यास और मेहनत के ये तुरंता सितारे दूसरों के साथ खुद के साथ भी गलत करते हैं।

मुझे याद आता है कि बचपन से ही हमें अक्सर यह बताया जाता है कि बिना मेहनत के कुछ नहीं मिल सकता। इसलिए खुद को धोखा देने से हमें बचना चाहिए और हमारे कौशल को पहले खुद जीभर कर जी लेना चाहिए। जब हम खुद को संतुष्ट कर पाते हैं वह खुशी सोशल मीडिया के सैकड़ों लाइक और औपचारिक बधाइयों से कहीं बढ़ कर होती है। अपने आपको, अपनी क्षमताओं को स्वीकार करना और खुद की मदद करना संतुष्टि का भाव लेकर आता है।

सोशल मीडिया की हड़बड़ी का हिस्सा बनने से बचा जाना चाहिए। खुद को साबित करने की हड़बड़ी सोशल मीडिया से निकल कर हमारे असल जीवन को भी बुरी तरह प्रभावित करती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि युवाओं में दुख और अवसाद बढ़ने का एक कारण यह भी है। हमारा लक्ष्य केवल दूसरों को अपनी श्रेष्ठता दिखाना ही नहीं होना चाहिए। एक सीमा तक तो ठीक है कि सबके साथ अपनी बात साझा करने में खुशी मिलती है, लेकिन इस बीच हमें अपने दीर्घजीवी और स्थायी आनंद को नहीं भूलना चाहिए।

खुद के वास्तविक विकास पर हमें पूरा समय देना चाहिए। जीवन में अनुशासन लाकर हम हर लक्ष्य को पा सकते हैं और वह शोहरत भी क्या, जो बिना मेहनत के हमें मिल जाए। इस मामले में एक ही सूत्र सामने है- आभासी दुनिया का जीवन हो या सच्चा संसार, दोनों जगह सफलता के लिए पर्याप्त और गंभीरता से ‘होमवर्क’ करना जरूरी होगा।

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