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दुनिया मेरे आगे: सीखने का सौंदर्य

सुबह-सुबह सड़क पर दौड़ती स्कूल बस से उतरते बच्चे जब अपने बस्ते और टिफिन के बोझ को संभालते नन्हें कदमों से स्कूल की ओर भागते हुए दिखते हैं तो उनके चेहरे पर सीखने की प्रक्रिया का बोझिल स्वभाव झलकता है।

Author May 31, 2018 4:49 AM
क्लास में बैठकर पढ़ते बच्चे। (प्रतिकात्मक तस्वीर)

दीना नाथ मौर्य

सुबह-सुबह सड़क पर दौड़ती स्कूल बस से उतरते बच्चे जब अपने बस्ते और टिफिन के बोझ को संभालते नन्हें कदमों से स्कूल की ओर भागते हुए दिखते हैं तो उनके चेहरे पर सीखने की प्रक्रिया का बोझिल स्वभाव झलकता है। स्कूल जाते नर्सरी के बच्चे जब किताबों का ढेर ढोते नजर आते हैं तो सीखने की मौखिक प्रविधि के साथ चीजों को सिखा देने की वह परंपरा याद आती है। शुरुआत में अध्यापक भी हमारी अपनी ही जुबान में बात करते थे। वे किसी भी विषय को ऐसी भाषा में समझाते थे कि हम उसमें आनंद लेना शुरू कर देते थे। बुनियादी तालीम में स्कूल बच्चों को अच्छा लगे, उसके लिए जरूरी है कि विद्यालय जाने के अपने शुरुआती दिनों में भाषाई रूप में उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाए जिसमें उनके लिए ‘जीने की भाषा’ और ‘जानने की भाषा’ का कोई अंतर न रह जाए।

जिज्ञासा के बगैर चिंतन संभव नहीं हो सकता। यह किस्सों और कहानियों की दुनिया से बखूबी हमने जाना है। अपने अनुभव से कह सकता हूं कि गांव-घर में कहानी को कहने और सुनने के अनेक संदर्भ और स्थितियां होती हैं। बचपन में सुनी गई कहानियों को याद करें तो जेहन में वे स्थितियां साफ तौर पर अपनी जगह बनाए हुए हैं, जिनमें हमने अलाव के आगे ठंडक की रात को सुबह के भिनसारे में बदलते देखा है। न तो कहानी सुनाने वाले को नींद आती थी और न ही हम सो पाते थे। हम बच्चे थे। हमें अपने जीवन से भिन्न स्थितियों में जीते-जागते मनुष्यों, पशु-पक्षियों की दुनिया खूब लुभाती थी। हमें ‘कहानी’ के बारे में नहीं पता था। हम इसे किस्सा कहते थे और इनके बीच में आने वाले गीत भी हमने कोरस के साथ गुनगुनाए हैं।

भाषा का यह हमारा पहला स्कूल था, जिसमें हम सब किस्सों को सुनते और बुनते हैं। इसमें कहानी को सुनाने वाले की शैली बहुत महत्त्व की होती थी। एक ही कहानी को हम किसी व्यक्ति विशेष से ही बार-बार सुनना चाहते थे। कहानी सुनाने वाले की भी अपनी शर्त होती थी- ‘ध्यान से सुनना’ और फिर ‘क्या हुआ’ की हुंकारी! यह एक शैली थी जो समाज ने अपने अनुभवों से अर्जित की थी। शिक्षा की भाषा में कहें तो यह एक तरह से शिक्षण-शास्त्रीय पद्धति थी, जिसके जरिए सहज रूप में ज्ञान और अनुभव पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते थे। हम पूरी चेतना के साथ कहानियों से जुड़ते थे। यही चीज बाद में हमारी भाषा सीखने में आधार बनी और पढ़ने के कौशल भी हमने इस तरह के सूत्रों के सहारे सीखे। टुकड़ों में सुनना, पढ़ना और फिर उसे पूरेपन के साथ समझना- यह एक प्रक्रिया के रूप में हमें मिला।

लेकिन इसका एक हास्यास्पद प्रसंग मेरे साथ जुड़ गया। पढ़ने का अभी-अभी शौक ही चढ़ा था कि मेरे हाथ ‘अकबर बीरबल विनोद’ पुस्तक आ गई। पढ़ने की रफ्तार धीमी थी। मकई के खेत की मचान पर मैंने उस किताब को छिपा रखा था। अचानक एक दिन मचान में लगी आग के साथ वह किताब भी जल गई। मैंने किताब के अधिकतर हिस्से पढ़ लिए थे। अब तक अकबर और बीरबल के चरित्र तो आए थे, लेकिन विनोद का जिक्र अभी नहीं आया था। मैंने इस किताब की दूसरी प्रति खरीद कर पढ़ी, पर विनोद उसमें भी नहीं मिला। आग में जल गई वह किताब मुझे काफी दिनों तक याद आती रही, इस बालसुलभ जिज्ञासा के साथ कि शायद जो प्रति जल गई, उसमें जरूर विनोद रहा होगा। बाद में जब यह पता चला कि ‘विनोद’ का मतलब हास-परिहास होता है तो हंसी आई।

अब समझ में आता है कि भाषा को बरतने में विवरण का जितना महत्त्व होता है, उससे कम महत्त्व कहानी कहने वाले का नहीं होता है। श्रोता की एकाग्रता और जिज्ञासा कहानी कहने वाले की अभिव्यक्ति शैली की जमीन तैयार करती है। जिस तरह देखने का मसला सिर्फ आंख तक सीमित नहीं होता, उसी तरह कहानी को सुनने का मसला कान तक सीमित नहीं है। एक ही कहानी या घटना के साक्षी दो व्यक्तियों के अनुभव उस घटना या कहानी के संबंध में अलग कैसे हो जाते हैं! इसमें किस्सागोई के अंदाज बहुत ही महत्त्वपूर्ण होते हैं। कक्षा में कहानी सुनाते समय इसका खयाल रखना जरूरी होता है।
आज जब स्कूलों में पाठ्यक्रम का बोझ बच्चों और अभिभावकों के लिए समस्या बनता जा रहा है तो पढ़ने-सीखने की इस तरह की मौखिक और कारगर प्रविधियां अपनी सार्थकता सिद्ध करती हैं।

अपने शुरुआती दिनों में अपने परिवेश और माहौल की कहानियां पाकर बच्चे अपने अनुभवों को साझा करने के कौशल की ओर अग्रसर होते हैं। उनके अनुभवों को कक्षा में स्थान देकर हम दरअसल उनकी अपनी दुनिया को स्कूल में जगह दे रहे होते हैं। स्कूल के साथ उसका अपनेपन का भाव पैदा करने में भी भाषा की कक्षा की यह कोशिश काफी कारगर होती है। बच्चे यहीं से अभिव्यक्ति की नई युक्तियां रचते हैं और अपने से भिन्न माहौल में निर्णय लेने और जीवन को समझने की दिशा में बढ़ते हैं। बुनियादी तालीम में किताबें सीखने की प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा जरूर हैं, पर वे सिर्फ साधन हैं। साध्य हैं हमारे वे ज्ञान और अनुभव, जिन्हें हम अपने आने वाले भविष्य को सौंपना चाहते हैं।

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