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दुनिया मेरे आगेः परिधि में स्त्री

राजकुमारी लिखती हैं- यों तो समूची दुनिया में अलग-अलग शक्ल में स्थिति बहुत अलग नहीं है, लेकिन खासतौर पर भारत की महिलाएं एक तरह से मूक नेत्री रही हैं। पितृसत्तात्मक व्यवस्था और मानसिकता ने जो संस्कारों की घुट्टी पिला कर उन्हें पोषित किया, उसी में रच-बस कर उसी तरह जीना।

Author April 15, 2019 2:48 PM
प्रतीकात्मक तस्वीर

राजकुमारी

यों तो समूची दुनिया में अलग-अलग शक्ल में स्थिति बहुत अलग नहीं है, लेकिन खासतौर पर भारत की महिलाएं एक तरह से मूक नेत्री रही हैं। पितृसत्तात्मक व्यवस्था और मानसिकता ने जो संस्कारों की घुट्टी पिला कर उन्हें पोषित किया, उसी में रच-बस कर उसी तरह जीना। जीवन भर रसोईघर में खुद को झोंकने की, अपनी शरीरिक मेहनत और झुलसने-जलने की, बर्तनों के साथ अंगुलियों के घिस जाने के बावजूद उफ्फ तक नहीं निकलने को लेकर अभ्यस्त और सहज हो जाने के बावजूद दुत्कार खाकर जीतीं निराश आंखों वाली औरतें। माहवारी से जुड़े महावृत्तांतों ने स्त्रियों को अछूत और उसके बनाए निवालों को विष-स्वरूप प्रस्तुति दी। उसकी दारुण अनकही कथाएं, जिसे वह अपना कहती रही, वह भी भाई, पति, बेटे के हिस्से की रहीं। कहीं न कहीं वह खुद जननी के रूप में पारंपरिक ढांचे में ढाल देने को प्रयासरत रही। कोल्हू के बैल-सी जुटी रहते हुए चाहे बदन टूट कर खंडित अवस्था में हो, सभी की तरह अगर उसे भी शरीर के दर्द के दौरान आराम का खयाल आए तब भी उसे काम में जुटे रहना है। इस स्थिति में भी पति अगर अरमानों की सेज सजा बैठे तो प्रसन्न होने की नाटकीयता का निर्वाह। उसकी तुनकमिजाजी तो कतई बर्दाश्त नहीं की जाती।

तमाम अंदरूनी चीखों को दबा कर, दोहरी जिंदगी की कसौटियों पर खरा उतरने की जिद लिए कूद पड़ती हैं घर, कार्यालय के मैदाने-जंग में अपनी जीत का परचम लहराने। वहां वह हृदय चीरने वाली दृष्टियों का वार झेल कर, खुंदक खाकर, जुबान रूपी घोड़े की लगाम छोड़ शब्दों के चाबुक चला कर ही अपनी अस्मिता की रक्षा कर पाती है। समाज की नजर में सुंदर मानी जाने वाली स्त्रियां अगर सुंदरता को संरक्षित करने के उद्देश्य से कुछ सौंदर्य प्रसाधन प्रयोग में ला कर आत्मिक आनंद की अनुभूति करने की कोशिश करती है तो भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। आलम यह कि पुरुषों के बीच आकर्षण का केंद्र बनने की चाह खुद सुंदर नहीं लगने वाले और भ्रमित स्त्री-पुरुषों को कुढ़ने पर मजबूर करती है।

ऐसे में एक ही बात अमल के लायक लगती है कि दुनिया कुछ कहे, उसकी फिक्र नहीं की जाए। अपने जीवन और अपनी अस्मिता के लिए जो जरूरी लगे, वह किया जाए। मगर आमतौर पर अपने व्यक्तित्व में अतिमानवीय सुंदरता को हासिल करने के रोजमर्रा के संघर्षों को स्त्री नहीं छोड़ती है और सांसों की दुर्गंध से लेकर पुरुष दंभ से भरे बदसलूकी वाले पुरुष को भी वह सामाजिक बंधन के चलते झेलती जाती है और ऐसे में वह निरीह, विवश और मूक प्राणी बनी रहती है। स्त्री सौंदर्यबोध की सामान्य परिधि यहीं तक सीमित कर दी गई। इस तरह की मोहिनी रूप वाली स्त्रियां पुरुषों के बीच बाकी महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा चर्चा के लिए स्थान पातीं हैं।

लेकिन आधुनिक स्त्री हर क्षेत्र में अपनी पहले की छवि के मुताबिक रूढ़ रही आदतन त्याग और अपनी अभिव्यक्ति के भूलभुलैया वाले भाव को किनारे कर असंतोष, पीड़ा और निराशाजनक माहौल से धीरे-धीरे मुक्ति द्वार की चौखटें लांघ रही हैं। यह सब शिक्षित होने पर संभव हो पाया। हालांकि यह उनके जीवन का मर्म है, लेकिन पितृसत्तात्मक कठोर मानसिकता से भरी हुई स्त्रियां और पुरुष इसे ‘बदजुबानी’ या ‘कैंची-सी जुबान’ के उपमान भी देते हैं। लेकिन सच कहें तो यह स्त्री का चरम विद्रोह है। ये संगठित मुक्तिवाहिनी स्त्रियां आज भी अल्पसंख्यक समूह ही हैं और वे भी लैंगिक भेदभाव, रूढ़ियों, असमानताओं, अन्यायपूर्ण व्यवहारों से आज तक पार नहीं पा सकी हैं। स्त्री आज भी अधिकारों से वंचित वर्गों की श्रेणी में ही है। मुश्किल यह है कि इस वंचना को महसूस करने के बजाय उसे पारंपरिक रूप से कायम सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था के मानसिक बंधनों में ही सब कुछ सहज लगता रहता है।

ऐसा लगता है कि औरतों की खासियत ही उनके शोषण का कारण बन जाती है। सभी से उदारतापूर्वक व्यवहार, कोमल, माधुर्य से भरी वाणी उसी के खिलाफ चली जाती है। स्वत: स्फूर्त संबंधों की आंच से गला कर स्त्री को सभी संबंधी अपने आप परंपरागत रूप से स्वीकृत सांचे में ढाल कर मन मुताबिक कार्य कराते हैं। लेकिन उसके अंतर्मन की थाह पाने का कोई प्रयास नहीं करता। अब जरूरत इस बात की है कि स्त्री अपराधबोध, कुंठा, निर्णयों में अपने लीचीलेपन को छोड़ कर अपने वर्चस्व को स्थापित करे। उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि अभिव्यक्ति के लिए लब खोलने, शोषण के विरुद्ध आवाज बुलंद करने, अधिकारों को हासिल करने तक की सशक्त आवाज में मांग उठाई जाए। उसके बाद ही शायद घरेलू हिंसा, सामाजिक, लैंगिक शोषण और बलात्कार से कुकृत्यों पर कुछ हद तक नियंत्रण हो सकता है। बहरहाल, स्त्री विमर्श हमें आज एक नहीं समाप्त होने वाला विषय लगता है। इसके बावजूद सच यह है कि बौद्धिकता और दृढ़ता ही स्त्री को प्रताड़ना और लांछन से बचा कर एक स्वच्छंद गिलहरी की तरह मनमौजीपन से भरपूर बना सकती है।

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