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दुनिया मेरे आगे- अधिकार का भ्रम

परंपरा और समाज की न जाने कितनी जंजीरों को तोड़ने और कितनी बाधाओं को पार करने के बाद दमित या वंचना के शिकार वर्ग सशक्तीकरण की दिशा पकड़ पाते हैं।

प्रतीकात्मक चित्र।

परंपरा और समाज की न जाने कितनी जंजीरों को तोड़ने और कितनी बाधाओं को पार करने के बाद दमित या वंचना के शिकार वर्ग सशक्तीकरण की दिशा पकड़ पाते हैं। लेकिन पहले से सामाजिक सत्ता पर कब्जा जमा कर बैठी ताकतें तब भी लगातार इस कोशिश में होती हैं कि उनकी सत्ता कायम रहे। इसके लिए वे सशक्तीकरण की प्रक्रिया को भ्रमित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। आजकल छुट्टियां बिताने घर पर भतीजियां भी आई हुई हैं, जो हाई स्कूल या फिर इंटर में पढ़ाई कर रही हैं। अपने भविष्य और कॅरियर के बारे में मुझसे बात करते हुए एक भतीजी ने साफ कहा कि उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता है। वह फैशन डिजाइनर बनना चाहती है। मुझसे जो बन पड़ा मैंने वह सलाह दी कि फैशन डिजाइनिंग में ही अच्छी पढ़ाई हो गई तो कहीं नौकरी करने के बजाय अपने नाम से वह ब्रांड भी बना सकती है। जाहिर है, यह बातचीत यहां तक पहुंची कि स्वतंत्र और सशक्त होने के लिए आर्थिक रूप से स्वनिर्भर होना एक लड़की के लिए कितना जरूरी है। जीवन के बाकी सारे निर्णय उसी से प्रभावित होते हैं। यहां तक ठीक था। लेकिन जब उसने इसी संदर्भ में हाल ही में आई एक लघु फिल्म का जिक्र किया कि एक लड़की उसमें अपने शरीर पर अपने अधिकार के बहाने क्या बात करती है, तब मुझे थोड़ी बेचैनी-सी हुई। असल में उस फिल्म में एक लड़की सनी लियोनी की तरह बनना चाहती है और अपनी यौनिकता का इस्तेमाल उसी तरह करने के पक्ष में माता-पिता के सामने दलीलें रखती है। लड़की अपनी बातों के पक्ष में बेहद लचर, हास्यास्पद और उथले तर्क देती है और मां-बाप उसकी बातों से बहुत परेशान हो जाते हैं।

मुझे हैरानी इस बात पर है कि आखिर किन वजहों से आज की इस नई पीढ़ी के सामने अपने सपने के लिए कोई सानिया मिर्जा, सायना नेहवाल से लेकर व्यवसाय जगत, कला-जगत, राजनीति या दूसरे तमाम क्षेत्रों में मशहूर होने वाली नायिकाएं व्यक्तित्व निर्माण का आदर्श नहीं बनती हैं और सनी लियोनी की छवि आकर्षण पैदा करती है! क्या इसलिए कि सनी लियोनी बनना आसान है और सानिया या सायना बनने के लिए मेहनत और प्रतिबद्धता की जरूरत होगी? मुझे नहीं पता कि किन हालात में या किन वजहों से सनी ने पोर्न स्टार बनने के बारे में सोचा था। लेकिन आखिर अब उन्होंने उस जिंदगी से निकलने की भी कोशिश की है। आज वे अपने अतीत से निकल कर नए तरह से जीवन बिताने की राह पर कदम बढ़ा रही हैं। लेकिन जब वे अपनी राह बदल चुकी हैं, तब एक फिल्मकार को आखिर क्यों सनी की तरह बनने का संदेश देने के लिए फिल्म बनाने की जरूरत महसूस हुई! मेरा मानना है कि इसके जरिए फिल्मकार ने जिस तरह परोक्ष रूप से सभी लड़कियों को सनी की तरह अश्लील फिल्मों के बाजार में उतरने का संदेश दिया है, उसके पीछे एक शातिर पितृसत्तात्मक मानस काम करता है।

मुझे इसमें कोई असहज बात नहीं लगती है कि एक स्त्री अपनी देह को आनंद का मामला मानती है। अपने शरीर और जीवन से जुड़े फैसलों का निर्धारण वह खुद करे तो यह किसी भी स्त्री का अधिकार है। लेकिन मैं इस बात से सहमत नहीं हो पाती कि अपने शरीर और यौनिकता को बेचना कोई कॅरियर हो सकता है। सवाल यह नहीं कि बात केवल स्त्री की गरिमा या परिवार के मान-सम्मान की है। बल्कि यह है कि एक लड़की और उसके बाद समूचे समाज को इससे हासिल क्या होगा! क्या अश्लील फिल्मों में काम करने वाली कोई महिला वाकई अपने शरीर की मालिक होती है? अपने शरीर को कारोबार का जरिया बनाना दरअसल बाजार के इशारों पर अपने व्यक्तित्व को देह में केंद्रित करना और खुद को खरीद-बिक्री योग्य वस्तु बनाना है। इस रास्ते पर बाजार के रहम पर निर्भर किसी स्त्री को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर कह लिया जा सकता है, लेकिन क्या उसे आजाद भी माना जाएगा?

क्या हम इससे अनजान हैं कि ऐसी फिल्मों का व्यापार अंतिम तौर पर स्त्री को महज देह और एक वस्तु के रूप में स्थापित करती है? खासतौर पर भारत जैसे देश में जहां महिलाओं के खिलाफ यौन-हिंसा और अपराध एक आम व्यवस्था की तरह कायम है, उसके पीछे कौन-सा मानस काम करता है? ऐसी फिल्मों में काम करते हुए एक लड़की को अगर उसकी सोच के मुताबिक सुख मिल भी जाता है तो यह उसका निजी सुख हो सकता है, सामाजिक नहीं। मुश्किल यहीं है। किसी के निजी सुख से दूसरों को परेशानी क्यों होना चाहिए! लेकिन वही सुख अगर समाज के लिए एक ‘आदर्श’ और संदेश के रूप में पेश किया जाता है तो यह सवाल उठेगा कि इसके जरिए स्त्री की जो छवि निर्मित होती है, क्या एक व्यक्तित्व के रूप में स्त्री वही होगी! इसका सामाजिक असर क्या होगा? व्यक्तित्व की सीमा किसी स्त्री के लिए क्या केवल देह का आनंद है? समाज में पितृसत्ता को चुनौती देने के बजाय उसी मानस का औजार बन कर एक नए भ्रम का शिकार होना किस तरह स्त्री का सशक्तीकरण है?

 

 

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