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दुनिया मेरे आगे: गांवों में बहार है

वाकई इस असुरक्षा के बीच जो लोग रहते हैं, उनके जीवट का जवाब नहीं। सरकारी स्कूल बिल्कुल चौपट।

गांवों के लोग। (Photo-Indian Express)

प्रेमपाल शर्मा

हाल ही में दिल्ली में रहने वाले एक प्राध्यापक ने सोशल मीडिया पर अपनी मित्रमंडली को बताया कि वे बाईस साल बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने गांव जा रहे हैं। दूरी महज साठ-सत्तर किलोमीटर। वे बस से जा रहे थे। रास्ते के ढाबे, चाय की चुस्कियों के विवरणों से पता चल रहा था जैसे आंखों-देखा हाल जानने और लिखने के लिए ही उन्होंने बस पकड़ी है। मेरी नजर में बाईस साल कोई बड़ा ‘रिकार्ड’ नहीं है। रेलवे में काम करने वाले एक अधिकारी ने बताया कि उन्हें अपने बदायूं जिले में गांव छोड़े सैंतीस साल हो गए। उनकी सफाई है- ‘क्या बताएं… बच्चे तैयार होते नहीं हैं। बड़ी बेटी अमेरिका चली गई तो छोटी ने तो दसवीं के बाद ही अमेरिका जाकर पढ़ने का इरादा कर लिया। बेटा पूना में है। गांव में रखा भी क्या है!’ केवल दिल्ली नहीं, यह बात दूर-दूर तक फैली है। खुर्जा के एक बैंक में तैनात मेरे स्कूल के एक साथी ने बताया- ‘मैं नहीं जाता। आखिर क्यों जाएं? वहां ऐसे देखते हैं जैसे कोई दुश्मन हों। वही लड़ाई-झगड़ों के किस्से। मैंने तो अब शादी-विवाह में जाना भी बंद कर दिया है।’

मैंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ऐसे कई लोगों से बात की, जहां किसी के भाई ने जमीन हथिया ली तो किसी को पिता के बंटवारे से असंतोष है। कई को जान जाने तक का डर रहता है। एक साथी ने बड़ी संजीदगी से सलाह दी कि ‘यार, तुम जाते तो हो, पर संभल कर जाओ। रात न करना!’ उन्होंने अपना अनुभव बताया कि एक बार सर्दियों की शाम जैसे ही बस से उतरा तो पुलिया पर चार लोग थे। मुझे खुशी हुई कि एक परिचित मिल गया। मैंने उसकी आवाज से पहचान लिया। वह बोला कि भइया, तुम इस वक्त मत आया करो! यानी अगर पहचान में नहीं आता तो मेरा लुटना-पिटना तय था।आखिर हालात ऐसे क्यों हुए कि आपको रात के किसी भी पहर अमेरिका में डर नहीं लगता, आॅस्ट्रेलिया में छूटा हुआ सामान अगले दिन मिल जाता है, लेकिन अपने देश में आप निश्चिंत नहीं हैं। जिस मातृभूमि को स्वर्ग से बढ़ कर बताते हैं, राष्ट्रगान-राष्ट्रगीत पर इतराते हैं, किसी इलाके के चप्पे-चप्पे को जानते-पहचानते भी हैं, वहां जाने में भी डर लगता हैं। अगर कभी जाते हैं तो उसके बारे में ऐसे बताते हैं, जैसे हम बचपन में कप्तान कुक की उत्तरी ध्रुव की विजय यात्रा या मैंगेलन के दक्षिण अफ्रीका में प्रवेश के भयानक दुस्साहस के विवरण बता रहे हों।

वाकई इस असुरक्षा के बीच जो लोग रहते हैं, उनके जीवट का जवाब नहीं। सरकारी स्कूल बिल्कुल चौपट। नए नुक्कड़ अंग्रेजी के धंधा करते स्कूलों में पढ़ाई के नाम पर बस कुछ सर्टिफिकेट दिए जा रहे हैं। इसका नुकसान और ज्यादा है। दरअसल, ऊंची फीस देने के बाद वे और उनके मां-बाप खेती-क्यारी के अपने पारंपरिक काम से भी बचना चाहते हैं। सरकारी स्कूल की सहज हिंदी में शिक्षा उन्हें यथार्थ से इतना दूर नहीं करती थी। नौकरी खासकर सरकारी नौकरी मिलेगी नहीं, कोई काम, व्यवसाय, उद्योग है नहीं, न समाज या सरकार ने कुछ सिखाया, तो आगे क्या हो! इनमें से कुछ ऐसे निकल जाते हैं जो सड़कों पर खड़े अंधेरे का इंतजार करते हैं कि कब कोई आए और ये उसका शिकार करें!  ‘हारे को हरिनाम’ के सटीक उदाहरण के रूप में इस निर्वात में अचानक धार्मिकता ने खूब पैर पसारे हैं। जब भी गांव जाता हूं तो पता लगता है कि किसी पूजा का बड़ा आयोजन चल रहा है। चालीस-पचास साल पहले भी लोग पूजा-पाठ करते थे, लेकिन एक-डेढ़ दिन के भीतर खत्म। अब यह हफ्ते या इससे ज्यादा वक्त तक चलता रहता है। आधा गांव इसी में मशगूर रहता है। बाकी रोजमर्रा के कामकाज या तो किनारे होते गए या फिर टलने लगे हैं। धर्म-कर्म के आगे खेतों की परवाह कम होती गई है।

ऐसे में भक्ति का धंधा पूरे जोरों पर है। सामान्य रोजगार भले असंभव जैसे होते जा रहे हों, बनारस से लेकर पटना तक के पंडों-ज्योतिषियों के रोजगार में तेजी है। जाति-विभाजन के दंश और भी अमानवीय शक्ल में सामने आ जाते हैं। काश! धर्म ने समाज में जाति और इससे उपजने वाले विद्वेष को खत्म करने का काम किया होता।एक अच्छी शिक्षा, खेलकूद या दूसरी व्यावसायिक गतिविधियां और प्रशिक्षण इस निर्वात को भर सकते थे। लेकिन बेईमानी और चौबीसों घंटे की धारावाहिक राजनीति ने उसे भी निगल लिया है। गांव अब वे गांव नहीं रहे जिसका सपना महात्मा गांधी देखते थे। बाबा साहब आंबेडकर सचमुच ज्यादा यथार्थवादी थे। वे जाति-व्यवस्था से जकड़न की मुक्ति शहरीकरण में देखते थे। लेकिन शहर के मेरे दिल्ली के अफसर दोस्त गांव वालों और आदिवासियों को दिल्ली की झुग्गियों में भी नहीं देखना चाहते और खुद गांव जाने से भी डरते हैं। बस दूर से गाते रहते हैं- ‘गांव में बहार है!’

 

 

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