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दुनिया मेरे आगेः व्यवहार की मिठास

कहने का आशय सिर्फ यह है कि व्यक्ति को जीवन में सफलता प्राप्त करने और आगे बढ़ने के लिए मधुर व्यवहार की बहुत ज्यादा आवश्यकता होती है। आप किसी भी संस्था, कार्यालय, कैसे भी व्यापार में संलग्न हों, लेकिन यह बात पूरी तरह लागू होती है कि अगर आपकी बोली दूसरों को प्रिय है, तभी आपके लिए आगे का रास्ता आसान होगा।

Author Published on: September 23, 2019 2:33 AM
विफलता के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराने के बजाय आत्मविश्लेषण कर कारण खोजने का प्रयास करना चाहिए।

मोनिका अग्रवाल

समाज में हमारे आसपास जितने भी प्रतिष्ठित माने जाने वाले व्यक्ति आपको मिलेंगे, हम पाते हैं कि लगभग उन सबका व्यवहार काफी मधुर होता है। वे न केवल कोमल स्वभाव के और मृदुभाषी होते हैं, बल्कि अपने मधुर संभाषण से सबको आकर्षित कर अपने तेजोवलय को और उज्ज्वल बनाते हैं। एक पुरानी कहावत है कि मधुर व्यवहार से पत्थर जैसे मन वाले व्यक्ति को भी अपनी ओर बुलाया जा सकता है। उदाहरण हम सबके सामने है कि अहिंसा के पुजारी गौतम बुद्ध से लेकर महात्मा गांधी तक सबने किस तरह मधुर वाणी बोल कर अपने संयम से अपने दौर में महापुरुष होने की धारणा को सार्थकता प्रदान की। ऐसे तमाम उदाहरण हमारे सामने बिखरे पड़े हैं, लेकिन हमारा ध्यान उन पर शायद ही कभी जाता है। लेकिन सच यही है कि प्रतिकूल परिस्थितियों और आक्रोश से भरे लोगों के बीच भी मधुर वचन ओस की बूंद की तरह काम करता है और समूचे माहौल में शांति का रस घोलता है।

कहने का आशय सिर्फ यह है कि व्यक्ति को जीवन में सफलता प्राप्त करने और आगे बढ़ने के लिए मधुर व्यवहार की बहुत ज्यादा आवश्यकता होती है। आप किसी भी संस्था, कार्यालय, कैसे भी व्यापार में संलग्न हों, लेकिन यह बात पूरी तरह लागू होती है कि अगर आपकी बोली दूसरों को प्रिय है, तभी आपके लिए आगे का रास्ता आसान होगा। कड़वी बोली के प्रभाव से मिला रास्ता स्थायी नहीं होता। दूसरी ओर, अगर किसी भी संस्थान का संचालक तीखे बोल वाला और अहंकार वाला होगा तो उसकी ही छवि नहीं, पूरे कार्यालय और संस्था की छवि खराब होगी। यह न केवल सामान्य कर्मचारी के लिए जरूरी है, बल्कि किसी संस्थान के प्रमुख की मीठी बोली उसके मातहत काम करने वालों का प्रदर्शन तक बेहतर बना सकती है। इसके साथ ही प्रमुख का मृदुभाषी होना और मधुर व्यवहार उसकी छवि में चार चांद लगा देता है।

लेकिन अगर किन्हीं हालात में हमारे भीतर अहं भरा है और इसके कारण हम हमेशा एक मिथ्या गर्वभाव में रहते हैं तो काम की अनिवार्यता के सिवा हमारे सहयोगी भी हमसे दूर भागेंगे। इसकी एक वजह शायद यह होती है कि कड़वे बोल बोलने वाले लोगों से बात करने के बाद मन:स्थिति में नकारात्मक उथल-पुथल होता है और उसका असर काम की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। कोई भी कर्मचारी या सहकर्मी अपना मन-मिजाज खराब करके अपने काम के प्रदर्शन में कमी नहीं लाना चाहेगा। हालांकि ऐसा लगातार चलने पर कभी किसी का भला नहीं हो सकता। नाव पानी में तैरती रहे तो कोई खतरा नहीं, लेकिन अगर हमारे अहंकार के तीर के कारण उसमें छेद हो जाए और पानी अंदर आने लगे तो समझ लीजिए कि समूची नाव डूब जाने का खतरा पैदा हो जाता है। हमारा ‘इगो’ या अहं पूरी नाव को डुबो दे सकती है।

विफलता के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराने के बजाय आत्मविश्लेषण कर कारण खोजने का प्रयास करना चाहिए। मधुर व्यवहार के जरिए हम इन विफलताओं को सफलता में बदल सकते हैं। इससे मनुष्य के साथ-साथ पशु-पक्षी भी प्रिय हो जाते हैं। कहा भी गया है कि ‘कागा काको धन हरे कोयल काकू देत / तुलसी मीठे वचन ते जग अपनो करि लेत।’ कौवा बेचारा किसी का क्या धन छीनता है! फिर भी हम उससे भागते हैं। अच्छे कार्य के लिए जाने से पहले कौवे को नहीं देखना चाहते हैं। दूसरी ओर, कोयल हमें कुछ देती नहीं है, मगर उसकी मधुर वाणी के सभी कायल हैं। घर की मुंडेर पर कोयल के बैठने से सब खुश हो जाते हैं। जाहिर है, कौवे और कोयल में यह अंतर सिर्फ मधुरता का ही है।

सच यह है कि मधुर व्यवहार वह असर कर सकता है जो अन्य कोई शस्त्र नहीं कर सकता। स्नेह रूपी अमृत अगर हम अपने आसपास बरसाएंगे तो दूसरे लोग भी हमारे लिए अपना समय, श्रम और मस्तिष्क हमेशा तैयार रखेंगे। ऐसे व्यवहार से हम दूसरों के मन में विश्वास जगा सकते हैं। बड़े से बड़े अस्त्र का प्रहार वैसा घाव नहीं देता, जो घाव मनुष्य की कटु वाणी कर देती है। बड़ी से बड़ी औषधि भी वह घाव नहीं भर पाती, जो मीठी वाणी का हमारा एक शब्द कर देती है। मौजूदा दौर के प्रतिस्पर्धी युग में नए-नए प्रतिस्पर्धियों से सामंजस्य बिठाए रखने की जिम्मेदारी भी हमारी है।

अपने आसपास मौजूद लोगों के साथ हमारा मधुर व्यवहार न सिर्फ हमारे काम को आसान बनाता है, बल्कि हमें भी संवेदनशील बनाता है। पत्थर होते दौर में संवेदनशीलता आज हम सबके लिए बहुत जरूरी है। वर्तमान युग चुनौतियों का मुकाबला करने और परिवर्तन का है, नई तकनीक और सूचना के संचार का है। अपनी शिकायतों में और उलझ कर समय बर्बाद करने का वक्त नहीं है। क्रियाशील होकर आगे बढ़ना समय की आवश्यकता है, लेकिन हर वक्त मधुर बर्ताव हमारे साथ हो। यही सफलता की पहली सीढ़ी है।

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