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दुनिया मेरे आगेः अपनत्व की परिधि

सालों बाद अपने गांव में इस बार ज्यादा वक्त बिता पाया हूं। बचपन में हर साल गरमी की छुट्टियों में यहां आना होता था।

Author June 24, 2017 3:00 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

वी एलन बोस्को

सालों बाद अपने गांव में इस बार ज्यादा वक्त बिता पाया हूं। बचपन में हर साल गरमी की छुट्टियों में यहां आना होता था। जब बड़े हुए तो दिल्ली में दोस्तों का जमावड़ा ऐसा कि गांव की याद ही नहीं आई। विश्वविद्यालय में दाखिले के बाद एक स्वतंत्रता आ जाती है निर्णय लेने के मामले में। ऐसे में पापा की जोर-जबर्दस्ती कहां चलती कि नातेदारी भी कोई चीज होती है। विचारों का खुलापन जो विश्वविद्यालय में मिलता है वह और कहीं नहीं। मेरा जमावड़ा दिल्ली विश्वविद्यालय के केंद्रीय शिक्षा संस्थान में लगता था। बीएड की पढ़ाई करते हुए वहां एक विविध भीड़ से मुलाकात हुई। पेड़-पौधों, गिलहरी, बिल्ली, कुत्तों, पक्षियों जैसे जीव-जंतुओं के बीच जो समाजीकरण हुआ, उसने मुझे छुट्टी के दिन भी वहां पहुंचने पर विवश कर दिया। कभी सिर्फ अखबार लिए सुबह को महसूस करने के लिए जाता, कभी दोपहर में आम के पेड़ की ओट या इमारत की छांव में कोई किताब लिए बैठ जाता। दिन में बिना एक बार वहां गए जैसे मन को चैन ही नहीं आता था। अतीत की उठा-पठक, वर्तमान में राजनीति और भविष्य की संभावनाओं से ग्रसित दोस्तों की बातें शाम के रंगों को बदलती जातीं। धीरे-धीरे कब संस्थान के होकर रह गए पता ही नहीं चला।

शिक्षक की नौकरी जिस विद्यालय में लगी, उसका दिल्ली विश्वविद्यालय के करीब होना मुझे शिक्षक की वेशभूषा में केंद्रीय शिक्षा संस्थान ले जाता रहा। बीएड करने वाला जो एक बड़ा तबका जो वहां पहुंचता है, उसे नौकरी न मिलने का डर रहता है। कई नए विद्यार्थी मुझसे वह डर साझा करते रहते। मैं देखता कि शिक्षक बनने की चाह उनमें कम और जल्दी नौकरी प्राप्त कर लेने की उत्सुकता ज्यादा है। ऐसे में शिक्षा का महत्त्व ‘शिक्षा के मूल्य’ जैसे अकादमिया उपविषयों तक सीमित रह जाते हैं। इसमें विद्यार्थियों की कोई गलती नहीं है। एक निजी विद्यालय में शिक्षक के तौर पर मैं यह देख पाया कि बाजार हमारी चेतना और अंत:करण को नौकरी के साथ जोड़ देता है। दोस्त भी अपनी अपनी नौकरियों से लौट कर अपने शोषित होने के किस्से सुनाते। जब नौकरी छोड़ जेएनयू में दाखिला हुआ तो पापा की भावनाओं को ठेस न पहुंचे, इसलिए हॉस्टल नहीं लिया। जेएनयू के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय का केंद्रीय शिक्षा संस्थान ठिकाना बना रहा।
मुंहबोले दोस्तों से अब सवाल आने लगे कि मैं जेएनयू से रोज क्यों शिक्षा संस्थान आ जाता हूं। मैं जवाब देता कि मैं जितना वहां का हूं, उतना ही यहां का भी। घर के बाहर नातेदारी के अभाव में विश्वविद्यालय एक घर की ही तरह था। शाम को इकट्ठा होने वाले ज्यादातर दोस्त शिक्षा के लिए पलायन करके आए थे या फिर उनके माता-पिता ही पहले-पहल नौकरियों की तलाश में दिल्ली में बस गए थे। जो पलायन करके आए थे, वे अपने घरवालों के प्रति जो जवाबदेही थी उसमें हेर-फेर कर सकते थे। गोष्ठी के बीच अगर घरवालों का फोन आता तो दोस्तों के पास आमतौर पर तर्क होते कि ‘पढाई कर रहा हूं’! मेरे जैसे जिन दोस्तों के माता-पिता दिल्ली में थे, उनकी जवाबदेही एक निश्चित वक्त के बाद और परिस्थितियों पर निर्भर होती थी। पापा ने हमेशा ही आजादी दी, लेकिन घर पर उनका अकेला होना मुझे शाम को जल्दी घर लौटने पर मजबूर कर देता। किसी दिन जो किसी दोस्त की कहानी चल पड़ती, तो भाई और पापा को फोन कर वक्त को वहीं रोक लिया जाता।

इसी बीच यह अंदाजा हुआ कि मैं ‘सांस्थानिक’ हो गया हूं। दरअसल, एक व्यक्ति का एक संस्थान से अलग अपने अस्तित्व की खोज न कर पाना उसे ‘सांस्थानिक’ बना देता है। हम सब अपने-अपने संस्थानों के आदी हैं। विद्यार्थियों के साथ-साथ प्रोफेसर भी तो संस्थानिक हो जाते होंगे! हाल ही में एक प्रिय प्रोफेसर सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने तीस-पैंतीस साल तक एक संस्थान को निहारा होगा और फिर वहां से चले जाने के लिए विवश हो गए होंगे। शायद वे संस्थान को अपने हृदय में समेटे चले गए हों या फिर वे खुद में एक संस्थान हों।

संस्थानिक होते हुए हमने अपना एक छोटा-सा परिवार बना लिया है, जिसके सदस्य परिस्थितियों के मुताबिक बदलते रहते हैं। हर साल परिवार में नए लोगों का आगमन होता है। हर साल कोई इस परिवार से अलग होता है। बाजारीकरण और निजीकरण के इस दौर में विश्वविद्यालय बदल रहे है। विश्वविद्यालयों में सम्मिलित संस्थानों में नए प्रचलन चल पड़े हैं। अब आप एक निश्चित समय तक ही वहां रुक सकते हैं। शाम के पांच बजते ही सुरक्षा गार्ड आपको वहां से निकाल देते हैं। अगर आप विश्वविद्यालय में नामांकित नहीं हैं तो आपको ‘किस से मिलना है, क्यों मिलना है’ जैसे सवालों के जवाब देने पड़ते हैं। वक्त की पाबंदियों के साथ आप सांस्थानिक नहीं हो सकते, अपनेपन की भावनाओं को जन्म नहीं दे सकते। वर्तमान पीढ़ी अपने अपनेपन को लेकर अब जाए तो कहां! इतना वक्त बीतने के बाद हम दोस्त लोग एक दूसरे को ‘बाबा’ कह कर संबोधित करने लगे हैं। शायद इस शब्द का अभिप्राय संस्थानिक हो जाने से ही है।

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