ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः सिमटते संसार का दुख

फेसबुक, वाट्सऐप पर सुबह के स्वागत के संदेश मिलने लगते हैं। अब उसे देखने के बाद आप चाहें या न चाहें, प्रत्युत्तर देना शिष्टता का तकाजा है।

Author Published on: August 21, 2019 2:49 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

आजकल सुबह-सुबह चाय की चुस्की और अखबार के पन्ने पलटते हुए भी हम अपने साथ अपना स्मार्टफोन जरूर रखे रहते हैं। इस चक्कर में होता यह है कि अखबार में कुछ पढ़ते हुए हम कई बार खुद को उस सामग्री में एकाग्र नहीं कर पाते हैं या उसे गंभीरता से नहीं पढ़ पाते हैं। वजह यह कि हर कुछ देर में हमारे फोन में नोटिफिकेशन यानी किसी संदेश की घंटी बजती रहती है और हम उसे देखने के मामले को जरा देर के भी नहीं टालते। तरह-तरह के ऐप और सोशल वेबसाइट को साथ लिए स्मार्टफोन तड़के ही हमसे थोड़ी ज्यादा ही तेजी की मांग करता हुआ चेतावनी जैसी कोई सूचना दे देता है। फेसबुक, वाट्सऐप पर सुबह के स्वागत के संदेश मिलने लगते हैं। अब उसे देखने के बाद आप चाहें या न चाहें, प्रत्युत्तर देना शिष्टता का तकाजा है। इन संदेशों का सिलसिला सप्ताहांत में ज्यादा होता है, मानो किसी कंपनी के कर्मचारी को अपना लक्ष्य पूरा करना हो। बात त्योहारों की कीजिए तो बला का तूफान लाती हैं ये वेबसाइट। होली से लेकर दिवाली मुबारक तक सारे रिश्ते अकेले ही निभा लेते हैं ये स्मार्टफोन और इसमें टिके गिने-चुने संदेशवाहक या संप्रेषण ऐप।

खैर, दुनिया की जो जरूरत है, सो है। अब तकनीक के जमाने में बैलगाड़ी की बात तो नहीं की जा सकती न! एक मंच पर आने की होड़ में चीजों का सामान्यीकरण होना भी स्वाभाविक है। लेकिन बात तब दुखद हो जाती है, जब तकनीक के प्रभाव में आकर मानव-स्वभाव ही बदलने लगे। इंसान होने का मूल धर्म ही अगर मशीनों की बलि चढ़ जाए तो उत्तर भविष्य की कल्पना का आधार क्या हो? मानवता का जन्म एक दूसरे के साथ मिल कर रहने के लिए हुआ है। मनुष्य प्रेम, दया, ममता, परोपकार आदि भावनाओं का चलता-फिरता रूप है। एक दूसरे के दुख-सुख में साथ रहना, कठिनाइयों में हिम्मत बढ़ाना, मिल-बांट कर जीना- ये मानव धर्म है। पास बैठा कोई व्यक्ति अगर रो रहा हो तो उसके आंसू पोंछना, राह चलते कोई गिर गया हो तो उसे सहारा देना जैसे न जाने कितने ही पर्याय हैं जो मनुष्य के हिस्से में प्रकृति की देन हैं।

लेकिन आज मनुष्य खुद को ही खोता जा रहा है तो वह औरों की मदद भला क्या करे! फेसबुक, वाट्सऐप का ‘भूत’ लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। लोग आसपास की दुनिया से कटते जा रहे हैं। कोई गिरता हो गिरे, कोई रोता हो रोए, किसी को फर्क नहीं पड़ता। बाहर रास्तों में, बाजार में, बस स्टॉप पर या किसी भी सार्वजनिक जगह पर, यहां तक कि दफ्तर में समय मिलने पर आज लोग फोन को ही अपनी दुनिया बना बैठे हैं। कोई अनहोनी हो जाए तो उसे भी कैमरे की गिरफ्त में लेकर तुरंत सोशल मीडिया पर साझा करना लोगों का काम बन गया है। इस माजरे को आखिर क्या नाम दिया जाए? ये कैसी ‘स्मार्टनेस’ है जो लोगों को लोगों से दूर किए जा रही है! किसी कोने में बैठ कर फोन को देखते रहना, ये किस युग में जी रहे हैं हम लोग?

हथेली में टिके और अंगुली के स्पर्श भर से चलने वाले स्मार्टफोन का उपयोग सही हो या गलत, इसका जिम्मा फोन कंपनी नहीं ले सकती। यह व्यक्ति की व्यावहारिक बुद्धि तय करती है। प्रश्न उठता है कि क्या आज का मनुष्य इतनी बुद्धि को अपने ऊपर हावी रखता है कि वह सोशल वेबसाइटों का गलत और गैरजिम्मेदार प्रयोग न करे? उत्तर बहुत सीधा है- हां, बिल्कुल। मनुष्य अवश्य इतना परिपक्व और जिम्मेदार है कि उसे सही-गलत का फर्क मालूम हो। तब फिर समस्या कहां है? क्यों सोशल वेबसाइटों को लोग सांप्रदायिक, धार्मिक, अनैतिक अटकलों का मंच बना रहे हैं? क्यों सोशल मीडिया पर ‘साइबर क्राइम’ हो रहे हैं? इन मसलों पर चिंतन जरूरी है।

ये स्मार्टफोन बड़ों से ज्यादा बच्चों को हानि पहुंचा रहे हैं। बच्चों को पता है कि रिश्ते फोन ही निभाते हैं। उनके अंदर पारिवारिक रिश्तों की गरमाहट नहीं पनप रही। दादी अगर बीमार है तो वे उनके पास बैठ कर अपना समय बिताना नहीं चाहेंगे। वे या तो वीडियो गेम खेलेंगे या फेसबुक पर अपनी मित्रमंडली के साथ व्यस्त होंगे। दूरदराज के रिश्तों में तो जैसे दरार ही डाल दी है इस सोशल मीडिया ने। होली या ईद की छुट्टी पर बधाइयों के संदेश भेज कर ही छुट्टी हो जाती है। गलती से अगर किसी ने घर आने की चाह प्रकट कर दी तो गृह मालिक और मालकिन के चेहरे उतर जाते हैं, क्योंकि आज के एकल परिवार अपनी निजता को ज्यादा जरूरी समझते हैं।

सवाल है कि क्या हथेली भर की एक मशीन मनुष्य को प्रभावित करने में इतनी सक्षम है कि वह ज्ञान-विस्मृत हो जाए? क्या वैश्वीकरण के छत्र में आकर व्यक्ति अपना गुण-धर्म भूलता जा रहा है? क्या सोशल नेटवर्किंग का जाल मानवीय संवेदनाओं को नहीं जकड़ता जा रहा? अभी भी वक्त है कि इन सोशल वेबसाइटों का ग्रास बनने से पहले मनुष्यता को जागृत कर लें तभी हम भविष्य के संकट से बच पाएंगे।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगेः संवेदना की कीमत
2 दुनिया मेरे आगे: उम्र से पहले
3 दुनिया मेरे आगे : शोर की मार
ये पढ़ा क्या?
X