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अंधविश्वास के जाल में

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में सुखी व्यक्ति भी अपने आप को सुखी नहीं मानता, क्योंकि जीवन में खालीपन, नीरसता, बोझिलता हावी होने लगी है।
Author August 2, 2017 05:54 am
प्रतीकात्मक चित्र।

प्रदीप उपाध्याय

जीवन में कभी किसी को पूर्ण संतुष्टि नहीं मिलती है। व्यक्ति कभी यह नहीं मानता कि उसके साथ सब अच्छा ही हो रहा है। उसे जो भी मिलता है, वह कम ही लगता है। वह तुलना हमेशा उस व्यक्ति से करता है जिसे जीवन में उससे अधिक मिलता है। शायद दुख की वजह भी यही है। जो मिला है, व्यक्ति उसी से संतुष्ट हो जाए तो दुखी होने का कोई कारण नहीं रह जाता, लेकिन ऐसा होता कहां है! जीवन में उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं। सुख और दुख दोनों समांतर अवस्थाएं हैं। कभी आप खुद को दुनिया का सबसे सुखी व्यक्ति मानेंगे तो अगले ही पल आप महसूस करेंगे कि नहीं, आप ही दुनिया के सबसे दुखी आदमी हैं। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में सुखी व्यक्ति भी अपने आप को सुखी नहीं मानता, क्योंकि जीवन में खालीपन, नीरसता, बोझिलता हावी होने लगी है। तनावपूर्ण दिनचर्या के कारण जीवन के प्रति उत्साह में कमी आने लगी है और नतीजतन, व्यक्ति खुद को दुनिया का सबसे दुखी व्यक्ति मानने लगता है। दुखों से निजात पाने के लिए वह ज्योतिषियों या भविष्यवक्ताओं, साधु-संतों के चक्कर लगाने लगता है। यहां भी उसकी जेब खाली होने और असंतोष और अधिक बढ़ने के सिवा उसे कुछ भी नहीं मिलता। जिस व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं है या जिसके पास भौतिकवादी सभी सुख-सुविधा मौजूद है, दोनों ही दुखी है।

अगर किसी भविष्यवक्ता के पास जाएंगे, तो वह यही कहेगा कि आपका समय अच्छा नहीं चल रहा है और अमुक उपाय कर लो तो इतने समय में सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन क्या इतने भर से किसी का समय सुधर जाता है? नहीं! परिवार में कोई एक अकेला व्यक्ति तो रहता नहीं है। अगर भाग्य का ही सवाल है तो मान लीजिए कि ज्योतिषियों के उपाय से कुछ चमत्कार होता भी है तो भाग्य किसी एक का ही सुधरेगा! बाकी लोगों का क्या! अगर एक व्यक्ति किसी तरह सुखी हो भी गया तो क्या बाकी सभी लोग अपने आप को सुखी मान लेंगे? क्या उनके दुख एक व्यक्ति के सुख को देख कर दूर हो जाएंगे? अगर नहीं तो फिर यह अंधी दौड़ क्यों? क्यों नहीं सभी मिल कर हालात के साथ चलें, हर परिस्थिति का डट कर सामना करें! मैं एक परिवार को जानता हूं जो पहले किराए के मकान में जीवन बसर करते थे। दो कमरे का मकान था और मकान मालिक की दखलंदाजी भी बहुत थी। फिर भी वे अपने हालात से संतुष्ट थे और उसी में सुख की अनुभूति करते थे। बाद में किसी तरह एक कॉलोनी में मकान बनाया, लेकिन यहीं से परेशानियों ने भी पीछा पकड़ लिया। कुछ समय के बाद ही पिता को कैंसर हो गया और वे असमय ही चल बसे। माता और बड़े भाई की पत्नी बीमार रहने लगीं। बड़े भाई मकान छोड़ कर किसी और जगह किराए के मकान में रहने चले गए। छोटे भाई की नौकरी भी स्थायी नहीं थी।

कई तरह की परेशानियों में घिरने के बा उन्होंने किसी वास्तु के जानकार से सलाह ली और उसके अनुरूप मकान के दक्षिण-मुखी होने के कारण प्रवेश द्वार की दिशा बदलवा दी। फिर भी ‘दुर्भाग्य’ दूर नहीं हुआ। अन्य ने सलाह दी कि घर के सामने नीम्बू का पेड़ नहीं होना चाहिए। यह कांटेदार वृक्ष है, इसे निकलवा देना चाहिए। बारहमासी फल देने वाले नींबू के पेड़ को बेरहमी से कटवा दिया गया। इसी तरह घर के सामने लगे अनार और आंवले के वृक्ष को भी किसी ‘जानकार’ की सलाह पर काट दिया गया। लेकिन दुख और दारिद्रय समाप्त नहीं हुए। अलबत्ता वे फलों से वंचित अवश्य ही हो गए और यह भी दुख का कारण बन गया।दरअसल, व्यक्ति यह नहीं सोचता कि जीवन-मरण में किसी अप्रत्यक्ष वजह को दोष नहीं दिया जा सकता। इसी प्रकार बीमारी के लिए भी व्यक्ति को अपने खानपान और दिनचर्या पर भी ध्यान देना चाहिए। आर्थिक स्थिति के लिए भी कर्म की प्रधानता को स्वीकार करना चाहिए, भाग्य भरोसे बैठे रहने से कुछ हासिल नहीं होता। यह हो सकता है कि कुछ लोगों को बहुत कम कोशिश से बहुत कुछ हासिल हो जाए और कुछ लोगों को बहुत प्रयासों के बाद भी बहुत कम सफलता मिले। लेकिन यहां प्रयासों में कमी, सही दिशा का ज्ञान न होना या अन्य अनेक कारण हो सकते हैं। इसके लिए अपनी कमियों को स्वीकार करना चाहिए।
अपनी सफलता के लिए गंडे-ताबीज, रत्न आदि काम नहीं आने वाले। इसके लिए तो व्यक्ति को पूर्ण मनोयोग से काम करना होगा। संकट या दुख के दौर में खुद पर भरोसा करने के बजाय अंधविश्वासों के चक्कर में पड़ कर लोग बचा-खुचा भी गंवा देते हैं। तंत्र-मंत्र या किसी अदृश्य शक्ति के सहारे किसी समस्या का हल हासिल किया ही जा पाता तो आज इतने बड़े पैमाने पर लोग तकलीफें नहीं झेल रहे होते या दुनिया में इतनी गंभीर समस्याएं नहीं होतीं।

 

 

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