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दुनिया मेरे आगे- जिंदगी के दो रंग

प्रेम में धोखा खाए हुए युवा लड़के-लड़कियां जहर खा कर या चलती ट्रेन के आगे आकर या नींद की गोलियां खाकर अपनी जिंदगी खत्म कर लेते हैं।

Author April 25, 2017 3:48 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

अरुणा कपूर

ऐसे ही मन में विचार आया कि स्कूल में पढ़ने वाले किशोर या पंद्रह-सोलह साल के कुछ बच्चे आत्महत्या क्यों कर लेते हैं? आए दिन अखबार के पन्नों पर इस तरह की खबरें पढ़ कर बहुत दुख होता है। प्रेम में धोखा खाए हुए युवा लड़के-लड़कियां जहर खा कर या चलती ट्रेन के आगे आकर या नींद की गोलियां खाकर अपनी जिंदगी खत्म कर लेते हैं। बहुत सारे माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपनी पूरी जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं। बच्चे को उच्च शिक्षा यह सोच कर दिलाते हैं कि वह बुढ़ापे में उनको कुछ राहत देगा। लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है। आजकल आमतौर पर बच्चे जब किसी लायक बनते हैं, अच्छी नौकरी में लग जाते हैं और मोटी कमाई करने लगते हैं तो माता-पिता के प्रति लापरवाह भी हो जाते हैं। यह सब बहुत दुखदायी है। यों कहने को हमारे सामने बड़े ज्ञानियों की बातें हैं कि सुख और दुख धूप और छांव की तरह मनुष्य के जीवन में आते और जाते रहते हैं। इस संसार में स्थायी कुछ भी नहीं है। अगर ऐसा है तो सुख मिलने पर बहक जाने और दुख आने पर अपने आपको मिटाने की हद तक आगे बढ़ जाने के हालात क्यों स्वीकार कर लिए जाते हैं?

दरअसल, यह सब सकारात्मक सोच की अति को लेकर हो रहा है। हमने जो किया है, जो करने जा रहे हैं और जो भविष्य में करेंगे, उन सबका फल हमें अपनी इच्छानुसार ही मिलेगा। यही सकारात्मक सोच की अति है। एक विद्यार्थी यही सोच कर परीक्षा की पूरी तैयारी करता है कि वह हर हाल में प्रथम स्थान ही हासिल करेगा। उसके माता-पिता भी यही सोच कर उसे सारी सुविधाएं प्रदान करते हैं कि वह प्रथम स्थान का ही अधिकारी हो। लेकिन अगर ऐसा किसी कारण से नहीं हो पाया, नंबर कम आ गए या परीक्षा पास करने में कामयाबी नहीं मिली तो वह विद्यार्थी सदमे में आ जाता है। इस अवसाद की स्थिति में माता-पिता उसे सांत्वना देने के बजाय, उलटे कोसना शुरू कर देते हैं कि तुमने अच्छे से मेहनत नहीं की… हमारा पैसा बर्बाद किया और इज्जत भी मिट्टी में मिला दी! ऐसी स्थिति में कोमल मन-मस्तिष्क वाला बच्चा असफलता को झेल नहीं पाता है और कई बार जीवन का अंत करने की दिशा में भी आगे बढ़ जाता है। कितना दुखद है यह सब! परीक्षा की तैयारी मन लगा कर अच्छे से करना तो ठीक है, लेकिन मनचाहा परिणाम ही हासिल हो, ऐसा हर हाल में कैसे हो सकता है?
आपस में एक दूसरे को दिल से चाहने वाला प्रेमी जोड़ा किसी कारणवश शादी के बंधन में नहीं बंध सके तो क्या इसके लिए उसे अपनी जीवन लीला समाप्त कर देनी चाहिए? बच्चों का लालन-पालन माता-पिता को यह सोच कर नहीं करना चाहिए कि वे अनिवार्य रूप से उनके बुढ़ापे का सहारा बनेंगे ही। बन भी सकते हैं और नहीं भी। यह उसके पारिवारिक और फिर सामाजिक प्रशिक्षण से तैयार मानस या सोचने-समझने के तरीके पर निर्भर करता है। मेडिकल या इंजीनियरिंग में दाखिले की तीव्र मानसिकता से टेस्ट में समाहित होने वाले विद्यार्थी यह क्यों नहीं सोचते कि सफलता की तरह असफलता भी हिस्से में आने वाली एक चीज है। कुदरत ने हमें सिर्फ दिन का उजाला ही नहीं, रात का अंधेरा भी बख्शा है।

सकारात्मक सोच की भी एक सीमा होती है। अच्छे जीवनयापन और उज्ज्वल भविष्य के लिए मेहनत करनी ही चाहिए। मगर किसी की तरह बनने या किसी खास मुकाम पर पहुंचने की लालसा इच्छा पूरी न होने पर मनुष्य को तोड़ कर रख देती है। जीवन लीला समाप्त करने के लिए उकसाती है। तो क्यों नहीं हम मन में ऐसी लालसा को पनपने ही नहीं दें। महत्त्वाकांक्षा हर स्थिति में बुरी चीज नहीं है। यह व्यक्ति के विकास में भी सहायक होती है। लेकिन यही जब बेलगाम लालसा में तब्दील हो जाए तो नुकसानदेह ही होती है। आजकल हर तरफ यही सुना जा सकता है कि सकारात्मक सोच ही सफलता हासिल करने का एकमात्र जरिया है। स्कूलों या अन्य शैक्षणिक संस्थाओं में और धार्मिक प्रवचनों में भी सकारात्मक सोच पर बल दिया जाता है। कहा जाता है कि अपने लक्ष्य की तरफ ही नजरें गड़ी होनी चाहिए; ऐसा कोई काम नहीं है, जिसमें जीत आपको हासिल नहीं हो सकती; असंभव शब्द को अपनी डिक्शनरी से हटा दो; अपने कार्य में असफलता की सोच मात्र से आप लक्ष्य से दूर हट जाओगे और सफलता आपके हाथ आते-आते रह जाएगी। कहने-सुनने या उपदेश देने में यह सब अच्छा लगता है। इस तरह के विचारों के प्रचारक को आदरभाव से देखा जाता है। लेकिन इसमें सच्चाई कितनी है? बहुत सारे प्रश्न सकारात्मक सोच के बारे में हमारे सामने आकर खड़े हो जाते हैं। इसलिए सकारात्मक सोच के साथ-साथ नकारात्मक स्थितियों से प्रभावित होने वाली जिंदगी के दूसरे पहलू की अहमियत पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि जीवन सुचारु ढंग से चल सके, आगे बढ़ सके।

 

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