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बाजार में पानी

दिल्ली के बटला हाउस में दोस्त के घर की गली में पानी बेचने वाले की आवाज अपने आप में कई सारे सवाल और जवाब साथ में लिए अंदर तक डरा देती है।
Author August 1, 2017 05:47 am
इस फोटो का इस्तेमाल सांकेतिक तौर पर किया गया है।

राय बहादुर सिंह

दिल्ली के बटला हाउस में दोस्त के घर की गली में पानी बेचने वाले की आवाज अपने आप में कई सारे सवाल और जवाब साथ में लिए अंदर तक डरा देती है। यह इलाका यमुना से कुछ ही कदम की दूरी पर है। लेकिन इसका क्या फायदा! यह वैसा ही है कि प्यासा समंदर के किनारे बैठा हो और उसका पानी पी न सके। रिक्शे पर पानी की छोटी-छोटी टंकियों में क्या बंद है, यह कोई सोचता नहीं है। जो आज कौड़ियों के भाव मिल रहा है, कल को उसकी तासीर इतनी गरम हो जाएगी कि उससे प्यास तक नहीं बुझ पाएगी। कभी-कभी उस मुहल्ले की गलियों में घूमते हुए जब मैं इन पानी बेचने वालों को देखता हूं तो मुझे याद आ जाती है अजय नावरिया की लिखी कहानी ‘गंगा सागर’। राजस्थान में बोतलों में बिकते पानी ने कैसे वहां ऊंच-नीच को खत्म कर दिया यह उस परिवेश के हालात की मांग थी। लेकिन आज जो स्थिति दिल्ली की है, वही भारत के गांवों की भी है। आज मेरे गांव में जमीन के पानी को फिल्टर करके लीटर के हिसाब से बेचा जा रहा है। यह देख कर मैं हैरान हो गया कि जिन हैंडपंपों के नीचे बैठ कर मैं दोस्तों के साथ घंटों नहाया करता था, आज उनका पानी सूख गया है। जिनमें पानी बचा भी है, वह दूषित हो चुका है और किसी काम का नहीं है। पहले मैं दिल्ली जल बोर्ड के पानी से नहाता था। पानी ठंडा होने के कारण दो-चार बाल्टी से नहाना मेरे लिए आम बात थी। फिर पीने के पानी की किल्लत होती कभी नहीं देखी। आज पानी सबकी फिक्र में शुमार हो चुका है।

मैंने मकान के बाहर छोटे-छोटे प्लास्टिक के डिब्बे लेकर दूसरों के दरवाजे-दरवाजे घूमते हुए बच्चों को हमेशा नजरअंदाज किया है। मैंने कभी नहीं सोचा कि मेरे बच्चे भी इस तरह दूसरों के घर पानी लाने के लिए भटकते हुए जाएंगे। कहीं घूमने जाने पर कोई नदी दिखेगी तब शायद मेरी तरह ही पानी की अहमियत न समझने वाला व्यक्ति उस पानी में नहा कर अपने तन की आग तो बुझा लेगा, पर पास में पानी जिस तरह गायब होता जा रहा है, उससे पैदा मन की आग का क्या होगा! कुछ समय पहले जब से गांव से वापस आया हूं, पानी का मोल समझ में आने लगा है। मैं समझ गया हूं कि पंद्रह रुपए में बिकने वाली पानी की बोतल में सिर्फ पानी कैद नहीं किया गया है, बल्कि उसमें कैद है हमारा भविष्य। मैं डरने लगा हूं कि कहीं ‘गंगा सागर’ कहानी की समस्या आने वाले दिनों में पूरे देश की न हो जाए। ऐसा कभी हुआ तब क्या होगा!

लोग प्याऊ तक पहुंच तो जाएंगे, लेकिन कंठ उन्हीं का भीगेगा, जिनकी जेब में पानी का दाम होगा। ऐसी स्थिति होने के दिन दूर नहीं हैं। अभी ही दिल्ली में घर से बाहर निकलने के बाद बिना खर्च किए प्यास बुझाना संभव नहीं रह गया है। पानी की समस्या पर एक खबर काफी हद तक डरा देने वाली है कि इलाहाबाद से पैंतालीस किलोमीटर दूर शंकरगढ़ इलाके में जम कर खनन किया गया। इसका असर धीरे-धीरे दिखने लगा है। उस खबर के मुताबिक गांव के तालाब और हैंडपंप लगभग सूख गए हैं या सूखने की कगार पर हैं। ग्रामीण बताते हैं कि हम गंदा पानी पीने के लिए मजबूर हैं और इसकी वजह से कोई न कोई बीमारी होती रहती है। एक महिला का कहना था कि जब गंदा पानी पिएंगे तो बीमारी तो होगी ही और हमारे पास पैसा भी नहीं है कि हम अपना इलाज करा सकें। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। वरना आने वाले समय में हमें कई और मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
यह कहानी सिर्फ एक क्षेत्र की नहीं है। भारत के ज्यादातर गावों के लोग ऐसी ही स्थिति में जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। आज भी बुंदेलखंड के सभी इलाकों में पानी नहीं पहुंचाया जा सका है। राजनीतिक निष्क्रियता और प्रशासनिक लापरवाही की वजह से इन इलाकों में लोगों को एक-एक बूंद के लिए तरसना पड़ रहा है। गांवों में रहने वाले लोग अक्सर कहते हुए मिल जाते हैं कि हम गंदा पानी पीने को मजबूर हैं और इसकी वजह से कोई न कोई बीमारी होती रहती है। यों भी जब लोग गंदा पानी पिएंगे तो बीमारी तो होगी ही। स्थिति विकट तब हो जाती है जब बीमार हुए किसी व्यक्ति के पास पैसा नहीं होता है कि वे अपना इलाज सकें। आखिर सरकारों को इस पर ध्यान देना क्यों जरूरी नहीं लगता? अगर यही हालत बनी रही तो आने वाले वक्त की कल्पना की जा सकती है।

 

 

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