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दुनिया मेरे आगेः छवियों से प्रेम

काश! हमारी जवानी आने के दिनों में ऐसा हो पाता। हम भी तो देखते कि जवान दिल वास्तव में जब किसी के प्यार में धड़कता है तो कैसा होता है उसका अहसास! हमारे पास तो जवानी के मामले में जो आधी-अधूरी जानकारी है, वह हमें नीले-पीले लुगदी साहित्य या उस ‘साहित्य’ के जरिए मिली हुई है, जिसे लोग तब भी और आज भी घनघोर अश्लील, लेकिन अपनी ‘धरोहर’ मानते हैं।

Author Published on: February 13, 2020 2:31 AM
मुझे यह बात आज भी कचोटती है कि हमारी उस उम्र में, जब हमारे भीतर प्यार और उसके इजहार का जज्बा जोर मारता था, तब संत वेलेंटाइन अपनी कब्र में पुरसुकून नींद में सो रहे थे। वे अगर हमारे समय में रहे होते तो बात ही कुछ और होती। हो सकता है कि हम अपनी जवानी के लम्हों को सलीके से जी लेते।

निर्मल गुप्त 

कहते हैं कि संत वेलेंटाइन गुजरे वक्त में प्यार के बिंदास इजहार और पारस्परिक सौहार्द की लड़ाई लड़ते हुए तत्कालीन रोम के राजा के हाथों मारे गए थे। उन्हें इस फानी दुनिया से गए हुए अरसा हुआ। वे चूंकि मर चुके हैं तो मृत्यु के बाद किसी की जिंदगी में प्यार की बहार लेकर आएं भी कैसे! जो एक बार इस दुनिया से विदा हुआ, वह कभी लौट कर नहीं आता है। यह अलग बात कि वह किताब में रखे सूखे हुए फूलों की तरह याद बन कर धमके, ऐसे वैसे कैसे भी या किसी अन्य तरीके से। अलबत्ता तमाम शायर, कवि और लेखक वेलेंटाइन के आने की अफवाह जरूर फैलाते रहते हैं। पर इन अफवाहों पर कोई कान नहीं देता। हां, वेलेंटाइन की छवि जिस रूप में स्थापित हो चुकी है, उसके असर में खासतौर पर युवा अपना व्यवहार जरूर तय करते हैं। एक दौर तब कुछ ऐसा ही था कि अफवाह का सच के रूप में भूमंडलीकरण अमूमन नहीं हो पाता था। हम तकनीकी रूप से इतने संपन्न थे भी नहीं! यह अलग बात है कि लोग प्यार तब भी करते थे, पर उसका इजहार करते हुए बड़े धीर गंभीर और सतर्क रहते थे।

मुझे यह बात आज भी कचोटती है कि हमारी उस उम्र में, जब हमारे भीतर प्यार और उसके इजहार का जज्बा जोर मारता था, तब संत वेलेंटाइन अपनी कब्र में पुरसुकून नींद में सो रहे थे। वे अगर हमारे समय में रहे होते तो बात ही कुछ और होती। हो सकता है कि हम अपनी जवानी के लम्हों को सलीके से जी लेते। युवावस्था में जिस तरह कल्पनाएं हावी होती हैं, उसमें वेलेंटाइन और उनके संदेश की छवियां आज जिस तरह एक खास रूमानी माहौल रचती हैं, उसमें ऐसा खयाल स्वाभाविक है। लेकिन उन दिनों ऐसा कुछ था ही नहीं, इसलिए हम हम ठीक से जवान हुए बिना अचानक ही बचपन से अधेड़ हो लिए। ऐसा केवल मेरे साथ ही नहीं हुआ। उन दिनों चंद इधर-उधर घूमने रहने वाले लड़कों, शोहदों और बिगड़ैल खानदानी रईसों के अलावा जवानी के आधुनिक एहसास तब किसी और के जीवन के आसपास भी न फटकते थे!

लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब अमूमन हर किसी के पास युवावस्था आती है। वह चूंकि बड़े पुरलुत्फ अंदाज में आती है, इसलिए उसकी स्थायी प्रदर्शनी निरंतर भिन्न-भिन्न रूपों में चलती ही रहती है। मोबाइल पर होने वाली इस नुमाइश को कस्बों, शहरों और महानगरों में सरेराह कभी भी देखा जा सकता है। सुना है कि अब संत वेलेंटाइन इस साल फिर अपनी ख्वाबगाह से निकल चुके हैं और बस आने ही वाले हैं। उन्हें बाजार ने अपना ब्रांड एंबेसडर बना लिया है। हर साल वे बिना नागा तोहफा बेचने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सजी-धजी दुकानों पर टेडी बियर, दिल के आकार वाले गुब्बारों, निर्गंध फूलों के बुके, हृदयाकार चॉकलेटों, पेस्ट्रीज, च्विंगम, लॉलीपॉप और तरह-तरह के ग्रीटिंग कार्डों के जरिए हर उस शख्स तक जरूर पहुंचते हैं, जो वास्तव में युवा हो लेता है या अपने युवा होने के विभ्रम को कामयाबी से निरंतर ओढ़े रहता है।

काश! हमारी जवानी आने के दिनों में ऐसा हो पाता। हम भी तो देखते कि जवान दिल वास्तव में जब किसी के प्यार में धड़कता है तो कैसा होता है उसका अहसास! हमारे पास तो जवानी के मामले में जो आधी-अधूरी जानकारी है, वह हमें नीले-पीले लुगदी साहित्य या उस ‘साहित्य’ के जरिए मिली हुई है, जिसे लोग तब भी और आज भी घनघोर अश्लील, लेकिन अपनी ‘धरोहर’ मानते हैं। प्यार के इजहार का व्यावाहरिक फलसफा तो मैं कभी सीख ही नहीं पाया।
ऐसे में मेरा तो मानना है कि हमारे समय के लोग निहायत दकियानूस थे। उन्हें प्यार के सैद्धांतिक पक्ष का तो पता था, उसकी मीमांसा करना भी खूब आता था। सिद्धांत में हमारी प्रतिभा असंदिग्ध थी, पर व्यवहार में मामला शून्य से ऊपर कभी नहीं गया। कहने का मतलब यह कि अगर आज की तरह का इजहार ही प्यार का पैमाना है तो इसका मतलब हुआ कि अतीत का प्रेम कहीं था ही नहीं।

लेकिन क्या सचमुच ऐसा था कि प्रेम और उसकी अभिव्यक्ति अनुपस्थित था? यह शायद खुद वेलेंटाइन प्रेम को जीने वाले प्रेमी भी न मानें। इसके बावजूद यह सच है कि संत वेलेंटाइन ने अपने नए अवतार में आकर चमत्कार कर दिखाया है। वेलेंटाइन डे विरोधियों के लिए बुरी खबर यह है कि लाख पहरे बैठाने के बावजूद वह युवा दिलों में अपनी आमद जरूर दर्ज करेगा और वेलेंटाइन समर्थकों के लिए खुशखबरी यह है कि वेलेंटाइन के साथ अब अरबों-खरबों का बाजार है! उसके आगमन को रोक पाना किसी भी नैतिकतावादी के बूते की बात नहीं। तो आएं संत वेलेंटाइन… स्वागत है आपका! अगर संभव हो तो उन निर्धनों, दलितों, शोषितों, पीड़ितों की जिंदगी और नफरत से बजबजाती बस्तियों में भी आ जाइएगा, जहां सदियों से आपके आने का इंतजार हो रहा है।

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