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दुनिया मेरे आगे- सफर में सलीका

जितने दिन और जहां-जहां मैं अमेरिका में रहा, टैक्सी-व्यवस्था को लेकर सुखद अनुभव रहा। वहां आमतौर पर लोगों के पास अपनी कार है या फिर कहीं सफर के लिए टैक्सी के तौर पर चलने वाली कारें।
Author July 31, 2017 05:07 am
प्रतीकात्मक चित्र।

मिथिलेश श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क शहर में मैनहट्टन के उपगनर में एक कला-संग्रहालय मेट्रोपोलिटन से रेडियो सिटी हॉल तक जाना था। चूंकि संग्रहालय में ही काफी देर हो चुकी थी तो मेरे पास टैक्सी लेने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था। मैनहट्टन की गलियों में टैक्सी हमेशा उपलब्ध रहती है। टैक्सी वाले कहीं जाने से मना नहीं करते। हाथ दिया जाए और वे रुक जाते हैं। उन्हें जगह बताई जाती है, वे जीपीएस में मंजिल का पता दर्ज करते ही मीटर चालू कर देते हैं। मुझे लगा कि वहां की व्यवस्था इतनी दुरुस्त है कि किसी को टैक्सी चालक से किसी भी बात पर बहस करने की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि टैक्सी चालक कहीं भी जाने से मना नहीं करता, किसी से जरा भी बेअदबी नहीं करता और मीटर इतना भरोसेमंद होता है कि तेज चलने का संदेह नहीं किया जा सकता। मैंने हाथ उठा कर एक टैक्सी को रोका और लपक कर टैक्सी के पीछे वाली सीट पर बैठ गया। टैक्सी चल पड़ी। लेकिन बैठते ही मेरी नजर टैक्सी में लगे मीटर पर पड़ी जिस पर लिखा था- ‘टैक्सी चालक से दुर्व्यवहार करने पर तीस साल तक की सजा हो सकती है। टैक्सी चालक को ‘बख्शीश’ जरूर दें।’ आम आदमी को टैक्सी वालों से बहस करने, झगड़ा करने और सताने की अमेरिका का कानून मनाही करता है और शायद वही कानून टैक्सी वाले को भी अनुशासित करता है, ताकि वह लोगों को टैक्सी में बिठाने से मना न करे, उनसे बदतमीजी न करे, मीटर की साख से खिलवाड़ न करे।

जितने दिन और जहां-जहां मैं अमेरिका में रहा, टैक्सी-व्यवस्था को लेकर सुखद अनुभव रहा। वहां आमतौर पर लोगों के पास अपनी कार है या फिर कहीं सफर के लिए टैक्सी के तौर पर चलने वाली कारें। अपने यहां दिल्ली जैसे शहर में भी आम आदमी की सवारी बस, तिपहिया या रिक्शा या ई-रिक्शा। अपनी गाड़ी वाले लोगों की तादाद और वर्ग आर्थिक रूप से सशक्त है। कुछ लोग टैक्सी से भी चलते हैं। टैक्सियों और तिपहिया के बदतर हालात के अनुभव हजारों हैं। बैटरीचालित रिक्शा इन दिनों काफी संख्या में उपलब्ध हैं, लेकिन वहां किसी भी तरह का अनुशासन नहीं दिखाई देता। कुछ समय पहले द्वारका इलाके में लगभग रात नौ बजे मेट्रो स्टेशन के पास बैटरीचालित रिक्शा की कतारें लगी हुई थीं। सवारियां ज्यों-ज्यों कम हो रही थीं, किराया मांगने के मामले में रिक्शा वालों की मनमानी बढ़ रही थी। अपने साथ सामान और अपनी थकान की हालत से लाचार आखिर उनकी बात मान कर , उन्हें मुंहमांगा किराया चुका कर मैं घर पहुंचा। दरअसल, यह मामला केवल किराए का नहीं है, बल्कि समाज में एक दूसरे के प्रति जिम्मेवारी और सद्भाव का है, समय और स्थान की नजाकत का फायदा उठाने का है। हम भारतीयों ने शायद यही सीखा है कि मुसीबतजदा इंसान से जितना मुनाफा कमाया जा सकता है, कमा लेना चाहिए। मैंने तिपहिया वालों को दिल्ली के अस्पतालों के सामने बाहर से आए लोगों से अधिक किराए की मांग करते हुए सुना-देखा है।

सवारी और तिपहिया वाहन वाले में से कोई एक दबंग निकला या दोनों ही दबंग निकले तो मारपीट की नौबत आ जाती है जो सड़क पर होने वाली हिंसा का रूप ले लेती है। क्या यह जरूरी नहीं है कि ऐसे चालक इस बात को समझें कि मीटर की विश्वसनीयता हर हाल में बनाए-बचाए रखनी चाहिए, क्योंकि किसी भी सवारी को उसके गंतव्य तक पहुंचाना उसकी नागरिक, मानवीय और कानूनी जिम्मेवारी है। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि असमय और ऐसे स्थान पर जहां परिवहन की सुविधा का अभाव है, तिपहिया या फिर कोई टैक्सी वाले जरूरतमंद लोगों से मनमाना किराया न मांगें। आमतौर पर ज्यादातर लोग उचित और मीटर से किराया देने के लिए तैयार रहते हैं। अगर वाहन के ड्राइवर के व्यवहार से यात्री का दिल खुश हुआ तो किराये से अधिक पैसा वह यों ही दे सकता है। हमारा तंत्र भ्रष्ट जरूर है, लेकिन क्या हमें अपने जीवन का सबक भ्रष्ट लोगों और भ्रष्ट तंत्र से सीखना है? एक बहुत ही संवेदनहीन रवैया अमूमन हर जगह देखने को मिल जाता है कि जब कोई मजबूरी या ज्यादा जरूरत की हालत में रहता है तो उससे किसी सेवा या वस्तु की मनमानी कीमत वसूली जाती है। यह न केवल अनैतिक है, बल्कि अमानवीय भी है। लेकिन विडंबना यह है कि रेल यात्रा के प्रीमियर या फ्लैक्सी किराए जैसे कई नए नियमों के तहत खुद सरकार ने ज्यादा से ज्यादा किराया वसूल कर साधारण लोगों की मजबूरी का फायदा उठाना शुरू कर दिया है। स्मार्ट शहर का निर्माण केवल ऊंची-ऊंची इमारतों या फ्लाईओवरों के निर्माण से नहीं हो सकता है, बल्कि यह उस इलाके के बाशिंदों की नीयत और प्रवृत्तियों में बदलाव से ही हो सकता है, जिसमें परस्पर भरोसे की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।

 

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