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दुनिया मेरे आगे- कुएं का दायरा

अध्यापकों का तर्क यह होता है कि हमें तो पढ़ने का वक्त ही नहीं मिलता, बच्चे पढ़ना नहीं चाहते, हमें गैर-शैक्षणिक कामों में हमें लगा दिया जाता है आदि।

प्रतीकात्मक तस्वीर

हम सब अपना-अपना कुआं बनाते हैं। आमतौर पर उसी में ताउम्र रहते भी हैं। कुछ लोग हैं जो उसकी परिधि को तोड़ कर बाहर आ पाते हैं। कुआं कोई भी हो, लेकिन होता कुआं ही है। यानी हमारी अपनी चुनी हुई सुरक्षित जगह, जिसे हम अपनी क्षमताओं और दुर्बलताओं के साथ जीने के लिए चुन लेते हैं। हमें अपने कुएं की सीमा को पहचानना होगा और उसके बाहर आने की कोशिश करनी होगी। जो अपने कुएं से जितनी जल्दी बाहर आ जाए, वह उसके लिए बेहतर होता है। लेकिन यह सवाल भी है कि हम क्यों अपने बनाए कुएं में ही रहना चाहते हैं और क्यों उसकी सीमा को नहीं तोड़ पाते हैं! दरअसल, हम एक सुरक्षित स्थान और वातावरण में जीने के आदी हो चुके होते हैं। हमें उस परिवेश के बाहर की दुनिया नहीं सुहाती, इसलिए हम अपने कुएं में रहना पसंद करते हैं। लेकिन सच यह भी है कि जिसने भी अपने कुएं की पहचान कर उससे बाहर आने की कोशिश की है, वह पहले अपने वातावरण और परिवेश से ही लड़ा है। अपनी कमजोरियों, आदतों और मजबूतियों से रूबरू हुआ है। यहां हमें हमारी सीमाएं नजर आती हैं या फिर क्षमताओं का अहसास होता है। हम कुछ देर के लिए नई परिस्थितियों में ढलने और चुनौतियों का सामना करने से डरते हैं। यह डर ही हमें हमारे कुएं में बनाए रखता है।

इसी तरह, हर पेशे की अपनी सीमाएं और चुनौतियां होती हैं जिन्हें पहचानने की आवश्यकता है। उस पेशे के लोग कई बार अपनी सीमाआें और कुएं को बरकरार रखने में ही सहजता महसूस करते हैं। अध्यापकों का तर्क यह होता है कि हमें तो पढ़ने का वक्त ही नहीं मिलता, बच्चे पढ़ना नहीं चाहते, हमें गैर-शैक्षणिक कामों में हमें लगा दिया जाता है आदि। इन तर्कों के पीछे हकीकत तो है, लेकिन उससे ज्यादा सुरक्षित रहने और खुद को लाचार साबित करने की लालसा अधिक है। यहां हमने अपने लिए कुएं का निर्माण किया कि परिस्थिति ही ऐसी है कि इससे बाहर नहीं निकल सकते। पढ़ने के लिए समय ही नहीं मिलता। गैर-शैक्षणिक कामों में झोंक दिया जाता है। जबकि कोशिश की जाए तो न केवल पढ़ने, बल्कि पढ़ाने के लिए भी समय निकाला जा सकता है।लेकिन हमें हमारे तर्क वे कुएं प्रदान करते हैं, जिनमें हम उन्हीं तर्कों की आड़ में जीना और रहना सीख लेते हैं। यही परिस्थिति हमें सुकून देने लगती है। अगर कोई बाहरी परिस्थिति और व्यक्ति हस्तक्षेप करता है और कुएं की पहचान करता है, तब हम आक्रोशित हो जाते हैं। हमें लगता है कोई हमें आईना दिखा रहा है। जबकि उसने सिर्फ हमें हमारे कुएं की पहचान कराई होती है। लेखकों के अपने तर्कजनित कुएं हैं। मसलन, पाठक नहीं रहे, लोग किताबों से दूर जा रहे हैं, किताबों के मूल्य ज्यादा हैं, प्रकाशक की दुनिया लेखक की दुनिया को नियंत्रित करती है आदि। इन तर्कों के पीछे सच्चाई भी होती है। लेकिन क्या इन सच्चाइयों को स्थायी मान कर प्रयास करना छोड़ देना चाहिए? क्या लेखकों को अपनी सीमा में रह कर बाजार के अनुकूल लिखना शुरू कर देना चाहिए? ये ऐसे प्रश्न हैं, जिनसे लेखकों को टकराने की आवश्यकता है।

नए ज्ञान, नई तकनीक, संचार के नए माध्यमों को भी अपने कुएं से लड़ना पड़ता है। हर काल-खंड में तकनीक, ज्ञान, संचार को एक संघर्ष के दौर से गुजरते हुए अपनी सीमाओं को तोड़ना पड़ा है। वर्तमान समय में भी तकनीक और ज्ञान-सूचना के संप्रेषण को उस मानसिक कुएं से रूबरू होना पड़ रहा है, जिन्हें लगता है कि तकनीक के विकास ने पाठकों को खत्म कर दिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो तकनीक हमारी जीवन शैली को सहज बनाने में कुछ बनी-बनाई चौहद््िदयां फलांगती है। इसमें कुछ दीवारें ढहती हैं। आधुनिक संदर्भ में ज्ञान और सूचना के महज प्रारूप बदले हैं। उसके उद््देश्य वही हैं, पाठकों तक पहुंचना। वह चाहे आॅनलाइन हो, पाम टॉप हो, किंडल हो या आइपैड। अगर किताबें पढ़ी जा रही हैं तो हमें क्यों नहीं खुश होना चाहिए कि लोग पढ़ तो रहे हैं! स्वरूप कोई भी हो। अगर मुद्रित सामग्री या किताबें नहीं पढ़ी जा रही हैं तो उसे छापने में प्रकाशक क्यों पैसे लगाने लगे!
हम अपने जीवन में भी कई कुएं बना कर उन्हीं में अपनी जिंदगी बसर करते हैं। हमें अपने कुएं से बाहर आना होगा, तभी हमें हमारी क्षमता और कौशल को विकसित होने का अवसर मिल पाएगा। वरना ताउम्र यही तर्क बुनते रहेंगे कि अवसर नहीं मिला, वरना क्षमता तो थी ही। अगर क्षमता है तो अपनी सीमा को पहचान कर उसे विकसित करना होगा। वक्त निकालना पड़ता है खुद की पहचान बनाने और विकसित करने के लिए। परिवेश निर्माण भी काफी हद तक हम पर निर्भर करता है। तर्क और मनोरचना करना आसान है, जिससे हम अपने चेतन मन को तो समझा लेते हैं, लेकिन अचेतन मन हमेशा हमें ही दुत्कारता है।

 

 

 

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