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दुनिया मेरे आगे- निराशा का बोझ

हाल ही में एक जन प्रतिनिधि से मुलाकात हुई तो उन्होेंने मेरे काम के बारे में भी जानना चाहा।
Author May 25, 2017 05:27 am
प्रतीकात्मक चित्र

कालू राम शर्मा   

हाल ही में एक जन प्रतिनिधि से मुलाकात हुई तो उन्होेंने मेरे काम के बारे में भी जानना चाहा। मैंने उन्हें स्कूली शिक्षा पर आधारित शिक्षकों के पेशेवर विकास और स्कूलों की व्यवस्था पर केंद्रित अपने काम के बारे में बताया। उन्होंने मेरे काम की तो तारीफ की, लेकिन यह भी कहा कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं, इसलिए उन स्कूलों को बंद ही कर देना चाहिए। फिर उन्होंने अपनी राय जाहिर की कि अब शिक्षक के रूप में वही लोग आते हैं, जिन्हें कहीं और नौकरी नहीं मिलती। यह भी कह गए कि समस्या यह है कि बच्चे भी कमजोर ही आते हैं सरकारी स्कूलों में। कमोबेश यही बातें जनमानस में भी घर कर चुकी हैं। सवाल है कि क्या सचमुच में सरकारी स्कूली शिक्षा का हाल इतना जर्जर है? क्या वाकई हमें खोजने पर भी कुछ शिक्षक नहीं मिलेंगे जो इस धारणा को खारिज करते हों? क्या वाकई सरकारी स्कूलों में जो बच्चे आते हैं वे कमजोर होते हैं?

दरअसल, हमारे स्कूली शिक्षा तंत्र में इस कदर निराशा का वातावरण पसरा हुआ है कि कहीं से उम्मीद की किरण नहीं दिखाई देती। अभी हो यह रहा है कि हर कहीं से नकारात्मकता और निराशा का माहौल वही लोग बनाने में लगे हुए हैं जो किसी न किसी प्रकार से स्कूली शिक्षा से संबद्ध हैं। यही हालत प्रशासनिक अधिकारियों की भी है जो अमूमन स्कूली शिक्षा को किसी न किसी रूप में प्रभावित करते रहते हैं। जनप्रतिनिधि या कोई अधिकारी जब जांच अधिकारी के रूप में स्कूल में जाते हैं तो उनके पहुंचने पर माहौल में गरमाहट और खुशहाली नहीं होती, बल्कि घबराहट का वातावरण छा जाता है। अगर कुछ अधिकारी आपस में चर्चा करते हैं तो वे शिक्षा जगत को लेकर निराशाजनक बातें ही करते दिखते हैं। शिक्षकों के बीच जब वे होते हैं तो उन्हें प्रेरित करने के बजाय उनके बारे में ऐसा कुछ कह डालते हैं कि शिक्षकों का मनोबल टूटता है। मेरा अनुभव यह है कि शिक्षकों के प्रशिक्षण में अधिकांश वक्त शिक्षकों पर ताना ही कसा जाता है और उन्हें झिड़कियां सुनने को मिलती हैं। अगर शिक्षक प्रशिक्षणों के सकारात्मक परिणाम हमें प्राप्त नहीं हुए हैं तो मेरी नजर में यह एक प्रमुख कारण है। जो शिक्षक बेहतर काम करते हैं, वे भी निराश हो जाते हैं। ऐसी घटनाएं अखबारों की सुर्खियां बनती हैं और फिर समाज में भी सरकारी स्कूलों को लेकर एक निराशाजनक स्थिति बनती है। शिक्षकों की नियति कुछ इस प्रकार की बना दी गई है, उन्हें लगता है कि वे कुछ कर नहीं सकते। उन्हें स्कूल को चलाने के लिए जिस सकारात्मक सोच की आवश्यकता होती है, वह उनमें विकसित ही नहीं होने दी जाती। शिक्षकों को वह जिम्मेदारी का आभास नहीं करवाया जाता कि वे अपने स्कूल को सीखने-सिखाने के नजरिए से उसे भौतिक रूप से सजा-संवार सकते हैं।

दरअसल, स्कूल एक इकाई के रूप में है, जहां शिक्षक हैं, बच्चे हैं, भौतिक रूप में स्कूल का भवन, परिसर और उसमें जरूरी सामग्री है। यह कैसी विडंबना है कि हम शिक्षकों पर इतना भी भरोसा नहीं जताते कि वे एक स्कूल को बेहतर बना सकते हैं! मैंने ऐसे कई वाकये देखे हैं जहां कोई अधिकारी स्कूल में जाता है तो इस आशंका के साथ कि स्कूल में कुछ होता नहीं है। वहां शिक्षक और अधिकारी के बीच मालिक और नौकर-सा रिश्ता लगता है। स्कूल में वह बच्चों से परिभाषाएं, पहाड़े, वर्णमाला वगैरह पूछता है। वह बच्चों और शिक्षक से शक और दंड की बुनियाद पर पेश आता है। यह बेवजह नहीं है कि स्कूली शिक्षा में निराशा और हताशा का आलम यहां तक है कि शिक्षक खुद अपने ही तंत्र के बारे में कुछ सार्थक सोच नहीं पाता।हाल ही में शिक्षकों की एक बैठक में चर्चा का विषय यह था कि शिक्षा की बेहतरी के लिए किस प्रकार के बदलाव अपेक्षित हैं। वहां एक शिक्षक की पीड़ा थी कि जन शिक्षा केंद्रों पर जिन शैक्षिक बैठकों का आयोजन किया जाता है, वे अर्थहीन और उबाऊ होती हैं इसलिए उन्हें बंद कर देना चाहिए। मैंने उनसे कहा कि इन बैठकों को हम समृद्ध बनाने के बारे में सोचें, न कि बंद करने के लिए। हम इन बैठकों में जान फूंकने को लेकर क्या कदम उठा सकते हैं? गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में एक योजना के तहत ‘शैक्षिक संवाद’ की शुरुआत की गई जिसका मकसद जन शिक्षा केंद्रों पर प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों के बीच अपने शैक्षिक अनुभवों को साझा करना और सीखने-सिखाने को लेकर विमर्श को बढ़ावा देना है। लेकिन समस्या यह है कि स्कूलों के सकारात्मक पहलुओं को हमारे शिक्षा जगत में प्रसारित करने की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसा नहीं है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक, शिक्षा के अधिकारी बेहतर काम नहीं कर रहे हैं। लेकिन उनका अच्छा काम भी निराशा के तले दब जाता है।

 

 

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  1. J
    jameel shafakhana
    May 25, 2017 at 1:24 pm
    har din bistar par puri raat dhoom macha dega ye Nuskha : treatment me asantusht ladki ko daily santusht kar dega ye nuskha 60 din me ko lamba mota or seedha tight karne ki achook dawai kya tanav, josh ate hi nikal jata hai or dheela pad jata hai iska kamyab ilaj? : jameelshafakhana /
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