duniya mere aage about praising can Increase morale of subordinate employees - दुनिया मेरे आगे: दो मीठे बोल - Jansatta
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दुनिया मेरे आगे: दो मीठे बोल

प्रशंसा के दो मीठे बोल अधीनस्थ कर्मचारियों का मनोबल कितना बढ़ा सकते हैं, इसका अंदाज अगर हर समय भौहें तनी रखे वाले अधिकारियों को हो जाए तो उनके त्रस्त अधीनस्थों के कार्यकौशल में अद्भुत सुधार आ जाए।

प्रतीकात्मक चित्र

पिछले दिनों वायुसेना के एक समारोह में शामिल होने का अवसर मिला जिसमें वायु सेनाध्यक्ष, कई ऊंचे स्तर से लेकर कनिष्ठ स्तर तक के अधिकारियों के अलावा तमाम सेवारत और सेवानिवृत्त कर्मचारी भी उपस्थित थे। वायुसेना में कई दशक बिता कर सेवानिवृत्त होने के कारण वहां का हर कार्यकलाप मुझे मुग्ध कर रहा था। शायद इसलिए कि मैं वहां आनंद भरे कुछ क्षण बिताने के लिए आया था। वर्षों तक सैन्यजीवन से दूर रहने के बाद एक बार फिर उस माहौल की जिस खूबी पर सबसे अधिक गर्व हुआ, वह था अधिकारियों और मातहतों के बीच का सौहार्द। सैन्यजीवन से अपरिचित लोग आमतौर पर अनुमान लगाते हैं कि नियमों की सख्त पाबंदी और कड़े अनुशासन की नकेल ही सैन्यतंत्र को सुचारु रूप से चलाती है। लेकिन असलियत कुछ और है।

दरअसल, हर नियम का अपवाद खोज लेने में और किसी भी आदेश का अनुपालन क्यों नहीं संभव हो सकता, इसके कारण जुटाने में एक औसत भारतीय का दिमाग खूब चलता है। सब जानते हैं कि सेना में सवाल उठाने और मुंहजोरी करने का प्रश्न नहीं उठता, यहां केवल करो या मरो का मंत्र काम करता है। लेकिन क्या केवल वेतन और सुविधाएं ही किसी को अपना जीवन उत्सर्ग करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं? भाड़े के टट्टू सीमित ध्येय और सीमित समय के लिए भले मौत का खतरा उठा लें, लेकिन एक विशाल सेना को केवल सिक्कों की झंकार सुना कर स्थायी रूप से जीवन-मरण का खेल खेलने के लिए तैयार नहीं रखा जा सकता। सैनिक के हृदय में स्वदेश का प्यार एक ऐसे जज्बे के रूप में रहना आवश्यक है, जिसके आगे मृत्यु का भय भी अर्थहीन हो।

लेकिन जैसे अरबी घोड़े को भी अपनी चाल दिखाने के लिए कुशल घुड़सवार की जरूरत होती है, देशभक्ति से लबालब सैनिकों को भी मातृभूमि पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने को प्रेरित करने के लिए सफल नेतृत्व की आवश्यकता होती है। अपने अगुवा में अटूट आस्था न हो तो तमाम कायदे-कानून धरे रह जाएंगे और मृत्यु के जबड़े में झांकने से पहले हर सैनिक दिए गए आदेश का औचित्य तय करने लग जाएगा। बेहिचक हर आदेश का पालन करा सके, ऐसे नेतृत्व के लिए अगुवा की योग्यता और विवेक में आस्था होना आवश्यक है जो जन्म लेती है इस विश्वास से कि अगुवा हर हाल में अपने अधीनस्थों की सुविधा, सुरक्षा और कल्याण को अपने निजी कल्याण पर वरीयता देगा। सैन्य सेवाओं में अफसरों और मातहतों के बीच शत-प्रतिशत विश्वास और सौहार्द एक अनिवार्यता है। प्रशिक्षण के दौरान सैन्य अधिकारियों के मानस में यही मंत्र कूट-कूट कर भरा जाता है।

विश्वास और वफादारी लंबी-चौड़ी बातों और ऊंचे-ऊंचे उसूलों की दुहाई देने से नहीं जीते जा सकते। दिन-प्रतिदिन के कार्यकलाप में छोटी-छोटी बातों में सहृदयता का परिचय देकर अधिकारी अपने मातहतों का विश्वास और प्यार जीत सकते हैं, बशर्ते उनके मन में यह अहसास हो कि मातहत भी एक इंसान है। इस जगह पर आकर सैन्य और नागरिक क्षेत्रों में अधिकारियों के व्यवहार में एक स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। सेना में जहां मातहत का अपने अधिकारी का सामना होते ही सैल्यूट करने का चलन है, वहीं अधिकारी के लिए भी किसी अभिवादन का गर्मजोशी से उत्तर देना एक कर्तव्य माना जाता है।

लेकिन नागरिक सेवाओं और निजी क्षेत्र में अक्सर बड़े पदाधिकारी अपने मातहतों के अभिवादन के जवाब में सिर हिला देने भर का भी कष्ट नहीं करते। उनके अभिवादनों को अपना ‘दैवी’ अधिकार समझते हुए वे ऐसे निकल जाते हैं, जैसे छोटे-मोटे कर्मचारियों से निकटता दिखाने से उनके महान पद की गरिमा आहत हो जाएगी। दिन भर गाड़ी में बिठा कर इधर से उधर भागते रहने वाले ड्राइवर को दिन की अंतिम विदाई के समय छोटा-सा एक धन्यवाद देते समय सैन्य अधिकारी यह नहीं सोचते कि जिस काम का उसे वेतन मिलता है उसके लिए धन्यवाद क्या देना! किसी उत्सव में भोज के बाद उपस्थित वरिष्ठतम अधिकारी द्वारा रसोई में जाकर रसोइयों को धन्यवाद देने की परंपरा भी इसी सोच से उपजी है।

प्रशंसा के दो मीठे बोल अधीनस्थ कर्मचारियों का मनोबल कितना बढ़ा सकते हैं, इसका अंदाज अगर हर समय भौहें तनी रखे वाले अधिकारियों को हो जाए तो उनके त्रस्त अधीनस्थों के कार्यकौशल में अद्भुत सुधार आ जाए। इसी तरह अधीनस्थों के परिवार के बारे में जानकारी रखना और उनका कुशल-क्षेम पूछते रहना भी अच्छे नेतृत्व की निशानी है। प्रथम दृष्टया इन छोटी-छोटी बातों से किसी संस्थान के सदस्यों के मनोबल को जोड़ना कठिन लग सकता है, लेकिन फौजियों को खूब पता होता है कि अचूक निशाना लगाने के लिए आधुनिकतम राइफल की नली में भी वही पुरानी पुलथ्रू कहलाने वाली डोर डालकर नियमित रूप से सफाई करना और तेल डालना कितना आवश्यक है।

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