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दुनिया मेरे आगेः नया रास्ता

भीड़ के साथ चलना और भीड़ से अलग चलना- दो अलग बातें हैं। ज्यादातर लोग भीड़ के साथ चलने वाले होते हैं। भीड़ से अलग विरले ही चल पाते हैं। हमारे समाज की बनी-बनाई मान्यताओं को मान कर चलना कितना आसान है और उन्हें तोड़ कर, इसी समाज में रहना कितना कष्टदायक है!

Author April 17, 2019 3:13 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

मोनिका अग्रवाल

भीड़ के साथ चलना और भीड़ से अलग चलना- दो अलग बातें हैं। ज्यादातर लोग भीड़ के साथ चलने वाले होते हैं। भीड़ से अलग विरले ही चल पाते हैं। हमारे समाज की बनी-बनाई मान्यताओं को मान कर चलना कितना आसान है और उन्हें तोड़ कर, इसी समाज में रहना कितना कष्टदायक है! समाज ऐसे लोगों को शुरू में स्वीकार करे या नहीं करे, पर ऐसे विशिष्ट व्यक्तित्व वाले लोग ही आखिर में याद किए जाते हैं जो पूर्व स्थापित परंपराओं को न अपना कर अपने ही प्रतिमान स्थापित करते हैं। भीड़ से अलग भीड़ से जुदा। ग़ालिब का एक शेर है- ‘वैसे तो दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे/ कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे-बयां और’! आजकल जहां-तहां विज्ञापन, सोशल मीडिया भी यही या इससे मिलते-जुलते संदेश प्रसारित करता है- ‘चुनो अलग रास्ता! अपनी राह खुद बनाओ’! कितनी सटीक बात है। झुंड में तो भेड़-बकरियां रहती हैं। शेर अकेला ही घूमता है। शायद इसीलिए यह कहा जाता है कि जनता क्या है, भेड़-बकरियों की तरह जो किसी की हांक पर जहां-तहां को चलती जाएगी। यानी बिना दिमाग का इस्तेमाल किए ‘शेर’ का राज कायम रखने को। जंगल में राज चाहे ‘शेर’ का हो, वह ‘जंगल-राज’ ही कहा जाता है।

आज हमारे समाज में कितने ही ऐसे रिवाज हैं, जो जब बनाए गए थे, तब के समय और परिवेश में उनका महत्त्व था। पर आज उससे बिल्कुल बदली हुई परिस्थितियों में भी हम उनका ज्यों का त्यों पालन करते हैं। मसलन, रात को झाड़ू नहीं लगाना, रात को नाखून नहीं काटना। असल में ये नियम तब थे, जब बिजली नहीं हुआ करती थी। रात को झाड़ू लगाने से कोई कीमती चीज कूड़े में जा सकती थी। या फिर नाखून काटने से अपर्याप्त रोशनी में अंगुलियां कट सकती थीं।

मगर हम लकीर के फकीर हैं। इसलिए बिना दिमाग लगाए परंपरा को निभाते चले जाते हैं। उदाहरण के तौर पर हम सब भारत में कूड़े की समस्या को दिखा सकते हैं। पर क्या कभी हमने सोचा है कि उस प्रदूषण में हम सब चाहे-अनचाहे कितनी भागीदारी करते हैं! बस से उतरे, टिकट फाड़ी और मरोड़ कर वहीं फेंक दी। पान खाया, वहीं थूक दिया। केला खाया, छिलका कहीं भी फेंक दिया। चाट खाई, पत्ते धीरे-से वहीं एक तरफ सरका दिए। भंडारा किया, पत्तलें वहीं फेंक कर एक ढेर खड़ा कर दिया। न जाने ऐसे कितने काम हम सब जाने-अनजाने करते हैं। दूसरी ओर हम सब पाश्चात्य शैली को बहुत मन से अपनाते हैं तो क्यों नहीं हम सफाई के लिए भी विदेशी परंपरा को आत्मसात करते हैं? अगर हम ऐसा ही विदेश में करें तो भारी जुर्माना देना पड़ेगा। हममें से कोई भी भारतीय जब विदेश यात्रा पर जाता है तो पूरी तरह से इस बात का ध्यान रखता है। यानी हम वहां जाकर सुधर जाते हैं। तो फिर यही दृष्टिकोण अपने देश में क्यों नहीं अपना सकते? कहावत है, ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’! पर बूंद-बूंद से तो समंदर बनता है। अगर हम सब भीड़ की तरह न करके अपना कचरा खुद संभाल कर फेंकें, तो सोचिए भला प्रदूषण कैसे होगा?

जीवन में इसी तरह किसी भी क्षेत्र में बने-बनाए रास्ते पर चलना बहुत आसान है। जंगल काट कर पगडंडी तैयार करना बहुत ही कठिन कार्य है। ऐसा करने से ही न केवल हमें रचनात्मक संतुष्टि मिलती है, बल्कि आपकी अपनी पहचान भी स्थापित होती है। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए या भीड़ से अलग दिखने के लिए लीक से हट कर चलना होगा। इसके लिए इंतजार किस बात का? जीवन में कभी समझौता नहीं करें। हम अपने भाग्य के निर्माता और विधाता खुद हैं। हम सरल बनें, माफ करना सीखें। सबसे जरूरी है कि सफलता पाने के लिए अपनी सुविधा की जंजीरों को तोड़ डालें।

बंधे-बंधाए ढर्रे को अपनाना, पुरानी लीक पर चलना क्या सफलता की गारंटी हो सकती है? नहीं! इस बात की कोई गारंटी कैसे ले सकता है कि यह नुस्खा ही सवश्रेष्ठ है और हम सफल कहलाएंगे। किसी भी काम को जिसे आप सफलतापूर्वक पूरा कर चुके हों, उसे और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है? बस अपने क्षेत्र में सतत प्रयत्नशील रहना जरूरी है। आज सार्वजनिक जीवन और कार्यक्षेत्र में जितनी महिलाएं दिख रही हैं, उनमें से कई पहले महिलाओं के लिए निषिद्ध क्षेत्र रहे हैं। उन सबमें किसी न किसी महिला ने पहली बार कदम रखा होगा। उसके बाद वह शृंखला कायम हो गई होगी और उन क्षेत्रों में महिलाओं के लिए रास्ते ही खुल गए। इस प्रकार कुछ अलग करके हम समय की स्लेट पर खुद अपने हस्ताक्षर अंकित कर सकते हैं। आवश्यकता है बस पहल शक्ति की, शुरुआत की। कभी हम भी अपने भीतर के कोलंबस को जगाएं और नए रास्तों की खोज करें। ‘लीक पर वे चलें जिनके कदम थके और हारे हैं/ हमें तो बस अपने बनाए पथ ही प्यारे हैं।’

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