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दुनिया मेरे आगे- सवालों का सामना

प्रार्थना शुरू करने से पहले कुछ श्रद्धालु आसपास कटोरे में दूध भर कर रखते हैं और प्रार्थना के बाद दूध के कटोरों को उठा कर अलग रख देते हैं। जिज्ञासावश मेरा ध्यान उन दूध के कटोरों की ओर गया।

प्रतीकात्मक चित्र।

हाल ही में दोस्तों के साथ घूमते हुए मुझे एक धार्मिक स्थल पर जाने का मौका मिला। वहां मैंने देखा कि सभी लोग सुबह सूर्य निकलने से पहले प्रार्थना के लिए इकट्ठा होते हैं, फिर आंखें बंद कर शांति से प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना शुरू करने से पहले कुछ श्रद्धालु आसपास कटोरे में दूध भर कर रखते हैं और प्रार्थना के बाद दूध के कटोरों को उठा कर अलग रख देते हैं। जिज्ञासावश मेरा ध्यान उन दूध के कटोरों की ओर गया। मन में प्रश्न उठा कि प्रार्थना से पहले दूध के कटोरे क्यों रखे जाते हैं? क्या दूध का प्रार्थना से कोई संबंध है? आखिर मैंने हिम्मत कर एक श्रद्धालु से पूछा- ‘आप प्रार्थना शुरू करने से पहले कटोरों में दूध क्यों रखते हैं?’ श्रद्धालु ने संक्षेप में उत्तर दिया- ‘मुझे नहीं मालूम! यहां प्रार्थना से पहले कटोरों में दूध रखने की परंपरा है।’ श्रद्धालु का उत्तर सुन कर मेरे मन में दूध के कटोरों के प्रति जिज्ञासा बढ़ गई।

फिर मैंने वहां मौजूद अन्य लोगों से इस विषय पर बात की। लेकिन किसी भी को नहीं पता था कि आखिर प्रार्थना से पहले आसपास कटोरे में दूध क्यों रखा जाता है। सभी लोगों ने इसे परंपरा के तौर पर देखा और माना। आखिर एक श्रद्धालु मुझे धार्मिक स्थल पर ही रहने वाले एक काफी उम्रदराज बाबा के पास लेकर गया और बोला- ‘आप बाबा से पूछ लीजिए, शायद वे आपको कुछ बता पाएं।’ जब वहां मैंने अपना प्रश्न दोहराया तो उन्होंने मुझे बताया- ‘आज से लगभग साठ वर्ष पहले, जब लोग यहां पर प्रार्थना के लिए इकट्ठा होते थे तब प्रार्थना के समय कुछ बिल्लियां यहां आकर आपस में झगड़ने लगती थीं। बिल्लियों के शोर से सभी का ध्यान भंग होता था। बिल्लियों को भगाने के लिए अनेक उपाय आजमाए गए। लेकिन सभी उपाय विफल रहे। हम बिल्लियों को केवल प्यार से भगाना चाहते थे, इसलिए मुश्किल हो रहा था। आखिर गुरुजी को एक उपाय सूझा कि बिल्लियों के लिए कटोरे में दूध रख दिया जाए, ताकि प्रार्थना के समय बिल्लियां एक-दूसरे से न झगड़ें और दूध पीने में व्यस्त रहें। यह उपाय सफल रहा और तब से प्रार्थना के समय कटोरे में दूध रखा जाने लगा। फिर समय के साथ बिल्लियां तो खत्म हो गर्इं या कहीं और चली गर्इं, लेकिन यह यहां की परंपरा का हिस्सा बन गया!’

आमतौर पर घर-परिवार और हमारे आसपास अनेक ऐसी आस्था और परंपराएं देखने के लिए मिलती हैं, जिनका उद्देश्य हमें पता नहीं होता है और हम घर-परिवार के बड़ों और धार्मिक गुरु के कहने पर बिना समझ के साथ उनको मान रहे होते हैं। मुझे याद है कि बचपन में दादाजी के एक मित्र हमारे घर आते थे, तब हम सभी बच्चों को वे धार्मिक उपदेश बोल कर सुनाते थे। एक दिन वे सभी बच्चों को बताने लगे- ‘पूरी दुनिया को ईश्वर ने बनाया है। ईश्वर बहुत दयालु है, इसलिए रोजाना हमें ईश्वर को याद करना चाहिए।’ तभी मैंने जिज्ञासावश उनसे पूछा- ‘अगर पूरी दुनिया को ईश्वर ने बनाया है तो फिर ईश्वर को किसने बनाया है?’ मेरा प्रश्न सुनते ही वे गुस्से में आ गए और तेज आवाज में बोले- ‘अभी तौबा करो! ईश्वर के बारे में सवाल नहीं पूछते हैं। अगर दोबारा सवाल पूछा तो तुम्हें गुनाह का दंड मिलेगा।’उस समय उनकी बात सुन कर मैं डर गया और मुझे लगा कि शायद मैंने बहुत ही गलत प्रश्न पूछ लिया है। फिर गुनाह के डर से मैंने दोबारा किसी से वह प्रश्न नहीं पूछा। हालांकि उस प्रश्न को लेकर मेरे मन में जिज्ञासा बनी रही। जब मैंने खुद धार्मिक ग्रंथ को पढ़ा तो उसमें मेरे प्रश्न का उत्तर लिखा था। अब उस ग्रंथ में लिखी बात कितनी सही है या नहीं, यह तो नहीं पता। लेकिन उस समय मुझे लगा कि शायद दादाजी के मित्र को उस प्रश्न का उत्तर नहीं पता था, इसलिए उन्होंने मुझे डांटा या फिर उन्हें भी किसी ने ऐसा प्रश्न पूछने पर डांटा होगा।

मुझे अपने जीवन अनुभवों के आधार पर लगता है कि बचपन से ही इसके लिए हमारा अनुकूलन किया जाता है कि हमें आस्था और परंपराओं पर सवाल नहीं उठाना चाहिए। इस वजह से धीरे-धीरे हमारे मन में आस्था और परंपराओं पर कोई सवाल नहीं उठाने की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है। फिर हम सवाल करना बंद कर देते हैं और बिना समझ के आस्था और परंपराओं को मानने लगते हैं। मेरा मानना है कि जब भी किसी बच्चे को आस्था या परंपरा के बारे में जानकारी दी जाए तो उसके बारे में उसे विस्तार से बताया जाए। बच्चे के हर सवाल का जवाब देने का प्रयास किया जाए, ताकि बच्चे के भीतर एक समझ का विकास हो और वह किसी परंपरा को बिना किसी सवाल के मानने के बजाय उसके बारे में जानने की कोशिश करे।

 

 

 

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