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दुनिया मेरे आगेः कुदरत में हिस्सेदारी

बारहमासा नदियों के घर में ज्यादातर समय अब सिर्फ पत्थर-बजरी दिखाई देते हैं। वे बताते हैं कि यहां कभी एक नदी हुआ करती थी, जो अब बरसाती नदियां होकर रह गई हैं, जिनके दायरे में हमारी बस्तियां उग आई हैं। लगता है कि नदियां भी यह फैसला कर चुकी हैं कि वे अपना हक लेकर रहेंगी।

Author Published on: August 24, 2019 2:50 AM
अपनी छोटी-सी चोंच से कुरेद कर वह उनकी खुशबू हवा में फैला देगी। चिड़िया के ठीक बाद गिलहरी की बारी है। वह भी उसी शाख पर उछल-कूद मचा रही है। क्या पता उसे भी अमरूद अच्छे लगते हों! स्कूल से लौटते उस बच्चे की निगाह भी अमरूदों पर पड़ चुकी है। (Photo-Youtube)

वर्षा सिंह

मेरी खिड़की के उस पार तोतों का एक दल अभी-अभी उड़ कर गया है। घर के पिछले हिस्से में बोए गए मक्के अब तोड़ने लायक हो गए हैं। परिंदे उस पर अपना अधिकार जमाने आ पहुंचे हैं। वे सारी मक्कियां चख-चख के न छोड़ दें, इसलिए मेरी पड़ोसन अपने छोटे-से खेत में डंडी पर शर्ट लगा कर और मटका टांग कर उन्हें डराने की भरसक कोशिश कर रही है। लेकिन परिंदे भी कहां हार मानने वाले हैं! वे तय कर चुके हैं कि अपना हिस्सा लेकर रहेंगे।

लगातार बारिश से तर जमीन पर पड़ती चटक धूप तितलियों को भी भा रही है। वे जितना ऊंचा उड़ सकती हैं, उड़ने की पूरी कोशिश कर रही हैं। बारिश में धुले-धुले पेड़-पौधे, आंवले के फल आने की आहट, कद्दू के पीले फूल, अपने पूरे कद में बढ़ गई भिंडी, इस सीजन को अलविदा कहता चीकू, खूब सारी मिठास बांटने के बाद सुस्ताते आम के पेड़, थोड़े विराम के बाद अगले मौसम की तैयारी करेंगे, बारिश-धूप हवा-मिट्टी-पानी, कीट-पतंगों के कुदरती संयोजन पर टिका इनका जीवन, मेरे कमरे की खिड़की के पार, धरती के इस टुकड़े पर ऊर्जा से भरपूर एक सुंदर चित्र रचता है।

बारिश के पानी में पूरी तरह भीगे अगस्त के इस तीसरे हफ्ते में जब हम कुदरत को उसका शुक्रिया अदा कर सकते थे, उसी समय में हिमालय पर उफनी नदियां विकास के सारे नारे तोड़ रही हैं। घर टूट रहे हैं, दुकानें और सड़कें टूट रही हैं। पहाड़ पत्थर बरसा रहे हैं। नदियां अपने तेज बहाव में सब कुछ ले जाने पर आमादा हैं। बच्चे-बूढ़े सब। नदियां हमसे गुस्साई हुई हैं, नाराज हैं। हमने उनका आंगन छीन लिया है। बारिश में जब खूब पानी आता था तो वे दोनों बाहें पसार कर अपने आंगन तक पसर जाती थीं। गरमी में झुलसते जिस्म के साथ बेबस होती वे भी बारिशों का इंतजार करती होंगी, जब वे लौटेंगी अपने पुराने स्वरूप में।

बारहमासा नदियों के घर में ज्यादातर समय अब सिर्फ पत्थर-बजरी दिखाई देते हैं। वे बताते हैं कि यहां कभी एक नदी हुआ करती थी, जो अब बरसाती नदियां होकर रह गई हैं, जिनके दायरे में हमारी बस्तियां उग आई हैं। लगता है कि नदियां भी यह फैसला कर चुकी हैं कि वे अपना हक लेकर रहेंगी। वे हमारे घरों में जबरन घुसेंगी। जैसे हम उनके घरों में घुस गए हैं। वे हमारे सामान बहा ले जाएंगी। हमारी सड़कें तोड़ ले जाएंगी। उत्तरकाशी हो या शिमला, हम अपने आंसुओं के साथ बेबस खड़े हैं। हमने नदियों के आंसू कब देखे हैं! नदियों के पास उनके खूब पसरने-खेलने भर जगह होनी ही चाहिए। हमारी चौड़ी सड़कों की जिद पूरी करने के लिए काटे गए पहाड़ भी गुस्साए हुए हैं। वे टूट-टूट कर गिर रहे हैं जिनकी पहले से कमजोर दीवारों को काट कर हमने और खोखला कर दिया है।
अमरूद के एक पेड़ से एक छोटी चिड़िया अभी-अभी उड़ कर गई। वह इस समय तबाही का शोक मनाना नहीं चाहती। वह पक रहे अमरूदों का आनंद लेना चाहती है।

अपनी छोटी-सी चोंच से कुरेद कर वह उनकी खुशबू हवा में फैला देगी। चिड़िया के ठीक बाद गिलहरी की बारी है। वह भी उसी शाख पर उछल-कूद मचा रही है। क्या पता उसे भी अमरूद अच्छे लगते हों! स्कूल से लौटते उस बच्चे की निगाह भी अमरूदों पर पड़ चुकी है। वह आने-जाने वालों को गुजर जाने का समय देगा और फिर एक ऊंची छलांग लगाएगा, ताकि अमरूद उसकी पकड़ में आ जाएं। पेड़ों में हरकत होते देख कर दूसरी खिड़की से उस बूढ़े की आवाज आएगी, जिसने इन अमरूदों को पकने के लिए दो दिन का समय और दिया है। वह फिर उसे बड़े करीने से तोड़ेगा। लेकिन बच्चा काम अपना बखूबी अंजाम देकर जा चुका है। बूढ़ा अब दूसरे अमरूदों पर गौर करेगा। चिड़िया भी नया निशाना साधेगी।

आसमान में बादलों के आवागमन से होती धूप-छांव संदेश दे रही है कि बारिश फिर शुरू हो सकती है। घर के सारे काम पूरे कर थकी स्त्री का मन ऊबता है। वह अभी बाहर सूख रहे कपड़े उतारना नहीं चाहती। ऐसा लगता है कि ये चमत्कारी खिड़की, जिससे जीवन इतना समृद्ध और हरा-भरा दिखता है, सबके घरों में, सबके हिस्से में होनी चाहिए। खिड़की के उस पार आम-आंवले, लीची-अमरूद के पेड़ होने ही चाहिए। फूलों के साथ कुछ सब्जियां भी होनी चाहिए, ताकि किसी समय यों ही कुछ ऐसे दृश्य दिख जाएं। तोतों का झुंड हमारे इर्द-गिर्द होना ही चाहिए। पकी हुई मक्कियों और अमरूदों में उनका हिस्सा तय होगा। ये सब होगा तभी तो हम चिड़िया के जूठे किए हुए मीठे अमरूद को चख सकेंगे। तितलियां नहीं होंगे तो जीवन में रंग कौन भरेगा? चकाचौंध भरे बाजारों, मॉल, होटलों से जब हम घर लौटें तो घर पर चिड़िया की मीठी धुन, गिलहरी की उछल-कूद मिलनी चाहिए!

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