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दुनिया मेरे आगेः नाम में छवियां

पहली नजर में किसी व्यक्ति, स्थान या वस्तु के नामकरण की प्रक्रिया सहज दिखती है और वास्तव में इसे सरल होना भी चाहिए।

प्रतीकात्मक चित्र

पहली नजर में किसी व्यक्ति, स्थान या वस्तु के नामकरण की प्रक्रिया सहज दिखती है और वास्तव में इसे सरल होना भी चाहिए। लेकिन आमतौर पर ऐसा संभव नहीं हो पाता है। दरअसल, मनुष्य का मानसिक विकास जिस प्रक्रिया के तहत होता है, उसमें सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक परिघटनाएं लगातार गतिशील रहती हैं। इसलिए किसी नामकरण की प्रक्रिया में भी एक निहित उद्देश्य कार्य कर रहा होता है। निर्मल वर्मा जब कह रहे होते हैं कि सत्य और सातत्य के स्रोत भाषा में होते हैं, तो वे इन्हीं प्रक्रियाओं की तरफ संकेत कर रहे होते हैं। इसमें भाषाई प्रयोग की जो सरणी बनती है, वह अपने समाज और संस्कृति को प्रतिबिंबित करती है।

हालांकि कई बार किसी नामकरण की प्रक्रिया में सादृश्यता का बोध भी काम करता रहता है। यानी जिसका नामकरण हो रहा है या उसके लिए कोई नाम प्रचलित हो रहा है, वह देखने में क्या प्रभाव पैदा कर रहा है। उदाहरण के तौर पर कंप्यूटर का एक सहयोगी उत्पाद ‘माउस’ के नामकरण में सादृश्यता का ही भाव है, अन्यथा कंप्यूटर और चूहे का क्या संबंध हो सकता है! इसी क्रम में व्यक्ति के नाम के रूप में लंबू, छोटू या कालू जैसे कई नाम व्यवहार में आ जाते हैं। जाहिर है, जिस व्यक्ति का नाम लंबू है, उसका कद सामान्य या औसत से ज्यादा दिखता है। इसी तरह छोटू या कालू जैसे कुछ नाम भी कद और रंग से प्रभावित हो सकते हैं।

कई नाम उपयोगिता या कार्य-पद्धति के आधार पर रखे जाते हैं। मसलन, कैलकुलेटर, बस स्टेशन और हवाई जहाज आदि। निश्चित रूप से ऐसे शब्दों का कोई सांस्कृतिक आधार नहीं होता है और इसकी व्यापकता अंग्रेजी मूल के शब्दों में अधिक मिलती है। वर्तमान समय में व्यक्ति के नामों, जैसे पिंटू, डुलडुल, बंटी और पम्मी जैसे शब्दों का शायद ही कोई अर्थपरक मूल होता होगा। लेकिन ऐसे नामों के मूल अंग्रेजी के प्रभाव को सहज महसूस किया जा सकता है। इन कुछ आधुनिक संदर्भों को छोड़ दें तो हमारा समाज और इसके नामकरण की प्रक्रिया में ऐसे तत्त्व मौजूद हैं, जिनका अर्थपरक संदर्भ किसी खास छोर तक जाता है। उसकी ग्राह्यता या अग्राह्यता की अपनी बहसें हो सकती हैं, लेकिन उन तक पहुंचने के लिए आवश्यक है कि उन पर बातचीत हो।

जाने-माने भाषाविद सस्यूर द्वारा दी गई संकल्पना में ‘संकेतक’ निष्पक्ष हो सकता है, लेकिन ‘संकेतित’ की व्याप्ति समाज की गतिकी और पारिस्थितिकी से लगातार जुड़ी रहती है। भारत के वृहत्तर लोक-जीवन की महत्तम आकांक्षा ‘मोक्ष’ की प्राप्ति रही है और उसका एक व्यापक संबंध भगवान के स्मरण से माना जाता रहा है। यही कारण है कि बहुधा परिवार में बच्चों का नाम देवी-देवताओं के नामों पर रखा जाता रहा है। राम, कृष्ण, विष्णु, शिव, दुर्गा, काली जैसे सैकड़ों नाम देश के लाखों लोगों के नाम या नामों के हिस्से में पाए जा सकते हैं। उनके भी जो आस्तिक हैं और उनके भी जो नास्तिक हैं।

दरअसल, नाम रखने का काम पिछली पीढ़ी का होता है और जब तक व्यक्ति चैतन्य होता है, तब तक परिवार द्वारा दिए गए एक प्रतीक के रूप में एक शब्द उसके साथ रूढ़ हो जाता है। लोक मान्यता में किसी रामबहादुर या दुर्गावती के संबोधन के तात्कालिक संदर्भों से परे एक स्थायी उद्देश्य जुड़ा होता है और वह है मोक्ष की प्राप्ति। इसलिए नामकरण की यह प्रवृत्ति सिर्फ व्यक्ति के नाम में ही नहीं, बल्कि स्थान के नाम में भी जुड़ी होती है। यही एक बड़ा कारण है कि देश में अगर किसी स्थान के नामों में कोई एक सबसे अधिक होगा, तो उनमें ‘रामपुर’ का नाम अवश्य होगा।

नामकरण का एक संदर्भ इतिहास की घटनाओं और पात्रों से भी जुड़ा होता है। इसमें अगर स्थान नाम में ‘रामपुर’ की व्याप्ति है, तो शिवाजी, अकबर, हुमायूं, शाहजहां, औरंगजेब और पृथ्वीराज के नाम पर भी सड़क या नगर मिल जाएंगे। यह क्रम आगे बढ़ने पर गांधी, नेहरू, आंबेडकर और सुभाषचंद्र बोस आदि के नाम पर भी बहुत कुछ मिल जाएगा। स्वतंत्रता के बाद भी अनेक चौक-चौराहे अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं के नाम पर देखने को मिल जाते हैं और तमाम पुराने नामों को बदलने का उपक्रम अपनी सुविधा के अनुसार चलता रहता है।

बहरहाल, इस संदर्भ में प्रोफेसर वृषभ प्रसाद जैन लिखते हैं कि ‘प्रतीक का प्रयोग ऐसे ही अनायास नहीं किया जाता है, बल्कि प्रतीक के प्रयोग के मूल में रचनाकार का एक उद्देश्य निरंतर बना रहता है।’ ऐसे रचनाकार बहुत चालाक होते हैं, जो अनायास ही इतिहास के अंग बन जाते हैं या बना दिए जाते हैं, फिर हमको और आपको समझा देते हैं कि ‘नाम में क्या रखा है!’

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