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दुनिया मेरे आगे: दुख के स्तर

दिन के उदास शुरू होने में कोई अनोखी बात नहीं होती। न ही यह विलक्षण होता है कि कहीं से कोई बुरी खबर आ जाए। लेकिन कोई बेवजह हानि उठाए या उसके सपने टूट जाएं तो बहुत दुख होता है।

Author April 28, 2018 3:22 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

आलोक रंजन

दिन के उदास शुरू होने में कोई अनोखी बात नहीं होती। न ही यह विलक्षण होता है कि कहीं से कोई बुरी खबर आ जाए। लेकिन कोई बेवजह हानि उठाए या उसके सपने टूट जाएं तो बहुत दुख होता है। पिछले दिनों हमारे विद्यालय के एक छात्र का चयन प्रतिष्ठित पेस्टालॉजी छात्रवृत्ति के लिए हो गया था और उसकी आगे की पढ़ाई लंदन में होने वाली थी। सुबह-सुबह पेस्टालॉजी वालों ने संदेश भेजा कि इस बार की छात्रवृत्ति स्थगित की जा रही है, देश भर से चुने गए चार छात्रों को खबर दे दी जाए। चार छात्रों को सूचित करना कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन इस खबर का असर क्या हुआ होगा, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है।

जब उसका चयन हुआ था, तब वह बहुत खुश था। वही क्यों, हम सब खुश थे। उस लड़के ने अपने दोस्तों को भोज भी दे दिया था। यही नहीं, जिस दिन बारहवीं कक्षा के विदाई समारोह की तस्वीर ली जा रही थी, उस दिन उसके साथ पहली बार ग्यारहवीं के छात्रों की तस्वीर ली गई। मतलब यह गर्व की बात थी कि हमारे यहां से कोई बच्चा आगे की पढ़ाई के लिए लंदन जाता। इस गर्व को हम सब साझा कर रहे थे। लेकिन इसके साथ यह बात भी थी कि उस लड़के की बड़ी मदद हो जाएगी, क्योंकि उसके पिता का देहांत हो चुका है और मां दैनिक मजदूरी करती है।

हालांकि अपनी यह मदद उसने खुद अपनी प्रतिभा के बल पर अर्जित की थी, लेकिन उसके उज्ज्वल भविष्य की खुशी सबको थी। विद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट में उसकी इस उपलब्धि को विद्यालय की उपलब्धि की तरह रखा गया था। इन सबके बीच उस छात्रवृत्ति के निरस्त हो जाने की बात सबको दुखी करने वाली ही थी। छात्र ने अपनी मेहनत से जो हासिल किया, वह एक ईमेल से छिन्न-भिन्न हो गया। छात्र के परिवार ने इस पर गर्व किया होगा और अपने रिश्ते-नाते में इस खबर को खूब प्रसारित किया होगा। इस पर गर्व करने वाले संबंधी भी होंगे और ईर्ष्या से जलने वाले भी। अपने मित्रों में छात्र अलग लगने लगा। उसका भविष्य बेहतर नजर आने लगा था। लेकिन अब सब बेमानी। सारी प्रशंसा, सारे आयोजन, सारा सम्मान एक झटके में शून्य हो गया। हो सकता है ईर्ष्या करने वालों ने यह भी कहा हो कि चयन की खबर ही झूठी थी। बच्चा अपनी मां के साथ मेरे पास आया। वे दोनों बहुत जतन से मुस्कराने की चेष्टा कर रहे थे, लेकिन मैं मुस्करा नहीं पा रहा था। मैं बस इतना ही कह पाया कि ‘तुम यहां रह कर भी बहुत बढ़िया करोगे।’

वे जब चले गए तो एक बड़ा सवाल सामने आ गया। इस पूरी प्रक्रिया में छात्र ने अपनी सीमा से बाहर जाकर काफी पैसे खर्च किए। बाहर की संस्था के लिए अंग्रेजी बहुत जरूरी होती है। उसके लिए आईईएलटीएस में उत्तीर्ण होना होता है। उसकी तैयारी करवाने वाले संस्थान भी एक बड़ी रकम लेते हैं। हमारे छात्र ने आईईएलटीएस की कोचिंग के साथ-साथ कुछ विषयों के लिए ट्यूशन भी ली। इन सबमें लगे पैसे पानी में चले गए।

पेस्टालॉजी या कोई अन्य अपने आवेदन पत्र में और अपने आयोजनों में बार-बार यह रेखांकित कर देते हैं कि ‘इसे बिना किसी पूर्व सूचना के बंद किया जा सकता है’, ठीक विज्ञापनों के ‘शर्तें लागू’ की तरह। विज्ञापनों के ‘शर्तें लागू’ के नियम को तो हाल में लोग गंभीरता से लेने लगे हैं, लेकिन एक प्रतिष्ठित संस्था के लिए यह बिल्कुल नई बात थी। पेस्टालॉजी वाले जानते हैं कि दुनिया भर से छात्र उनकी इस छात्रवृत्ति के लिए आवेदन करते हैं और दुनिया भर में अंग्रेजी एक समान नहीं है। जबकि अंग्रेजी की परीक्षा उनके और ब्रिटिश मानकों के आधार पर ही होगी। इसलिए खास उसकी तैयारी के लिए पैसे बहुत लगते हैं। जिस ईमेल में इस छात्रवृत्ति के निरस्त होने की बात थी, उसी में कहा गया कि वे मां-बाप को हुई आर्थिक हानि की भरपाई करेंगे, लेकिन यह भी कह दिया कि किसी भी तरह की ‘ट्यूशन फीस’ की भरपाई नहीं होगी, क्योंकि वे ट्यूशन को प्रोत्साहित नहीं करते। मतलब भावनात्मक नुकसान के साथ-साथ आर्थिक नुकसान भी!

आमतौर पर हम आर्थिक हानि को यह सोच कर नगण्य ही मानते हैं कि पैसा फिर से कमा लिया जाएगा। लेकिन जिस आर्थिक पृष्ठभूमि से हमारे विद्यालय का वह छात्र या उसकी तरह के दूसरे बच्चे आते हैं, उनके लिए आर्थिक हानि भी बहुत मायने रखती है। इस तरह एक महत्त्वपूर्ण छात्रवृत्ति के लिए चुन लेने के बाद उसे रद्द करने के फैसले से मुझे दुख के कई स्तर दिखने लगे हैं।

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