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दुनिया मेरे आगे- भ्रम का भविष्य

हमारा देश दुनिया की बड़ी ताकत बनने जा रहा है और प्रयास, विज्ञान के शिखर पर नए मुहावरे गढ़ रहा है। ऐसे में अखबार के साथ आए एक मजेदार पर्चे को पढ़ते हुए हंसी आने लगी।

प्रतीकात्मक चीत्र।

संतोष उत्सुक

हमारा देश दुनिया की बड़ी ताकत बनने जा रहा है और प्रयास, विज्ञान के शिखर पर नए मुहावरे गढ़ रहा है। ऐसे में अखबार के साथ आए एक मजेदार पर्चे को पढ़ते हुए हंसी आने लगी। पर्चे में लिखा था- ‘आपके शहर में स्थायी ज्योतिषी काली उपासक, नूरी हजूरी, काले इल्म के माहिर, हर इल्म की काट, हस्त रेखा, मस्तक रेखा, जन्मपत्री, फोटो दिखा कर अपने जीवन का संपूर्ण हाल जानें। आपकी आर्थिक, मानसिक, पारिवारिक समस्याएं, नौकरी में तरक्की या रुकावट, शादी में बाधा या देरी, घर-परिवार मकान बनाने में अड़चन रुकावट या मन नहीं लगना, विदेश यात्रा न होना, व्यापार में लाभ-हानि, प्रेम विवाह में रुकावट, संतान सुख पाने के लिए, फेल को पास कराने, सौतन से छुटकारा आदि समस्याओं के अलावा कालसर्प, मांगलिक दोष निवारण के लिए पूजा और हर काम का समाधान किया जाता है।’

इतने मुश्किल और बड़े ‘दोष निवारक’ के नाम के साथ लिखा हुआ था- ‘एक प्रश्न की फीस मात्र इक्यानवे रुपए।’ हर चैनल, अखबार और मोबाइल पर सभी राशियों के दैनिक भविष्य के बारे में चंद्रराशि, सूर्यराशि, अंक ज्योतिष, टैरो कार्ड या लाल किताब के माध्यम से प्रेम, करियर, व्यवसाय के बारे में भविष्यवाणियां उपलब्ध कराई जा रही हैं। ज्योतिषी के माध्यम से शादी, जीवन में सभी किस्म के संभावित खतरों से सावधान, जीवन स्थितियां सुधारने के बारे में भविष्यवाणी की जाती रही है, मगर अब अधिकतर भारतवासी ज्योतिष के लत में पड़ रहे हैं। इसका सीधा कारण है मानव जीवन में बढ़ रहा असंतोष, तनाव और असुरक्षा। इसका दोष हम सहज ही माहौल, किस्मत, भगवान और दूसरों को देते हैं। लेकिन हम सच स्वीकार करें तो इस खतरनाक तिकड़ी को पैदा करने में हमारी अपनी भूमिका ज्यादा है। खरा और नंगा सच यह है कि हमने खुद को स्वार्थों में कैद कर लिया है। हमें हर कीमत पर पैसा और ऐसी सफलता चाहिए जो हमेशा दूसरों से ज्यादा रहे। दूसरों के जीवन, उनके दुख-दर्द, उनकी दिक्कतों, असफलताओं से हमें कोई मतलब नहीं। हमारी सोच ऐसी हो गई है कि अपनी दुकान चलती रहनी चाहिए, चाहे सभी की दुकानें गर्क हो जाएं।हमारे स्वार्थ हमें अपनी दुनिया से बाहर देखने की इजाजत नहीं देते। हमारा सुख-चैन गुम हो गया है। जीवन से संतुष्टि असंतुष्ट होकर लापता हो गई है। ऐसे में हम ज्योतिष को एक संबल मान कर अपने जीवन में एक सुरक्षात्मक दीवार खड़ी करना चाहते हैं। हमें लगता है कि ज्योतिषियों के बताए नुस्खे, टोटके हमारे जीवन में रक्षा कवच बन जाएंगे। ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो अपने हाथों की आठों अंगुलियों और गले में पत्थर आदि धारण करते हैं, मगर उनके कर्म प्रशंसा हासिल नहीं करते। लगभग हर चैनल और सीरियल में अंधविश्वासों, शुभ-अशुभ, टोने-टोटकों और खासतौर पर मार्गदर्शक ज्योतिषी को दिखाया जा रहा है। हमारे देश के दिग्गज नेताओं, अभिनेताओं, अफसरों और अन्य सामाजिक दिग्गजों के अनेक कर्म मानवता, नैतिकता, समाज, धर्म और संस्कृति को नुकसान पहंचाने वाले निम्नस्तरीय रहे हैं, मगर वे ज्योतिषियों द्वारा सुझाए महंगे पत्थर धारण कर अपनी सफलता और सुरक्षा की गारंटी समझते हैं।

वास्तव में वे खूब पैसा और प्रसिद्धि कमा रहे हैं। आम आदमी दुखी लेकिन भ्रमित है, क्योंकि वह अपने इन कथित सामाजिक नायकों के कारनामों की नकल कर वैसा ही कर्म करता है। अपने आप को सुरक्षित करने के लिए वह भी ज्योतिषियों के चक्कर काटता है और ठगा जाता है। अवसर और जरूरत के कारण समाज के प्रबुद्ध लोग ज्योतिषियों से सलाह ले रहे हैं, जिनमें गणित, भौतिकी, रसायन शास्त्र पढ़ाने वाले शिक्षक और डॉक्टर-इंजीनियर जैसे तकनीकी लोग भी शामिल हैं और ज्योतिषियों से सलाह ले रहे हैं। वे यह मानते हैं कि ज्योतिष आपको आने वाले खतरों से सावधान करता है, ताकि आप अपने जीवन की व्यवस्थाओं को सुधार कर परिस्थितियों को अपने हित में कर सकें। जबकि सच यह है कि मानव जीवन कर्म क्षेत्र ही है। ग्रह-नक्षत्रों के काटने के नाम पर अंगुलियों में अगूंठियां पहनने से कुछ नहीं हो सकता। लेकिन इस हकीकत को समझने के बजाय ज्योतिषी के पास जाना आजकल फैशन की मानिंद हो गया है। विकास की मैराथन में ऐसे लाखों लोग हैं जो यात्रा प्रारंभ करने के लिए या छोटा-मोटा सामान खरीदने जैसी जरा-जरा-सी बात के लिए ज्योतिषियों की बात मानते हैं। हम कभी अपने आप को यह नेक सलाह क्यों नहीं देते कि अगर हम अपने कर्म सुधार लें, जीवन की जरूरतें और जीवन-शैली संपादित कर लें, अपनी अंदरूनी शक्ति को टटोल कर एकजुट कर लें तो हमारी जिंदगी बदल सकती है। हम अपने सुविचारों, दृढ़ निश्चयों, विश्वास, मेहनत और कर्मठता के बल पर अंर्तमन को समृद्ध करना शुरू करेंगे तो कुछ समय बाद हमारा आत्मबल ही हमारी असली शक्ति बन जाएगा। लेकिन अगर अंधविश्वास की दुनिया में भटकते रहे तो न सिर्फ हम कहीं नहीं पहुंच सकेंगे, बल्कि देश को भी दुनिया में पीछे कर देंगे।

 

 

 

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