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दुनिया मेरे आगे- रम्य रूप  

महाराणा जयसिंह ने इस झील का निर्माण किया इसलिए यह जयसमंद कहलाया। पर इसका एक और भी नाम है, ढेबर दर्रा।

झील।

राजेश कुमार व्यास 

दूर जहां तक नजर जाए पानी ही पानी। आसमानी परछार्इं ओढ़े नीला पानी।…प्रकृति ने जैसे धरती को उपहार दिया है।…मोहक हरियाली से आच्छादित दो पहाड़ियां और बीच में बहता नीर। घाट पर जहां बैठा हूं, वहां नाव बंधी है और प्रस्तर खंड को तराश कर निर्मित बेहद सुंदर खड़ा धवल हाथी जैसे दूर तक फैले जल को निहार रहा है। सूंड़ उठाए। यह पहाड़ियों के मध्य बिखरे जल का रम्य रूप है। प्रस्तर निर्मित घाट…छतरियां और संगमरमर से तराशे हाथी। कहते हैं, एशिया का मानव निर्मित सबसे बड़ा जलाशय है यह। पर गौर करता हूं, समुद्र सरीखा है यहां का दृश्य। हवा में बनती पानी की शांत लहरें….दूर तक जाती हुई और फिर से आती हुई। महाराणा जयसिंह ने इस झील का निर्माण किया इसलिए यह जयसमंद कहलाया। पर इसका एक और भी नाम है, ढेबर दर्रा। पहाड़ियों के मध्य विशाल बांध को बांध कर निर्मित झील। गोमती नदी को दो पहाड़ियों के मध्य 1685 से 1691 में बांध बना कर इसे निर्मित करवाया गया। गोमती और सहायक नदियां झामरी, रूपारेल, बागढ़ और कुछ बरसाती नालों का पानी आकर इसमें मिला है। सच क्या है, पता नहीं, पर बताते हैं, नौ नदियां और निन्यानबे नालों से आता है यहां जल।

झील के घाटों पर घूमते औचक दूर पहाड़ी पर बने एक महल पर नजर जाती है। पता चलता है, यह रूठी रानी का महल है। मैं महल पर पहुंचने का जतन करता हूं पर चढ़ने का कोई माकूल रास्ता नजर नहीं आता। पर मन कहां माने! पत्थरों पर सावधानी से चढ़ते महल तक पहुंच जाता हूं। निर्जन महल। खंडहर। कर्नल टॉड के अनुसार राणा जयसिंह ने अपनी प्रिय पत्नी कमलादेवी के लिए बनाया था यह महल। अलग-अलग कहानियां महल के बारे में प्रचलित है। कोई कहता है रानी एक बार रूठ गई और फिर कभी महल से बाहर नहीं आई इसलिए है यह रूठी रानी महल। पर कोई कहता है दूसरी रानियों के लिए राणा जयसिंह की पत्नी अपनी सुंदरता के कारण ईर्ष्या की पात्र बन गई और बाद में उसे इस महल में कैद कर दिया गया।

सच्चाई क्या है, कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन इतिहास में पढ़े उस सूत्र में कुछ सच्चाई नजर आती है जिसमें कहा गया है कि राणा जयसिंह की पत्नी कमलादेवी परमार कुल की थी और अपने यहां वह ‘रूता रानी’ से पुकारी जाती थी। रूता रानी का महल ही कालांतर में रूठी रानी के महल से जाना जाने लगा होगा।…यही सब सोचते मैं पहाड़ी पर बने महल से नीचे झांकता हूं। जयसमंद का पहाड़ियों के मध्य बिखरा पानी और हरा जंगल! रूठी रानी, रूता रानी या कमलादेवी के महल से नीचे उतर आता हूं। मन में आता है, इतिहास समय संदर्भों और स्थानीय जनों की कहानियों-कहावतों में रूपांतरित होता अतीत का इतिवृत्तात्मक लेखा ही तो है! महल से उतर झील के छोर पर बने तब के महल और अब वन विभाग के विश्राम गृह में तब्दील अपने कमरे में आ जाता हूं। …विश्राम गृह के जिस कक्ष में रुका हूं, वह झील से सटा है। अंतराल-अंतराल में झील के पानी की लहरें दीवारों से टकरा मन को झंकृत करता जैसे संगीत सुना रही हैं। खिड़की से पार दूर तक पसरी झील! दूर पहाड़ों पर सांझ घिरने लगी है।

वन विभाग के एक अधिकारी मित्र ने बताया था- सांझ के समय आप जयसमंद के घाट पर ही रहना। सूर्यास्त की किरणों का उजास आपको भाएगा।…उनके कहे को याद करते विश्रामगृह से बाहर निकल आता हूं। दूर क्षितिज पर सूर्य लालिमा बिखेरता अपने घर लौट रहा है… अवर्णनीय आनंद की अनुभूति कराता! नीचे पानी की तरफ उतरते हुए घाटों पर बनी गुंबदाकार छतरियां…और सामने बनी बेदियां। सूंड़ को ऊपर किए पत्थरों की कारीगरी से बने कलात्मक हाथियों की प्रतिमाएं और दूर बांध के सबसे ऊंचे वाले स्थान पर बना भगवान महादेव का नर्मदेश्वर मंदिर!  घर लौटता सूर्य जैसे इन सब पर अपनी किरणों से जादू जगा रहा है। दूर तक पसरा जल…टापू और नीड़ पर लौटते पक्षियों के समूह को देख अनुभूत होता है कि किसी और लोक में पहुंच गया हूं। सफेद संगमरमर पत्थरों से निर्मित घाटों पर अब सूर्यास्त से अंधेरा पसरने लगा है।…पर यह क्या! चंद्रमा की धवल चांदनी में जयसमंद का सौंदर्य और भी जैसे बढ़ने लगा है। चांद की चांदनी में दूध से नहाए हाथी जैसे झील की ओर मुख करते हुए भी मुझसे कुछ और देर वहीं रुकने का आग्रह कर रहे हैं। मैं उनकी बात मान वहीं घाट पर बनी सीढ़ियों पर बैठ जाता हूं। विशाल प्रस्तर खंड को सामने रख सिरजे सौंदर्य पर पड़ती धवल चांदनी और दूर तक फैला झील का नीर खंड-खंड अखंड सौंदर्य की जैसे रूप वृष्टि करने लगा है। ठंडी हवाओं के झोंके मन को विभोर कर रहे हैं। पता ही नहीं चलता, कितने घंटे ऐसे ही वहां बैठे गुजर जाते हैं। वन विभाग के विश्रामगृह का चौकीदार मुझे ढूंढ़ते झील के घाट पर आ मुझे झिंझोड़ते हुए कहता है, ‘साब खाना नहीं खाना है?’ मैं कलाई में बंधी घड़ी पर नजर डालता हूं…अरे! रात्रि के नौ बज गए हैं। उठ कर विश्राम गृह की ओर लौट पड़ता हूं। मन ही मन जयसमंद से विदा लेता हूं, यह कहते हुए-कल सूर्योदय पर फिर आऊंगा इन घाटों पर। शुभरात्रि, जयसमंद।

 

 

 

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