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दुनिया मेरे आगे- आईने का रुख

बात करीब पंद्रह साल पुरानी है। मैं इलाहाबाद में रह कर बीए कर रहा था। एक बार अपने गांव से एक मित्र के साथ इलाहाबाद ट्रेन से जा रहा था।

Author June 7, 2017 6:19 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी

बात करीब पंद्रह साल पुरानी है। मैं इलाहाबाद में रह कर बीए कर रहा था। एक बार अपने गांव से एक मित्र के साथ इलाहाबाद ट्रेन से जा रहा था। उसी में एक तेरह-चौदह वर्षीय लड़का कभी बेसुरे राग में कुछ गाकर, कभी हाथ हिलाते हुए सबसे पैसा मांग रहा था। चार लोगों के सामने तक पहुंच पाता तो चार को दूर से ही सलामी मार कर आगे बढ़ता जा रहा था। इस क्रम में वह अपने एक पैर की विकलांगता को सामने नहीं लाना चाहता था। चूंकि पैर बुरी तरह से पोलियो का शिकार था, इसलिए सामने ही दिख रहा था कि उसे दोनों हाथों से भी पैर का काम लेना पड़ रहा था। वह हम लोगों के सामने पहुंचा। हम लोग बहुत शरीफ नहीं थे। सो, उसे अपने पास बैठा कर उससे परिचय लेने के बाद सवाल पर सवाल दागने लगे। हमारे भीतर एक दंभ यह था कि हम लोग पढ़ने-लिखने वाले लोग हैं और यह आग्रह भी था कि वह बच्चा पढ़े-लिखे।

उधर उसके पास छिपाने के लिए शायद कुछ नहीं था, इसलिए हर सवाल का दनादन जवाब दे रहा था। कई बातें बताने के क्रम में उसने यह कहा कि जीजाजी पैदल जा रहे थे कि एक मोटरसाइकिल वाले ने पीछे से टक्कर मार दी तो अस्पताल में भर्ती हैं। उनको पैसा देने जा रहे हैं। मैंने पूछा कि कितना पैसा है तुम्हारे पास तो उसने कहा- ‘अभी तक पचास रुपया तक हो गया होगा। घर पर मां की दवा चल रही है, इसलिए जो पैसा मेरे पास था, उसी की दवा खरीद कर कल ही दिया था।’ मैंने पूछा- ‘क्या तुम्हारे पिताजी कुछ काम नहीं करते?’ उसने बताया कि वे बचपन में ही छोड़ कर चले गए थे… बहुत शराब पीते थे और जो जमीन-जायदाद थी, उसे बेच कर शराब पी गए। फिर जो घर था उसे गांव के एक चाचा ने ले लिया है और कहते हैं कि मेरे बाबूजी उनसे कर्ज लेकर मरे थे… अगर वह उधार वापस मिलेगा तभी घर देंगे!’ अभी वह अपने पिता के किसी दोस्त के घर भूसा रखने वाली जगह पर रहता था। मां कुछ कमाती थी, लेकिन जब से उसकी तबीयत खराब हुई है, तब से एक होटल के गार्ड की नौकरी करने वाले उसके जीजाजी कुछ पैसा देते हैं। बाकी लड़के ने सब संभाल लिया है। पैसे के अभाव में उसने पढ़ाई-लिखाई नहीं की।

हमें काफी देर बाद ध्यान आया कि हम उसका समय बर्बाद कर रहे हैं। हमारी इतनी हैसियत नहीं थी कि हम उसकी कोई बड़ी मदद कर सकें। हम खुद ही विद्यार्थी थे। लेकिन उस दिन चूंकि घर से हॉस्टल जा रहे थे, इसलिए हमारे पास कुछ पैसे थे। इसी शान में अपना बड़प्पन सहयात्रियों को दिखाते हुए हम दोनों ने दस-दस रुपए लड़के को दे दिए। वह चला गया। इसके बाद वहां मौजूद दूसरे लोगों ने हमें कोसना शुरू किया कि आखिर हमने क्यों इतना पैसा दे दिया… वे लोग नौटंकी करते हैं।’ यह सब सुनने के बाद मेरे मन में बैठा चोर भी दस रुपए की कीमत समझने लगा। हम लोग इस उधेड़बुन में थे कि वह लड़का वापस आया और बोला- ‘भैया, सब मांग लिए और अब सारनाथ उतरना है।’ मैंने उसे बताया कि यह ट्रेन सारनाथ में नहीं रुकती है… तुमको वाराणसी कैंट से टेम्पो से वापस आना पड़ेगा। उसने कहा- ‘हम ट्रेन में पहले दिन ही चढ़े हैं! वैसे जब कभी खाने के लिए आटा-चावल नहीं होता है तब सिकंदरपुर में ही कुछ मांगते हैं और कुछ काम भी कर लेते हैं।’

उसके बाद हम लोगों के सामने की सीट पर बैठ कर गमछा फैला कर वह पैसे गिनने लगा। खुश था, मानो किसी एक दिन में इतना पैसा इससे पहले न मिला हो। इस बीच उधर से एक महिला अपने तीन-चार साल के बच्चे को गोद में लिए उसकी बीमारी का हवाला देकर सहयोग मांगती हुई हम लोगों के सामने आई। किसी ने कुछ दिया, किसी ने ‘आगे बढ़ो’ के साथ मुंह फेर लिया। इसी क्रम में वह महिला उस बच्चे के सामने गई और हाथ फैलाया। मेरी अपेक्षा थी कि वह अपनी स्थिति बता कर पैसा देने से मना करेगा।
लेकिन वह साधारण-सा दिखने वाला, निर्धन बच्चा असाधारण और शायद पूरी ट्रेन में सबसे धनवान था। यही कारण है कि बहुत सरल भाव से उसने वह सारा पैसा भीख मांग रही महिला के आंचल में डाल दिया। महिला आगे बढ़ गई। किसी ने उस बच्चे से पूछा कि पैसा तो सब दे दिया अपने जीजा को क्या दोगे? उसने जबाब दिया- ‘जीजा तो बड़े हैं, दर्द सह सकते हैं… लेकिन उस महिला का छोटा बच्चा अपना दर्द बता भी नहीं पाएगा।’ तब तक संयोगवश ट्रेन सारनाथ स्टेशन पर रुक गई और वह लड़का अचानक ट्रेन से उतर गया। लेकिन जाते हुए वह हम सबको आईना दिखा कर चला गया, जो उसे दो या दस रुपया देकर खुद को ‘सभ्य’ और ‘बड़ा’ समझ रहे थे!

 

 

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