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दुनिया मेरे आगे: दीर्घायु का द्वंद्व

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तैयार किए गए 2015 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में पुरुषों की औसत आयु छियासठ वर्ष है।

Author January 18, 2017 5:10 AM
इस चित्र का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

महेंद्र राजा जैन

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तैयार किए गए 2015 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में पुरुषों की औसत आयु छियासठ वर्ष है। कहा जा सकता है कि मैं औसत आयु पार कर चुका हूं और अब बोनस की जिंदगी जी रहा हूं। मैं समझ नहीं पाता कि लंबी उम्र वालों को लोग क्यों भाग्यशाली मानते हैं। चूंकि मैं खुद ही वृद्ध हूं, इसलिए समझता हूं कि इस पुरानी धारणा को चुनौती दी जानी चाहिए। मुझे एक नीति कथा याद आ रही है। पूर्वी यूरोप के एक देश की संसद धूम्रपान पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की बात पर विचार कर रही थी। इसके प्रतिरोध में तंबाकू उद्योग के प्रतिनिधि मंडल ने कहा कि इसके परिणामस्वरूप धूम्रपान संबंधी बीमारियों के कम हो जाने से स्वास्थ्य सेवाओं में सरकार को जो बचत होगी वह उसकी तुलना में बहुत कम होगी जो अभी कुछ लोगों की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण सरकार को पेंशन कम देने में होती है। फिर सरकार को धूम्रपान से टैक्स के रूप में भारी-भरकम आय तो होती ही है। 1999 में चेक गणराज्य को धूम्रपान से लगभग छह अरब कोरूना का फायदा हआ। 2015 में चेक गणराज्य यूरोपीय संघ का अंतिम सदस्य देश था, जहां रेस्तरां में धूम्रपान पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

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दीर्घायु न तो सरकारों के लिए और न ही हम लोगों के लिए अच्छी बात है। अधिकतर लोग बूढ़े होते जाना पसंद नहीं करते। नसें सख्त होते जाने के साथ-साथ शारीरिक क्षमता भी कम होती जाती है और हड्डियां कड़कड़ाने लगती हैं, सांस लेने में तकलीफ होने लगती है, आंखों से कम दिखने लगता है, नाक से पानी बहने लगता है, कान के परदे बंद हो जाते हैं, हमारा शरीर हमारे लिए ही बोझ लगने लगता है। गठिया की शिकायत आम हो जाती है और हमारी शारीरिक अक्षमताएं हमारे खुद के लिए परेशानी का कारण बन जाती हैं। निश्चय ही इसके लिए ‘सहायकों’ की कमी नहीं है।हाल ही में मुझे डाक से एक सूची-पत्र मिला है, जिसमें मल-मूत्र पर नियंत्रण संबंधी तरह-तरह के छोटे-मोटे उपकरणों की सूचना के साथ ही आंख-कान की देखने-सुनने की क्षमता बढ़ाने के संबंध में भी कई तरह की सूचनाएं दी गई थीं। पीठ, गला, घुटने, कुहनी और कलाइयों का दर्द दूर करने के विषय में भी जानकारी थी। कैन और जार खोलने, खड़े होने की स्थिति में पैरों पर जोर कम करने, कपड़ों पर खाना गिरने से बचाने के उपाय, लेटने-उठने-बैठने आदि तरह-तरह की स्थितियों के लिए भी लाभकारी उपकरणों की सूचना थी। जाड़े के मौसम में टीवी देखते समय ठंड न लगे, इसके लिए भी एक कंबल था जिसमें दस्ताने भी बने हुए थे।

सूची-पत्र में फोम, वेलक्रो, इलास्टिक और विस्कोज-युक्त उपकरण भी थे, जो मैं समझता हूं एक प्रकार से व्यर्थ ही थे, क्योंकि अब तक हमें यह तो पता चल ही जाता है कि हमारा शरीर असीम है। पचासी वर्ष की उम्र में मैं तो अपने को पुरानी कार या स्कूटर के समान अनुभव करता हूं, जिसका कोई एक पार्ट बदला जाता है तो दूसरा पार्ट भी बदले जाने के लिए रूठ जाता है। लेकिन सच कहा जाए तो हमारी देह चिंता का कारण नहीं है। असली बात हमारा दिमाग है। हमारी स्मरण-शक्ति क्षीण हो जाती है, हम शारीरिक दृष्टि से असहज और मानसिक आतंक की स्थिति में पहुंच जाते हैं। वृद्धावस्था धीरे-धीरे मानसिक आघात करने वाली स्थिति हो जाती है। इतना ही नहीं, हम अपने आपको दोष देने लगते हैं। हमारे कारण यातायात रुक जाता है, हम फुटपाथ पर एक प्रकार से जान-बूझ कर बाधा खड़ी करने वाले हो जाते हैं! डॉक्टरों के प्रतीक्षा कक्ष में हमारा एकाधिकार हो जाता है, अस्पतालों में बेड की कमी हो जाती है और दवा बनाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियों को फायदा होता है। भीड़ भरे उपग्रह में हम गंभीर रूप से कूड़े के समान असीमित होते जाते हैं। और जिन लोगों को इससे सबसे अधिक परेशानी होती है वे युवा लोग होते हैं।

इस स्थिति से सम्मानजनक बचाव का एक ही रास्ता है। दीर्घायु की जड़ में दरअसल स्वास्थ्य और सुरक्षा की समस्या ही है। लेकिन सच यह है कि स्वास्थ्य और सुरक्षा का एजेंडा हमें ऐसा जीवन बिताने के लिए प्रेरित करता है, ताकि हम पूरा जीवन जीने के बाद ही मृत्यु की शरण में जाएं। संभव है कि समाज अभी इस बात पर खुद को असहज महसूस करे, लेकिन दीर्घायु को जिस तरह आमतौर पर मैंने कष्टकारी देखा है, उसमें मेरी राय अब बदली है। दुख में लंबी उम्र या जीवन जीने की अपेक्षा क्या यह बेहतर नहीं है कि कुछ कम उम्र भले जीया जाए, लेकिन वह स्वस्थ और सहज जीवन हो, ताकि मित्रों और परिवारजनों के लिए परेशानी का कारण न बने!

 

 

 

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