ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे- इतिहास की छवियां

एक मुहावरा बहुत प्रचलित था उस समय- ‘हिस्ट्री जौगरफी बड़ी बेवफा, रात को रटो तो दिन में सफा।’

Author April 27, 2017 6:20 AM
राजस्थान की धरती पर 1576 ई. में हल्दीघाटी युद्ध हुआ था। ( सांकेतिक फोटो)

अशोक गुप्ता

समय गाहे-बगाहे बचपन के दिनों में ले जाकर हुलसाता ही रहता है। लेकिन इस बार बचपन के दिनों में जाना बहुत बेचैन कर गया। वहां से जो प्रश्न लेकर लौटा हूं, वे किसी बड़े अंधेरे की ओर अंगुली उठाते हैं। कहना कठिन है कि यह किसी भूल का नतीजा है या कोई बड़ा षड्यंत्र। दरअसल, उस दिन ऐसे ही एक ठीहे पर बतकही करते हुए वक्त काट रहा था। प्रसंग स्कूल के दिनों का चला। पांचवीं के बाद मेरी पढ़ाई मेरे शहर सीतापुर के एक सरकारी स्कूल में हुई। बात आगे बढ़ी तो याद आया कि इतिहास हमें बहुत नीरस विषय लगता था।
एक मुहावरा बहुत प्रचलित था उस समय- ‘हिस्ट्री जौगरफी बड़ी बेवफा, रात को रटो तो दिन में सफा।’ हमारी अरुचि को हवा देने में शायद इस मुहावरे की भी कुछ भूमिका रही हो। छठी क्लास में इतिहास की किताब थी ‘प्राचीन भारत’, सातवीं में ‘मध्यकालीन भारत’ और आठवीं में थी ‘आधुनिक भारत’। इस तरह तीन सालों में देश के इतिहास की तीन परतें हमारे भीतर बिछाई जाती थीं और नौवीं कक्षा में इतिहास से छुटकारे की संभावना बनती थी। मैंने आठवीं के आगे विज्ञान पढ़ना शुरू किया और इस तरह इतिहास प्रसंग से बरी हो गया। उस दिन बतरस के उस ठीहे पर मेरी मुलाकात एक चपल नवयुवक से हुई। हमारी बातचीत के बीच में उसने जो नई धारा प्रवाहित की, उसने मुझे परेशान कर दिया। सत्तर पार का मैं एक लेखक, भले ही इंजीनियरिंग और प्रबंधन के जंजाल का व्यक्ति, लेकिन कभी स्कूल में पढ़ाए जाने वाले इतिहास के बारे में ऐसे क्यों नहीं सोच पाया? सचमुच मैंने कभी इस पर गौर ही नहीं किया, जबकि यह प्रश्न इतना बुनियादी था कि इसके लिए किसी बड़े शोध या गहन अध्ययन की जरूरत नहीं थी।

उस युवक की ओर से सवाल यह उठाया गया कि जो इतिहास हम पढ़ते हैं, या जो हमें पीढ़ी दर पीढी पढ़ाया जा रहा है वह भारत का राजनीतिक इतिहास है। पहले सामंती शासन का दौर, फिर विदेशी शासन का दौर और उसके बाद लोकतंत्र के प्रारूप में स्व-शासन। उस युवक ने कौतूहल यहां जगाया कि इतिहास तो साहित्य का, विज्ञान का, गणित का, संगीत और कला का भी होता है और इतिहास की इन श्रेणियों का भी परिचय प्राथमिक कक्षाओं के बाद मिडिल स्तर की शिक्षा में दिया जाना चाहिए। लेकिन इस सबको परे छोड़ कर केवल राजा और रानी या फिर युद्ध के प्रसंगों का पाठ पढ़ाया जाना क्या सचमुच बच्चे के भीतर इतिहास विषय के कुल विस्तार को समझाने की उपयुक्त प्रक्रिया है? ठीक उसी दौर में समाज का एक ढांचा रहा होगा, सामाजिक जीवन के उतार-चढ़ाव, आपसी टकराव रहे होंगे और उसी बीच साधारण लोगों के आम जीवन की जद्दोजहद भी। मगर पता नहीं, ये सब इतिहास के ब्योरों में उसी जीवंतता के साथ दर्ज क्यों नहीं हुए, जितनी शिद्दत से राजमहलों और राजे-रजवाड़ों की राजनीति और युद्ध के मैदानों के ब्योरे ढूंढ़े गए!

एक और प्रश्न उस युवक के जरिए सामने लाया गया। हजारों, सैकड़ों साल पहले के प्रसंगों की जो जानकारी हम तक पहुंची है, उसकी प्रामाणिकता की परख की कसौटी क्या रही है! तकनीक के विविध माध्यम तो देश को ब्रिटिश काल से ही मिलने शुरू हुए हैं और उनमें भी जानकारी के संचयन की ऐसी व्यवस्था हमारे पास कहां रही है जो इसके छेड़छाड़ से मुक्त होने का विश्वास दिला सके। ऐसे में यह गौरतलब है कि जो हमें पढ़ाया गया है या आगे भी नई पीढ़ी को पढ़ाया जा रहा है, वह इतिहास ही है या कुछ ऐसा, जिसे बस ‘पट्टी पढ़ाना’ भर कहा जा सके। यहां मैं इतिहास की सामग्री की संरचना पर गौर करता हूं। इतिहास के प्रसंगों में दर्ज ब्योरों के मुताबिक अशोक को हम सम्राट अशोक की तरह, औरंगजेब को कट्टर मुगल की तरह और फिर धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथाओं के मुताबिक युधिष्ठिर को धर्मवीर की तरह और राम को मर्यादा पुरुषोत्तम जानना शुरू करते हैं। इस तरह यह पाठ्य सामग्री हमारे भीतर अपने राजनीतिक चरित्रों की वही छवि रोपने का काम करती है, जो न जाने कब से तय है और बच्चे को उसकी इस भूमिका से परे रखती है कि वह अपनी कोई स्वतंत्र धारणा विकसित कर सके। लगता नहीं कि यह भी कोई स्वस्थ लक्षण है। मेरा दिमाग घूम गया है। यानी कि इतिहास को केवल रटना है जानना नहीं। यह केवल उस स्कूली खिलंदड़ मुहावरे का संदेश नहीं है, बल्कि हमारी पाठ्य व्यवस्था की मूल अवधारणा का सार है, जिसका निर्वाह हमारी सरकारें यथावत कर रही हैं। लेकिन कब तक? वह युवक तो सचमुच बहुत मुखर है, जिसने अपनी बात पर मुझे गौर करने के लिए मजबूर किया!

 

 

 

MCD चुनाव नतीजे 2017: लगातार तीसरी बार जीती बीजेपी, आप दूसरे और तीसरे नंबर पर रही कांग्रेस

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App