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दुनिया मेरे आगे: आम के बाग

गरमी आती है तो आम आते हैं और उन्हीं के साथ आम के बागों की याद आती है। किसी अमराई की भी, जहां आमों के बोझ से पेड़ों की डालें कुछ नीचे झुक आती थीं।

आम हैं तो आम के बाग भी होंगे कहीं न कहीं। लेकिन वे मेरी ही तरह बहुत सारे लोगों से दूर हैं।

गरमी आती है तो आम आते हैं और उन्हीं के साथ आम के बागों की याद आती है। किसी अमराई की भी, जहां आमों के बोझ से पेड़ों की डालें कुछ नीचे झुक आती थीं। बहुत दिनों से किसी आम के बाग में जाना नहीं हुआ। एक बड़ा कारण यह है कि अब उत्तर प्रदेश के अपने पैतृक गांव में जाना नहीं होता। अगर होता भी तो शायद जो आम के बाग पैंसठ-सत्तर साल पहले अपने बचपन में देखे थे, वे मिलते भी नहीं। कस्बों-शहरों के विस्तार में, पेड़ ही तो खोते और दूर होते चले गए हैं। जहां भी देखिए, सीमेंट-कंक्रीट की इमारतें उग आई हैं। बहुमंजिले फ्लैटों वाली भी। एक जमाना था, जब आम-जामुन के पेड़ कहीं बीज पड़ जाने पर भी उग आते थे। अब वैसी और उतनी खाली जमीन भी कहां है!

फिर भी इस विशाल देश में गनीमत है कि क्या दिल्ली, क्या मुंबई, क्या कोलकाता और क्या चेन्नई, आम के एक-दो पेड़, कुछ पुराने, किसी इमारती परिसर या मुहल्ले में सिर उठाए खड़े मिल ही जाते हैं। गरमी शुरू होने से पहले ही जब आमों के पेड़ों पर मंजरियां आती हैं, तो उनकी ओर बरबस नजर चली जाती है। फिर अंबियां, और कच्चे आम आते हैं, लुभाते हैं। जब पक जाते हैं तब के तो कहने ही क्या! यह गनीमत ही है कि अप्रैल से उनकी ढेरियां दिखाई पड़ने लगती हैं। अब आम पकने से पहले ही पका लिए जाते हैं। पर जो आमों के शौकीन हैं, वे पके हुए आम खुद बाग से लाते हैं। मेरे एक परिजन ऐसा ही करते हैं। उनके एक मित्र के आम-बाग हैं। वे गरमियों में खूब आम खाते हैं, पर बाग से लाकर ही। मुझे भी खिलाए। वे रसीले थे, स्वाद और मिठास से भरे हुए।

आम हैं तो आम के बाग भी होंगे कहीं न कहीं। लेकिन वे मेरी ही तरह बहुत सारे लोगों से दूर हैं। याद है, जब हम गरमी में बचपन और किशोरावस्था में रेल से सफर करते थे तो उत्तर प्रदेश के फतेहपुर से हावड़ा की यात्रा में कभी किसी स्टेशन के प्लेटफॉर्म के पास और कभी गाड़ी की किसी खिड़की से भी आम के बहुतेरे पेड़ और बाग दिखते थे। हम गरमियों में गांव आते थे। सुबह पके हुए आम बटोरने जाते थे। कभी दोपहर को भी, जब लू चल रही होती थी। मगर तब कहां परवाह होती थी लू या पाले की। गरमी हो या कड़ाके की सर्दी, हमारा ज्यादा समय घर के बाहर ही बीतता था। मौसम कोई भी- आकर्षण फल-फूल और दौड़-भाग का ही तो होता था। आम के बाग में कोयल कूकती ही रहती थी। हमारे जमाने में मोर भी खूब नाचते थे बागों में। तोते दिखाई पड़ते थे झुंड के झुंड।

बहार देसी आमों की ही रहती थी। बाल्टियों में पानी भर कर आम ठंडे किए जाते थे। कुओं का पानी ठंडा ही होता था। अब तो कुओं की यादें भर बची हैं। कहीं भी जाते थे, मौसी या बुआ के गांवों में, आम सचमुच ‘आम’ होते थे। तोताफली आम के रंग मुझे बहुत भाते थे। मैं उन लड़के-लड़कियों से ईर्ष्या करता था जिनके परिवार आम के बागों का ठेका लेते थे और वह आमों के मौसम बागो में ही बिताते थे। माता-पिता-परिजनों के साथ। आम हैं तो आम-रस भी है। गुजरात में खूब प्रचलित है। घर हो या बाहर, किसी होटल-रेस्तरां में, आपको आम रस भी भोजन के साथ जरूर परोसा जाएगा- आम के मौसम में। आम का अचार, खटाई, अमचूर, चटनी पुदीने के साथ। यह सब आमों की देन है। हम आम की गुठली का बाजा बजाते थे। वह सत्यजित राय की ‘पथेर पांचाली’ में भी है। आम और अमराई पर कविताएं भी हैं। त्रिलोचन का अवधी में एक संग्रह ही है- ‘अमोला’। आम प्रसंग बड़े सुंदर ढंग से कृष्णा सोबती की कृति ‘ऐ लड़की’ में भी आया है। और ग़ालिब की बात भला उनके आम-प्रेम के बिना पूरी कहां होती है!

हां, आम के बागों की याद आती है। उन्हें देखने को आंखें तरसती हैं। उनमें विचरती गिलहरियों की याद आती है। उन पंछियों की, जिनकी आवाजें वहां सुनाई पड़ती थी। उन वटोहियों की भी, जो वहां सुस्ताते थे। ‘आम के बागों’ का यह जीवन, ये गतिविधियां अब भी कहीं न कहीं जारी होंगी! मुझे आम के बागों की भी याद आती है। आमों से लदे। अन्य जगहों की भी। श्रीधरदास कृत ‘सदुक्ति कर्णामृत’ में वैद्य गदाधर की यह कविता दृष्टव्य है, आम के पेड़ को लेकर- ‘कुछ जल गए दावानल में/ कुछ उखड़ गए आंधी में/ कुछ पर बिजली गिरी और वे हो गए समाप्त/ कुछ के यों ही निकल गए प्राण/ इन सारे पेड़ों के बीच/ हे आम के पेड़/ तुम अकेले विजयी होकर खड़े हो/ थके हारों को आसरा देते हुए/ हां, वे खड़े रहें आम के पेड़। यही कामना है।’

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