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दुनिया मेरे आगे- दोस्ती की वह दुनिया

हमारी दोस्ती अक्सर भारत-पाकिस्तान के रिश्तों जैसी होती है। अगर खुद की रिपोर्ट गड़बड़ है तो सबसे पहले बगल वाले की रिपोर्ट की ओर देखते हैं।

Author Published on: April 26, 2017 4:42 AM
प्रतीकात्मक चित्र

गुलाम हुसैन

हमारी दोस्ती अक्सर भारत-पाकिस्तान के रिश्तों जैसी होती है। अगर खुद की रिपोर्ट गड़बड़ है तो सबसे पहले बगल वाले की रिपोर्ट की ओर देखते हैं। अगर वह हमसे ज्यादा खराब है तो इस दुख की स्थिति में भी खुश होने का एक कारण मिल जाता है। ऐसे दोस्त हौसला अफजाई भी करते हैं। मसलन, अब देखिए कि ‘वैश्विक खुशी सूचकांक’ की वजह से पाकिस्तान इसलिए खुश है कि उसमें उसने हमसे बेहतर प्रदर्शन किया है। हम भी 2016 में कुछ ऐसे ही कारणों से खुश थे कि ‘वैश्विक भूख सूचकांक’ में हमारी हालत पाकिस्तान से बेहतर है।
बहरहाल, मेरे एक मित्र थे जो कक्षा छह से साथ पढ़ रहे थे। तब हमारे विद्यालय में साल भर में तीन परीक्षाएं होती थीं। दूसरी परीक्षा में मैं और मेरे मित्र दोनों ही गणित विषय में बुरी तरह नाकाम रहे। किसी तरह हमें पास किया गया और फिर आखिरी परीक्षा में भी यही हालात रहे। सातवीं की पहली परीक्षा में मुझे दो अंक और मेरे मित्र को आठ मिले। अभी तक की कहानी में कोई गड़बड़ नहीं थी। मजा तब आया जब दो अंक लाने पर मुझे शिक्षक महोदय से एक झापड़ इनाम में मिला और मैं इसके बाद कड़ी पढ़ाई में लग गया। दूसरी परीक्षा से एक दिन पहले जब मेरे साथी को पता चला कि मैं पढ़ाई कर रहा हूं, क्रिकेट खेलने नहीं आता, तब उसने फोन करके समझाया कि मास्टर के बहकावे में मत आओ। वे सबको ऐसे ही नंबर देते हैं। गणित यों भी पढ़ने का विषय नहीं है, बनाने का है, यानी अभ्यास का विषय है। मैं उनकी बात अनसुनी कर दी। रिजल्ट आया तो मैं दूसरे नंबर पर रहा। वह मित्र मुझसे कटने लगा।

खैर, एक अन्य दोस्त था, जिससे हमारी दोस्ती भारत-पाकिस्तान जैसी नहीं होकर, किसी अलग महादेश के देश जैसी थी। पढ़ाई-लिखाई के मामले में वह मुझसे थोड़ा कमजोर था, लेकिन उसकी माली हालत मुझसे थोड़ी अच्छी थी। दरअसल, वह पढ़ाई के साथ-साथ कई सारे काम करता था। यह उसकी जरूरत थी। मैं जिस स्कूल में था, वहां सभी जाति-धर्म के बच्चे पढ़ते थे। हेडमास्टर मुसलमान थे और मिजाज से शायर थे। स्कूल में होली-मिलन समारोह होता था, मगर ईद-मिलन का नहीं। खैर, मेरा वह दोस्त स्कूल में हिंदू पहचान के तहत दलित तबके में भी सबसे हाशिये पर मौजूद एक जाति से था। बाकी बच्चे उसे श्मशान वाला कहते थे और उससे दोस्ती नहीं करते थे, दूर हट के रहते थे। हालांकि मेरा दोस्त वह तभी से था, जब वह नया आया था। वह स्वभाव से बिल्कुल मस्त, नाचने-गाने का शौकीन था और जो उसके साथ होते थे, उन्हें खिलाने-पिलाने का भी। यह मेरी कमजोरी भी थी। मेरे दोस्तों को इस बात से परेशानी थी कि मैं उससे बात करता हूं या उसके घर जाता हूं।

यों मेरा परिवार इन सब चीजों पर गौर नहीं करता था। मगर मेरे उस मित्र के संबंध में उन्हें कोई खबर नहीं थी। मेरे स्कूल की फीस अक्सर बाकी रह जाती थी। आमतौर पर हर परीक्षा से पहले मुझे फीस नहीं जमा करने की वजह से क्लास से बाहर निकाल दिया जाता था। जब भी ऐसा कुछ होता था, तो मेरी शर्म बढ़ जाती थी और मुझ पर दबाव बढ़ जाता था। ऐसा ही एक दिन नौवीं कक्षा की अंतिम परीक्षा से पहले हुआ। मुझे क्लास के बाहर निकाला गया, मेरी फीस की पूरी चिट्ठी मुझे थमाई गई और फिर परीक्षा में नहीं बैठने देने की धमकी मिली। मैं घर गया और बोल दिया कि अब मेरे लिए पढ़ना संभव नहीं है। उसके बाद घर में बड़ी मेहनत से थोड़े पैसे जुटाए गए, मगर इससे फीस पूरी नहीं हो पाती। परीक्षा शुरू होने के दिन सुबह मैं थोड़े पैसे लेकर डरते हुए हेडमास्टर के कमरे में गया। आदर और माफी के भाव के साथ मैंने हाथ में लिए पैसे बढ़ाए और बाकी कुछ दिन में देने की बात कही तो हेडमास्टर साहब ने मुझे कहा- ‘जाओ परीक्षा दो। तुम्हारी फीस जमा हो गई है।’ उन्होंने मेरे उस दोस्त के बारे में बताया। मैं अपने पैसे लिए खड़ा रह गया।

मैं यह नहीं बताऊंगा कि मेरे उस दोस्त ने कितने पैसे देकर मेरी फीस भर दी थी, मुझे बिना बताए। उस परीक्षा में मैं सब विषय में तो नहीं, मगर गणित में सबसे अधिक अंकों के साथ पास हुआ था। उसके बाद भी जब मेरी मां को पता चला था कि मैं उस दोस्त के घर या उसके मुहल्ले में जाता रहता हूं, तो उन्होंने मुझे समझाना चाहा था। मगर एक दिन मैंने मां को परीक्षा की फीस वाली वह घटना बताई और अपने दोस्त को घर बुलाया। मेरी मां उसके सामने रो रही थी और मेरे दोस्त ने मेरी मां के पांव छू लिए थे। मैं उस दोस्त को आज तक शुक्रिया नहीं कह सका, क्योंकि उसने मेरी फीस देने की बात कभी कबूल नहीं की थी!

 

 

 

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