ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः आस्था और विश्वास

मैं भी शुरू से ही धार्मिक प्रवृत्ति होने के नाते धार्मिक स्थानों पर जाता रहता हूं। मुझे परीक्षा के दौरान बच्चे को छोड़ने के लिए उसके परीक्षा केंद्र तक जाना पड़ता था। एक दिन बीच रास्ते में मंदिर होने के कारण बच्चा परीक्षा केंद्र जाने से पहले मंदिर की चौखट चूमने के लिए रुक गया था।

Author Published on: October 11, 2019 2:21 AM
अब उन विद्यार्थियों को कौन समझाए कि परीक्षा में साल भर की गई मेहनत काम आती है। लेकिन जब अपनी पढ़ाई और तैयारी पर भरोसा नहीं होता है तो बच्चे किसी चमत्कार की उम्मीद में ऐसा करते हैं। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

बृजमोहन आचार्य

हमारे देश में असंख्य देवी-देवताओं को पूजा जाता है और इससे जुड़े मेले लगते रहते हैं। एक प्रकार से अपने यहां आध्यात्मिक नदी की धारा निरंतर बहती रहती है। हर उम्र और वर्ग के लोग किसी न किसी श्रद्धा के कारण अपने-अपने इष्ट देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। लेकिन जब परीक्षाओं का दौर आता है तब इसका जोर बच्चों पर भी देखा जाता है। सही है कि परीक्षा के परिणाम में अच्छे अंक हासिल हों, इसलिए विद्यार्थी अपनी काबिलियत के अनुसार मेहनत करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। अभिभावक भी अपने बच्चे को उच्च अंक दिलाने के लिए बच्चे की तरह ही परिश्रम करते हैं और उसकी पढ़ाई का पूरा ध्यान रखते हैं। इन सबके बावजूद कई विद्यार्थियों को यह विश्वास नहीं होता कि वे उच्च अंक से परीक्षा में अपना परचम फहरा सकेंगे। इसके लिए वे अपने तय पाठ्यक्रम के साथ ईश्वर की आराधना भी करते हैं। हालांकि बच्चों को शुरू से ही पूजा-अर्चना और भगवान में विश्वास और श्रद्धा करने के लिए संस्कारों का पाठ पढ़ाया जाता है।

मैं भी शुरू से ही धार्मिक प्रवृत्ति होने के नाते धार्मिक स्थानों पर जाता रहता हूं। मुझे परीक्षा के दौरान बच्चे को छोड़ने के लिए उसके परीक्षा केंद्र तक जाना पड़ता था। एक दिन बीच रास्ते में मंदिर होने के कारण बच्चा परीक्षा केंद्र जाने से पहले मंदिर की चौखट चूमने के लिए रुक गया था। मैं सोचने को मजबूूर हो गया कि मंदिर आदि धार्मिक स्थलों से दूर रह कर केवल मोबाइल और बाइक के बारे में बातचीत करने वाले बच्चे के भीतर अचानक धार्मिक प्रवृत्ति कैसे जागृत हो गई। लेकिन जब मंदिर में प्रवेश किया तो मैंने देखा कि वहां उन बच्चों की भीड़ ज्यादा थी जो सिर्फ परीक्षा के मौसम में ही मंदिर आते हैं। जब मंदिर निकल रहा था तो मेरी नजर दीवार पर गई, जहां अनेक विद्यार्थियों ने ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास के कारण अपने नाम लिख दिए थे। साथ ही परीक्षा में उतीर्ण करने की गुजारिश भी लिख दी थी।

अब उन विद्यार्थियों को कौन समझाए कि परीक्षा में साल भर की गई मेहनत काम आती है। लेकिन जब अपनी पढ़ाई और तैयारी पर भरोसा नहीं होता है तो बच्चे किसी चमत्कार की उम्मीद में ऐसा करते हैं। दिलचस्प यह है कि परीक्षा को बहुत सारे एक संकट के तौर पर देखते हैं, इसलिए मंदिरों में विद्यार्थियों के बीच मुझे यह देखने को मिला कि उनमें से ज्यादातर हनुमान के प्रति ही अपेक्षया अधिक श्रद्धा प्रदर्शित कर रहे थे। बात करने पर पता चला कि हनुमान चालीसा में लिखा हुआ है कि ‘संकट से हनुमान छुड़ाए, मन, क्रम, वचन ध्यान जो लावै।’

स्कूली जीवन में बच्चों की उम्र इतनी नहीं होती है कि उनके कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ लाद दिया जाए और वे समय से पहले ही संकट में दब जाएं। इसके अलावा, अभिभावक भी बच्चों को भगवान के प्रति आस्थावान होने की सलाह देते रहते हैं। जब बच्चा परीक्षा देने के लिए घर से रवाना होता है तो उसे गाय को गुड़ खिलाने के लिए दिया जाता है और खुद उन्हें दही और गुड़ खिला कर रवाना किया जाता है, ताकि परीक्षा में प्रश्न-पत्र सही तरीके से हल हो सके। यह सब अंधविश्वास की वजह से किया जाता है, लेकिन अभिभावकों को ऐसा लगता है कि दही खिला कर भेजने से बच्चे का प्रश्न पत्र अच्छा होगा। बच्चे भी जो आमतौर पर अपनी हर बात पर जिद पर अड़ जाते हैं, परीक्षा के मौसम में जिद को छोड़ कर आस्था के भरोसे ही आगे बढ़ने की उम्मीद पाल बैठते हैं।’

हालांकि साल भर मेहनत करने और पढ़ाई में व्यस्त रहने वाले विद्यार्थियों को मालूम होता है कि परीक्षा में उनकी पढ़ाई ही काम आएगी, फिर भी ‘परीक्षा के खौफ’ से भयभीत होने और परिणाम आने के पहले तक वे भगवान की दहलीज पर अपना मत्था टेकने जाते रहते हैं। कई विद्यार्थी व्रत और उपवास करना भी नहीं भूलते है। आस्थावान होना या मंदिर की चौखट पर अपनी हाजिरी देना निजी विश्वास हो सकता है। लेकिन परीक्षा या फिर संकट के समय अपनी मेहनत और बुद्धि पर भरोसा रखना चाहिए। धार्मिक स्थानों पर लोग सद्विचार, सकारात्मक ऊर्जा और समाजसेवा जैसे काम करने की उम्मीद से ही पहुंचते हैं।

दूसरी ओर यह भी सही है कि कुछ बाबाओं ने बुरे कर्म करके धार्मिक स्थलों और आश्रमों को शोषण और ठगी का अड्डा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यही वजह है कि अब बहुत सारे सोचने-समझने वाले लोगों का ऐसे बाबाओं से भरोसा उठ गया है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि समाज बुरा नहीं होता, उसे राह दिखाने के नाम पर कुछ संत या बाबा कहे जाने वाले लोग कई बार बेईमानी करते हैं। इसलिए जब बच्चा अंगुली पकड़ कर चलना सीख जाए तो उसके बाद उसके भीतर नैतिकता और आस्था के भाव के साथ खुद पर भरोसा करने का भी पाठ पढ़ाया जाए, ताकि परीक्षा पास करने के लिए वह अपने और अपनी पढ़ाई पर विश्वास करे।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगेः कसौटी पर इंसानियत
2 दुनिया मेरे आगे: परंपरा का आईना
3 दुनिया मेरे आगे: हरी घास पर कुछ देर