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दुनिया मेरे आगे-मोबाइल की मुट्ठी में

इंग्लैंड के ‘द बिग बैंग’ संस्थान ने शोध के दौरान पाया कि बहत्तर प्रतिशत बच्चों की तारे देखने में कोई रुचि नहीं है।

Author January 22, 2018 1:27 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

हेमंत कुमार पारीक

इंग्लैंड के ‘द बिग बैंग’ संस्थान ने शोध के दौरान पाया कि बहत्तर प्रतिशत बच्चों की तारे देखने में कोई रुचि नहीं है। नई पीढ़ी के बच्चों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का व्यामोह इस कदर घेरे हुए है कि वे प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। उन्हें सिर उठा कर ऊपर देखने की फुरसत नहीं है। तारे और तारामंडल के विषय में तो जानते हैं, लेकिन कभी उनका अनुभव नहीं किया। इस उद््देश्य की पूर्ति के लिए और इस विषय में बच्चों की रुचि जगाने के लिए वैज्ञानिकों ने तारामंडल में ऐसे समूह खोज लिये हैं जो मानव आकृति में दिखते हैं। तारामंडल की ऐसी आकृतियों में किसी को उसेन वोल्ट नाम दिया है, किसी को हैरी पोटर तो किसी को सेरेना विलियम्स। यह सारा काम बिग बैंग के अध्ययनकर्ताओं ने ‘लुक अप टु स्टार्स’ प्रोजेक्ट के तहत किया है। इसका उद््देश्य सौरमंडल के बारे में बच्चों की रुचि जागृत करना है। आज ऐसी स्थिति क्यों निर्मित हो रही है? वजह हम सभी को मालूम है कि क्यों बच्चे आसपास की दुनिया से बेखबर होते जा रहे हैं। उनके हाथ में आधुनिक खिलौना है जो बोलता है, हंसता है, हंसाता है और पूरी दुनिया को अपने दृश्य पटल पर एक पल में ला खड़ा करता है। लोग रास्ता चलते, बोलते-बतियाते इस खिलौने के साथ अपना अधिकांश कीमती समय गुजार देते हैं। इसे हाथ में लेते ही वे सुध-बुुध खो देते हैं और कभी-कभी इसके मायाजाल में इतने खो जाते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि वे सड़क पर चल रहे हैं या रेलवे पटरी पार कर रहे हैं। सामने से आती भोंपू या सायरन की आवाज उन्हें सुनाई नहीं देती।

मुझे याद आता है स्कूल का एक बच्चा। शायद उस वक्त वह छठी कक्षा में था। तब मोबाइल का चलन नहीं था। टेलीफोन तक सीमित थी दूरदराज की बातचीत और अगर कहीं विदेशों में बसे रिश्तेदार से बात करना हो तो ‘टेलीफोन बूथ’ का सहारा लेना पड़ता था। मैंने उसे देखा था। वह अपने मकान की छत पर घंटों बैठा तारामंडल की ओर ताकता रहता था। उसके मां-पिता पढ़ाई-लिखाई के लिए उसे डांटते थे। वे उसे लेकर एक काउंसलर या परामर्शदाता के पास भी गए। लेकिन कोई हल नहीं निकला।एक दिन मैंने उसे देखा तो अपने बेटे का पुराना दूरबीन उसे तोहफे में दे दिया। उसे मनचाही मुराद मिल गई थी। हालांकि यह सब देख कर उसके पिता ने मुझे उलाहना भी दिया था। कई बार बातों-बातों में बुरा-भला भी सुना दिया। माता-पिता के लगातार दबाव के कारण धीरे-धीरे उसकी वह रुचि किताबों में दब कर रह गई। जिस विषय में उसकी रुचि नहीं थी, उसमें किसी तरह बीए पास कर वह नौकरी की तलाश में बाहर निकल गया। लेकिन जब कभी वह लौटता है तो उसके हाथ में वही दूरबीन देख मुझे खुशी होती है। वह छत पर खड़ा-खड़ा अब भी सितारों को एकटक देखा करता है।

इसमें दोष तो उन माता-पिता का है जो बच्चों को समझ नहीं पाते और अपने अधूरे सपनों को उनके माध्यम से पूरा करना चाहते हैं। उन्हें उनकी रुचि के हिसाब से राह नहीं दिखाते। और अब तो समय ही ऐसा बदला है कि बच्चों में रुचि ढूंढ़े नहीं मिलती। एक खिलौने ने उनकी क्रियाशीलता और सोच पर विराम-सा लगा दिया है।कुछ दिन पहले मैं ट्रेन में सफर कर रहा था। एक विवाह समारोह में जाना था। मेरी सीट के सामने एक परिवार बैठा था। उनके साथ लगभग दो साल का बच्चा था। अपनी उम्र के लिहाज से वह शैतानियां कर रहा था। मां-बाप बातचीत में मशगूल थे। उसकी भागदौड़ और चीख-चिल्लाहट से उन्हें बातचीत में बाधा पहुंच रही थी। इससे निपटने के लिए उन्होंने एक नायाब तरीका खोज निकाला। पिता ने अपना मोबाइल उसके हाथ में दे दिया। फिर क्या था, बच्चा चुपचाप एक कोने में जा बैठा और मोबाइल के स्क्रीन पर उसका खेलना शुरू हो गया।

ऐसा ही एक वाकया एक दूसरी ट्रेन में हुआ था। सामने टिकट जांच करने वाला खड़ा था और वहां बैठे स्त्री-पुरुष और नवयुवक मोबाइल में जुटे थे। कुछ देर तक तो वह खड़े-खड़े उन्हें देखता रहा। फिर जब असहनीय हो गया तो बोला- ‘भाई लोग, अपने-अपने टिकट दिखाएं?’ इसके बाद उसके अंदर की भड़ास निकली। टिकट देखते और मोबाइल दिखाते हुए बोला- ‘इसने पारिवारिक रिश्तों को तार-तार कर दिया है। मैं जब घर में घुसता हूं तो मेरे बेटे-बेटी इस कदर इसमें खोए रहते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि मैं कब घर आया और कब निकल लिया। वरना पहले हम शाम होते ही अपने पिताजी की राह तकते थे। जब घर लौटते तो उनसे पूछते थे कि पिताजी, क्या लाए हैं?’ कभी उनके साथ खेलने की इच्छा होती तो कभी बाजार ले चलने की जिद। आजकल बाजार मोबाइल की मुट्ठी में है। बटन दबाया और जिन्न हाजिर है- क्या हुक्म है मेरे आका!

 

 

 

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