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दुनिया मेरे आग- उजालों की खेती

वास्तव में रोशनी के अस्तित्व को समझने के लिए अंधेरे का अस्तित्व नितांत जरूरी है। यह अस्तित्व न हो तो अंधेरों को अवश्यंभावी नियति मान लिए जाने का खतरा हो सकता है।

Author October 17, 2017 05:17 am
दिवाली के दिन घर के बाहर भी दीपक जलाना चाहिए (Source: Express Archives)

राजेश सेन 

वर्ष की घोरतम अंधेरी रात होती है कार्तिक अमावस्या, जब असंख्य दीपों की लड़ियां हमारे देश में साझा होकर अंधेरे को परास्त करने का संकल्प व्यक्त करती हैं। उत्साह, उमंग, उजास, संकल्प और आशा मिलकर इन दीपों का शृंगार करते हैं। मन में खुशियों के आकाशदीप लहलहाते हैं। इसे ही दीपों का त्योहार यानी दीपावली कहा जाता है। दीपोत्सव अपने में कई गहरे जीवन-दर्शन समेटे हुए है यानी रोशनी अपना सफर ऐसे ही तो तय करती है। रोशनी के अवकाश में अंधेरे पनपते हैं। मगर अंधेरे की समूची सत्ता मिल कर भी रोशनी को परास्त नहीं कर सकती। अलबत्ता अंधेरे होते ही कहां हैं! वह तो रोशनी की अनुपस्थिति का पूरक समय भर है। रोशनी की सत्ता के प्रकट होते ही वे स्वत: विलुप्तप्राय हो जाते हैं। वास्तव में रोशनी के अस्तित्व को समझने के लिए अंधेरे का अस्तित्व नितांत जरूरी है। यह अस्तित्व न हो तो अंधेरों को अवश्यंभावी नियति मान लिए जाने का खतरा हो सकता है।

दीपोत्सव इस बात का गूढ़ संकेत है कि हमें न सिर्फ अपने भीतर का तिमिर मिटाना है, बल्कि बाहर व्याप्त अंधेरों से भी अपने अस्तित्व की जंग लड़नी है। फिर वह लड़ाई अपने अज्ञान से ही क्यों न लड़नी पड़े। वास्तव में प्रत्येक जीव को अपनी प्राथमिक लड़ाई अपने अस्तित्व से ही लड़नी होती है। जीव के नक्षत्रों में जो उजास दर्शित है, दरअसल वह जीव के अंतरतम का प्रतिबिंब मात्र है। हम जो देखते-समझते हैं वह जीव के पिंड में गहरे भीतर पहले ही भाषित हुआ होता है। प्रत्येक अज्ञान हमारे ज्ञान की प्रतिछाया ही तो है, जैसे रोशनी की सत्ता के बोध के लिए अंधेरे का अस्तित्व आवश्यक है, वैसे ही ज्ञान के बोध के लिए अज्ञान का अस्तित्व जरूरी है। सांसारिकता का प्रत्येक क्रिया-कलाप द्वैत में परिभाषित है, जहां दुख होगा, वहां भी एक न एक दिन सुख भी आएगा। यह चक्र है नियति का। जहां प्रेम होगा, वहां घृणा भी कभी जरूर रही होगी।

देखा जाए, तो यह द्वैत भी मन का छल ही है। मन अपना संसार स्वयं रचता है। प्रत्येक सांसारिक नाट्य मन का रंगमच ही तो है। मन अधोगामी भी होता है। वह अपनी प्रवृत्ति में चंचल स्वभावी होता है, जहां मन की सत्ता है, वहां दुख-सुख, प्रेम-घृणा, ज्ञान-अज्ञान और अंधेरा-उजाला सब-कुछ अस्तित्वमय है। यह हमारा अज्ञान है कि हम मन को अपना स्वामी मानते हैं। यह सही है कि हम खुद मन के एकमेव स्वामी तो होते हैं, मगर हम अपने ही अधीन मन की लगाम नहीं थाम पाते हैं, मन हमें अपने मनोरथी स्वभाव से नचाता रहता है, और हम उसके नचाए एक जमूरे की भांति यहां-वहां नाचते फिरते हैं। मन कामनाओं का पुतला होता है, हजारों-हजार कामनाएं घनीभूत होकर मन का निर्माण करती हैं, इन कामनाओं को तिल-तिल कर गलाया जाए तो जीव मन-विहीन हो सकता है। कामनाओं का अवकाश ही मनविहीन होना है, मन गलावन क्रिया में बुद्धि हमारा कारगर हथियार बन सकती है। वह बुद्धि जो स्वयं मन की स्वामिनी होते हुए भी हमारे अज्ञान और कामनाओं के आधिक्य के चलते मन के अधीन होकर उसकी बांदी बनकर रह जाती है, बुद्धि को उसके वास्तविक स्वरूप का ज्ञान करा कर उसे मन का अधिपति बनाया जा सकता है।

स्मरण रहे कि एक जीवात्मा न मन है और न ही बुद्धि है। वह उनसे भी ऊपर की एक परमसत्ता है, जो मन और बुद्धि पर नजर रखने वाली एक नियामक सत्ता है। यही वह परमसत्ता है, जो परमात्मा का अंश है। हम उसी परमपिता परमेश्वर का परमांश होते हैं । दुर्भाग्य से यह अंश मन और बुद्धि के आवरण में कहीं खो-सा गया होता है। बस इसी जीवांश के अस्तित्व की तलाश ही अंधेरे से रोशनी का अन्यतम सफर है। हमें वही तो पाना है, हमें वही तो खोजना है, हमें उसे ही तो प्राप्त होना है। हालांकि यह विचार भी निरर्थक है कि हमें स्वयं को खोजना है। हम तो खुद में खोजे हुए ही हैं। हम तो खुद को प्राप्त ही हैं। बस हमें उस खोज का ज्ञान भर होना शेष है, जिस दिन हमें यह ज्ञान होगा हम बुद्धत्व को प्राप्त हो चुके होंगे। प्रत्येक मानव जीव स्वयं एक बुद्ध है। उसे इस दिव्यज्ञान को प्राप्त करने के लिए कहीं भटकना नहीं है। बस अपने भीतर उतरना मात्र है, जो भीतर है उसकी बाहर तलाश कैसी! यही तो जीव का तम से अतम तक का अन्यतम सफरनामा है। यही तो जीव मात्र की अंतिम नियति है। एक पिंड में समूचे ब्रह्मांड का रहस्य छिपा होता है। एक पिंड को जानते ही ब्रह्मांड के समस्त पिंडों के रहस्य ज्ञात होकर तार-तार खुल जाते हैं।

दीपोत्सव का त्योहार हमारी इसी अंतर्निहित यात्रा का दिव्य संदेश-वाहक ही तो है, सभी जीव अपने अज्ञान को चीरकर ज्ञान को प्राप्त होवें। यह दीपावली सभी के लिए शुभ हो! अज्ञान छंटे! तिमिर के काले मेघ ढलें! हमारा आत्म-साक्षात्कार हो! यही काम्य है।
कवि के शब्दों में-
उजालों की खेती करनी है तुम्हें
लो, सूरज के बीज बो दिए हमने।

 

 

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