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दुनिया मेरे आगेः विकास के विद्रूप

आज के सर्व-सुविधा और संपन्नता में शुमार अधिकतर गांव कुछ समय पहले अत्यंत पिछड़े हुए माने जाते थे और ऐसी जगह रहने वाले ग्रामीण आधुनिक सुविधाओं के अभाव में हीनता के शिकार थे।

Author April 20, 2019 1:50 AM
अब वह समय आ गया है, जब हमें विचार करना होगा कि विकास चाहिए, लेकिन किस कीमत पर? क्या विकास की यह कीमत चुकाने के लिए हम तैयार हैं? इस बाजारवादी दौर में मनुष्य जिसे भी विकास मान रहा है, उसमें अन्य जीव-जन्तुओं और हमारी प्रकृति का क्या होगा! (यूपी के एक गांव में मोदी- फोटो-पीटीआई)

आज के सर्व-सुविधा और संपन्नता में शुमार अधिकतर गांव कुछ समय पहले अत्यंत पिछड़े हुए माने जाते थे और ऐसी जगह रहने वाले ग्रामीण आधुनिक सुविधाओं के अभाव में हीनता के शिकार थे। ऐसे ही एक गांव का मैं रहने वाला हूं जहां आज से दस वर्ष पहले न तो बिजली थी और न सड़क की सुविधा। पानी का खारा होना समस्या और अधिक बढ़ा देता था। गांव के किनारे से होकर बहने वाला मट्टन नाला, जिसे बरसाती नाला भी कह सकते हैं, गांव की सीमा निर्धारित करता था। इसके पिछड़े होने का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण था नाले की वजह से गांव का संपर्क अन्य स्थलों से कट जाना। बरसात के समय में मट्टन नाला विकराल रूप धारण कर लेता और करीब दो किलोमीटर की दूरी के निकटतम बाजार से संपर्क टूट जाता था। हमें बाजार, पोस्ट ऑफिस, बैंक, स्कूल आदि नाला पार करके ही जाना पड़ता था। बरसात के दिनों में पानी बढ़ जाने से आवागमन में बहुत असुविधा होती थी।

बिजली के आने पर लोगों ने अपने आंगन में ही पानी की व्यवस्था कर ली। लेकिन मैं जब भी इसके बारे में सोचता हूं तो मेरा मन वेदना से भर जाता है। अत्याधुनिक मशीनों से निकलने वाले पानी की आज उस गांव में कोई कीमत नहीं, जिसके लिए लोग कुछ समय पहले तरसते थे। जेट पंप के जरिए भूगर्भ से आसानी से निकलने वाला पानी सभी के घरों के सामने के गड्ढे में भरा दिख जाता है। बिजली ने लोगों को पानी बर्बाद करना सिखा दिया है। इसके साथ ही गांव के अधिकतर घरों में रात भर अनगिनत बल्ब जलते हुए दिखाई देते हैं, चाहे उनकी उपयोगिता हो या न हो।

विकास जरूरी है। लेकिन इसने प्रकृति को कई स्तरों पर बहुत क्षति पहुंचाई है। ग्यारह हजार वोल्ट की लाइन होने के कारण बिजली का ट्रांसफार्मर गांव के बाहर लगा है। इससे लोग आसपास के पेड़ों के सहारे तार खींच कर घरों में बिजली ले जाते हैं। जिन पेड़ों से होकर ये बिजली के केबल गुजरे हैं, उन पेड़ों का हश्र व्यथित करने वाला है। गांव के सबसे पुराने जिस पीपल-वृक्ष की डालों से होकर केबल गुजरती थी, वह आज पांच वर्ष बाद सूख कर ठूंठ मात्र रह गया है। इसके साथ ही एक बड़ा नीम का पेड़ सूख चुका है। हो सकता था कि वह लंबे समय तक दरवाजे की शोभा बढ़ाता और हम उसके नीचे बैठते और ताश खेलते, सावन के झूले झूलते।

बिजली आने के बाद गांव में एक अन्य विकट समस्या पैदा होती दिखाई दे रही है। जेट पंप लग जाने से पानी के अन्य स्रोत सूख चुके हैं। कुआं प्रयोग में न आने के कारण उसका पानी बदबू करने लगा है और हैंडपाइप खराब हो चुके हैं। विकास के सारे आयाम तय करने के बावजूद हमें यह बात याद रखनी चाहिए है कि वह एक गांव है और उत्तर प्रदेश का गांव। बिजली तो आती-जाती रहती है। लेकिन कभी-कभी स्थिति भयावह हो जाती है। अक्सर बरसात में खंभे गिर जाने से लगभग महीनों तक बिजली नहीं आती। गरमियों में ट्रांसफार्मर जल जाना आम बात है।

कभी आप सोच सकते हैं कि ऐसे समय में उस गांव को पानी कहां से मिलता है। उस गांव में मनुष्य ही नहीं हैं, गाय, भैंस, बकरी तथा अन्य जानवर भी हैं। प्राकृतिक स्रोतों के नष्ट होने पर अगर तीन दिन के लिए भी बिजली चली जाती है तो पूरा गांव पानी के लिए त्राहिमाम कर उठता है। सुविधा संपन्न लोग जेनरेटर की व्यवस्था करके धरती की छाती से पानी निकालते हैं, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति उन सुविधा-संपन्न लोगों पर अश्रित रहते हैं। उनसे मन-मुटाव होने पर उन्हें पानी के लिए काफी दूर जाना पड़ता है। जेनरेटर एक-एक घंटे में लगभग सौ रुपए का डीजल पी जाता है, जो गरीबों के बस का तो नहीं ही है। पैसों के अभाव में अपना जेनरेटर तो वे खरीदने से रहे। हां, कुछेक लोगों को व्यवहार पर बाजार से कुछ दिनों के लिए मिल जाता है। यों मवेशी नाले के पानी पर ही निर्भर रहते हैं लेकिन गरमियों में यानी मार्च से जून माह तक नाले में भी पानी नहीं बचता। ऐसे में पानी के बगैर उनकी क्या दशा होती है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

कहने का आशय यह है कि अब वह समय आ गया है, जब हमें विचार करना होगा कि विकास चाहिए, लेकिन किस कीमत पर? क्या विकास की यह कीमत चुकाने के लिए हम तैयार हैं? इस बाजारवादी दौर में मनुष्य जिसे भी विकास मान रहा है, उसमें अन्य जीव-जन्तुओं और हमारी प्रकृति का क्या होगा! विकास अगर समाज की बराबरी को लक्षित नहीं होगा, अलग-अलग समूहों-समुदायों को उसमें जगह नहीं मिलेगी, प्रकृति के अन्य सभी पक्षों के बीच संतुलित नहीं होगा तो वह विकास आगे चल कर अराजकता का वाहक भी बन सकता है।

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