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तंत्र में लोक

लोकतंत्र की सबसे सटीक परिभाषा अब्राहम लिंकन की मानी जाती है। यानी जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए व्यवस्था।

Author June 14, 2017 5:47 AM
जंतर-मंतर पर तिरंगा दिखाता एक युवक। ( Photo Source: AP)

अमलेश प्रसाद   

लोकतंत्र की सबसे सटीक परिभाषा अब्राहम लिंकन की मानी जाती है। यानी जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए व्यवस्था। इसका आशय यह हुआ कि लोकतंत्र ‘जनता का’ है। यहां तक तो ठीक है कि जनता के खून-पसीने से ही तो संसद और संसद भवन बने हैं। यों ताजमहल भी आम आदमी की मेहनत से ही बना है, मगर अब हम उसे सिर्फ पर्यटन के लिए जानते हैं और उसके बारे में लोक से जुड़े सवाल नहीं उठाए जाते, क्योंकि उससे उम्मीद नहीं है। दूसरी ओर, लोगों की मेहनत से ही बने संसद भवन की अहमियत दूसरी है, पर आज वह भी महज नेताओं की भाषणबाजी के लिए जाना जाने लगा है। बहरहाल, लोकतंत्र की उस परिभाषा में ‘जनता के द्वारा’ का प्रयोग कुछ हद तक सही लगता है। ‘जनता द्वारा’ चुने गए लोग ही तो इस लोकतंत्र को चलाते हैं। लेकिन वे चुने गए लोग अब अपने को कुछ अलग महसूस करने लगे हैं। हवाई जहाज से उड़ने लगे हैं और जमीन का रास्ता भूलने लगे हैं। संसद का सत्र जनता के पैसे से चलता है, लेकिन शोर-शराबे में ही सत्र निकल जाता है। घंटे या फिर दो घंटे में ही नेताओं के वस्त्र बदल जाते हैं। क्या यह कॉरपोरेट दुनिया के बढ़ते दबदबे का असर है? क्या यह खुद को पूंजी में बदलने का अवसर है? वैसे वक्त जब करवट बदलता है तो निजाम का इंतजाम भी जनता बदल देती है। खैर…!

‘जनता का’ और ‘जनता द्वारा’ होने के बावजूद इसमें संदेह है कि हमारा लोकतंत्र फिलहाल ‘जनता के लिए’ है। वजह यह है कि लोकतंत्र के चारों खंभों की साख पर सवालिया निशान हैं। ये खंभे एक दूसरे के पूरक हैं। इनमें कई तरह की गड़बड़ियां हैं, फिर भी सबके सब टिके हुए हैं, क्योंकि यह छद्म लोकतंत्र का दौर है यह। इसी आपाधापी में विज्ञापन को सनसनीखेज खबर बना कर फैलाने वाला मीडिया ऐलान तो बहुत करता है, लेकिन लोक का कल्याण कितना करता है। इन विज्ञापनों की होड़ में दम तोड़ती खबरें… शर्म से झुकती भी नहीं हैं उनकी नजरें। उनकी नजरों में जो नजारे हैं, वे किसके सहारे हैं! वही तो जो राजनीति का मठ है और वही सेठ है। उनके आपस में रिश्ते और नाते भी हैं। अंदर की कुछ और बातें भी हैं। कभी-कभी बाहर भी आ जाती हैं जो अंदर में आजादी है। लोक को लूटने की, तंत्र को तोड़ने की। फिर हम दुखी होते हैं जब यह सब समझ में नहीं आता।साधारण आदमी क्या है और उसका इस लोकतंत्र में क्या काम है- वोट देना और पांच साल के लिए सब भूल जाना। कितना हिस्सा है वह सरकारी योजनाओं या परियोजनाओं का, जिसमें कमीशन कोई और खा-पी जाता है परियोजनाओं का। जैसे कुछ भेड़ों की भीड़ है। जिधर हांक दो उधर ही दौड़ने लगते हैं। चाहे राजतंत्र हो या फिर गणतंत्र। उसे तो हर हाल में बलि का बकरा ही बनना है, क्योंकि पैसे से सब कुछ बिकने लगा है। राजतंत्र से लेकर लोकतंत्र और यहां तक कि समाजवाद का सच दिखने लगा है।

जो लोकतंत्र है ‘जनता के लिए’ उसमें जनता तरसती है न्याय के लिए। न्याय इतना महंगा है। यों हर चीज महंगी है। न्याय की इतनी लंबी प्रक्रिया है कि लगता है टालमटोल ही उसकी प्रतिक्रिया है। जिस देश का पूर्व मुख्य न्यायाधीश रोता हो, वहां न्याय तो किसके भरोसे होगा, यह समझना मुश्किल नहीं है। लोकतंत्र के खम्भे अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए संविधान का खयाल रखना जरूरी नहीं समझ रहे हैं। जिनके पास अपना माध्यम है, वे लोग तो अपना पक्ष सबके सामने रख लेते हैं। लेकिन आमतौर पर जनता का पक्ष छोड़ देते हैं। इसी तिकड़मबाजी में चोर अपना वेश बदल लेता है।छोटे-छोटे कामों के लिए भी नेताओं से सिफारिश करवानी पड़ती है। हुकुम तामील हो, इसके लिए अधिकारियों को ‘चढ़ावा’ चढ़ाना पड़ता है। तब सोचना पड़ता है कि क्या ‘जनता के लिए’ यही है! धर्म, जाति या फिर गाय की रक्षा के नाम पर, गाय चोरी के नाम पर, बच्चा चोरी का शोर मचा कर लोग किसी को भी मार सकते हैं। कोई कुछ नहीं बोलेगा। न सिपाही रोकेगा, न पत्रकार टोकेगा। हमारे इस लोकतंत्र का चेहरा यही है। क्या अब वह समाज और उसका व्यवहार भी जर्जर हो चुका है, जिस पर विश्वास के लिए लोग ईमान रखते थे? एक दूसरे से जान-पहचान एक सामान्य व्यवस्था थी और भाईचारे के लिए सब हथेली पर जान रखते थे। बहरहाल, अपने घर से पटना जाते हुए वैशाली से गुजरते वक्त मन में बार-बार सवाल उठता है कि क्या सच में लोकतंत्र यहीं जन्मा है! भारत को लोकतंत्र की धरती कहा जाता है। फिर इस लोकतंत्र में इतने रोगाणु, विषाणु, जीवाणु कहां, कब और कैसे आ गए!

 

 

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