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दुनिया मेरे आगे- बेतुकी बहसें

सोशल मीडिया के खेल निराले हैं। यहां कब कौन-सा मुद्दा गेंद की तरह हवा में उछल कर वायरल हो जाए, कोई नहीं जानता। वायरल होते ही उस मुद्दे को सोशल मीडिया पर तब तक भुनाया जाता है, जब तक उसका दम नहीं निकल जाता। कमाल यह है कि सोशल मीडिया पर कोई मसला लंबा नहीं चलता।

Author November 8, 2017 5:40 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर। (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

अंशुमाली रस्तोगी 

सोशल मीडिया के खेल निराले हैं। यहां कब कौन-सा मुद्दा गेंद की तरह हवा में उछल कर वायरल हो जाए, कोई नहीं जानता। वायरल होते ही उस मुद्दे को सोशल मीडिया पर तब तक भुनाया जाता है, जब तक उसका दम नहीं निकल जाता। कमाल यह है कि सोशल मीडिया पर कोई मसला लंबा नहीं चलता। लेकिन जिस गति के साथ कुछ मुद्दे उठाए जाते हैं, उतनी ही तेजी से नीचे वे धड़ाम भी होते हैं। थोड़े ही समय में सब भूल जाते हैं कि क्या हुआ? कैसे हुआ? और फिर किसी अन्य मुद्दे पर बहस और विवाद शुरू हो जाता है। शुरुआती दौर में सोशल मीडिया को आपसी संवाद का एक अच्छा प्लेटफॉर्म माना-समझा गया था; (है यह आज भी अच्छा), लेकिन जैसे-जैसे यहां चलने वाले संवाद बेतुके विवादों, निरर्थक बहसों और व्यक्तिगत चरित्रहनन की शक्ल अख्तियार करने लगे, बहुत लोगों ने इससे दूरी बनाना ही बेहतर समझा। कुछ तो अवसादग्रस्त भी हुए।  सही है कि लोगों की बदलती जीवनशैली के बरक्स सामाजिक मुद्दों में भी काफी तब्दीली आई है। लोगों की सोच का दायरा बढ़ा है। अक्सर ऐसे-ऐसे विषयों पर हमें चर्चा या बहस यहां होती हुई दिख जाती है, जिनके बारे में पहले खुल कर बात करना खराब माना जाता था। खासकर, महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर खुद महिलाएं ही मुस्तैदी से बोल रही हैं। यह सार्थक कदम है। तकलीफ तब अधिक होती है जब किसी जरूरी या सार्थक विषय को बेतुके विवाद का केंद्र बना कर निजी हमले शुरू हो जाते हैं। किसी को कोई भी ट्रोल करना शुरू कर देता है। भीड़ में इतनी सारी जबानें हैं कि किस-किस को रोका और टोका जाए! सोशल मीडिया पर किसी से असहमति रखने का मतलब है उससे या उसके चाहने वालों से लगभग पंगा ले लेना।

सोशल मीडिया पर उठने वाले कई ऐसे मुद्दे भी देखे गए हैं, जिन्हें सिर्फ सनसनी बनाने के लिए छेड़ा गया था। उसका मतलब न समाज से न किसी दूसरे सरोकार से था। विडंबना देखिए, ऐसे विषयों पर लगातार बहस करने के लिए लोगों के पास समय भी खूब होता है। नाक तक सिंदूर लगाने या न लगने पर जिस तरह की बहस सोशल मीडिया पर चली, उसने हमारी कथित प्रगतिशील सोच की कलई खोलकर रख दी है। दो धड़े खुल कर मैदान में आ गए। दोनों के बीच विकट बहस चलती रही। कोई नाक तक सिंदूर को खोखली परंपरा का अभिशाप बता रहा था तो कोई सम्मान करने की बात कहता रहा। बेहतर संवाद के लिए तर्क दोनों के पास नहीं थे। फिर भी बहस-विवाद जारी रहा। देखा जाए तो सिंदूर लगाना न लगाना स्त्री का नितांत निजी मसला है मगर बेसिर-पैर की बहसों में अपना समय खपाने वाले कहां ऐसा सोचते हैं! ‘मी टू’ और ‘साड़ी स्वैग’ पर भी अच्छी-खासी बहस छिड़ी सोशल मीडिया पर। ये मुद्दे एक तरह से स्त्री से अपनी पारंपरिक छवि को तोड़ने का ही आह्वान करते हैं। अपनी यौनेच्छा और शरीर की उन्मुक्तता को साहसिक तरीके से रखा जाता है। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसे तथाकथित ‘बोल्ड’ मुद्दे सोशल मीडिया से इतर स्त्री की बंद छवि को तोड़ने में सफल हो पाते हैं? क्या ये बातें या मसले उन स्त्रियों तक पहुंचे पाते हैं जो सोशल मीडिया का ककहरा तक नहीं जानतीं-समझतीं। चंद लोगों के बीच ऐसे विषय का सीमित रह जाना क्या बहस को निरर्थक नहीं बनाता? ऐसे मुद्दों की प्रासंगिकता ही क्या जो थोड़े वक्त के बाद खुद ही दफन हो जाएं।

सोशल मीडिया पर जल्दबाजी का बोलबाला है। इधर मुद्दा उछला नहीं, उधर किस्म-किस्म की प्रतिक्रियाएं शुरू। या तो मुद्दे पर सहमति रखो नहीं तो अभद्रता सहो। खासकर राजनीति, राष्ट्रवाद, महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर सोशल मीडिया पर गाली-गलौज अब आम बात हो गई है। ट्रोलरों की पूरी फौज तैयार रहती है अपने ‘शत्रुओं’ से निपटने के लिए। विचारों का यहां कोई महत्त्व नहीं। जैसे, स्मार्टफोन की लत हमारे दिमागों को कुंद किए जा रही है, कुछ-कुछ वैसा ही हाल सोशल मीडिया का भी होता जा रहा है। मुद्दाविहीन विषयों पर जबरदस्त लड़ाइयां होती हैं। हर कोई सोशल मीडिया के रास्ते क्रांति करने को बेकरार बैठा है, जमीनी संघर्ष सब भूल चुके हैं। बेतुके सवालों को छेड़ बस यही कोशिश रहती है कि ज्यादा से ज्यादा लाइक और कमेंट पाए जा सकें। बाकी समाज और आम इंसान के हितों से जुड़ी चिंताओं से किसी को कोई मतलब नहीं। ऐसी भेड़चाल हमें किस अंधे कुएं में धकेल रही है, किसी को इसकी फिक्र नहीं। समय-असमय उठने वाले सिंदूर-साड़ी जैसे बिंदु ही सामाजिक जागरूकता के प्रतीक होते जा रहे हैं! जबकि इसमें सनसनी के अलावा कुछ भी विशेष नहीं रहता। कभी-कभी तो सोशल मीडिया पर झूठ और सच का तगड़ा घालमेल रहता है। इंतजार करें, सोशल मीडिया का आने वाला दौर जाने क्या-क्या और किन-किन सनसनीखेज बहसों और मुद्दों को लेकर आएगा।

 

 

 

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