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रोज बदलते समाज के मूल्यों के बीच अच्छे और बुरे की परिभाषा भी तेजी से बदलती जा रही है। शुचिता एक नया अर्थ पा चुकी है- ‘अपनों’ के हर कृत्य और कथन का अंध समर्थन।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

रोज बदलते समाज के मूल्यों के बीच अच्छे और बुरे की परिभाषा भी तेजी से बदलती जा रही है। शुचिता एक नया अर्थ पा चुकी है- ‘अपनों’ के हर कृत्य और कथन का अंध समर्थन। इसमें ‘अपनों’ की करनी का औचित्य ठहराया जाता है प्रतिपक्ष के कारनामों की फेहरिस्त पेश करके। इस संकुचित प्रतिबद्धता के चलते प्रेमचंद के जुम्मन शेख और अलगू चौधरी जैसे अब पंच परमेश्वर का किरदार नहीं निभाते। ‘अपने बंदे’ की सफाई में कुछ भी कर गुजरने में कोई झिझक नहीं, भले ही वह बहुत गलत हो। इसे बिना हिचक के प्रदर्शित करने में शायद ही कोई पीछे है। यह कितना सही है या कोई इस पर क्या सोचता-कहता है, इसकी कोई फिक्र नहीं। पिछले दिनों जापान में जिस अफसोसनाक एकजुटता और प्रतिबद्धता का नमूना देखा, वह आहत कर गया। हम सत्ताईस लोग साथ थे। पहले से एक दूसरे से अपरिचित थे, इसलिए हमारा आपसी परिचय हमारी जापानी गाइड युओमी ने कराया। उसने सलाह दी कि हम भारत के विभिन्न हिस्सों से आए हुए लोग बस के अंदर रोज अपनी सीटें बदल-बदल कर बैठें तो अपने साथ बैठे व्यक्ति को अच्छी तरह से जान लेंगे।

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अगले दिन से बस में हमें रोज नए साथियों की बगल में बैठते देख कर युओमी ताड़ नहीं सकीं कि उस नए समीकरण में भी एक प्रांत विशेष के, एक मातृभाषा वाले आठ लोगों ने सीटें बदल कर भी ‘अपनों’ के पास बैठने की होशियारी दिखाई थी। जो एकाध ‘अपनों’ से थोड़ा दूर बैठे, उन्होंने चलती बस में दो-चार कतारों के ऊपर तेज आवाज में अपनी मातृभाषा को उछाल कर आपसी संपर्क बनाए रखा। शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक हिसाब से सभी लोग समान स्तर के थे, लेकिन राजनीतिक चैतन्यता, अपनी सांस्कृतिक धरोहर और मातृभाषा के प्रति अति-लगाव इन कुछ लोगों की पहचान थी। हिंदी, अंग्रेजी वे जानते थे, लेकिन अपने प्रांत के प्रति उनका लगाव उनकी भाषा के आवरण में लिपट कर हमेशा जीवंत रहा। कोई सुंदर नजारा, स्थल या सांस्कृतिक धरोहर दिखाते हुए युओमी को इनसे बार-बार अनुरोध करना पड़ता था कि वे आपस में जोर से बोलना बंद करके कुछ उसकी भी सुन लें।जापान के इतिहास, भूगोल, संस्कृति और समाज के विषय में युओमी का सामान्य ज्ञान विशद था।

उसके होंठों पर सदा खिलती हुई मुस्कान उसकी पहचान थी। लेकिन इतनी मृदु और सौम्य गाइड हमें अकेले नहीं संभाल पाएगी, शायद इसलिए युओमी के अलावा अनुभवी और परिपक्व डायरेक्टर अन्ना परेरा भी थीं, जिन्हें अनुशासन में ढीले भारतीय सैलानियों से निपटना खूब आता था। अन्ना ने पहले दिन ही समय की पाबंदी की हिदायत देकर कहा था कि आदतन देर से आने वाले सैलानियों को छोड़ कर बस चला देने में वह सकुचाएंगी नहीं। फिर स्कूली बच्चों जैसा उन्होंने हमें समझाया कि हम सिवाय कूड़ेदानों के अन्यत्र पन्नी, रैपर आदि न फेंकें, हरी बत्ती के बिना सड़क पैदल न पार करें, शोर न मचाएं (कम से कम अन्य लोगों की उपस्थिति में), खाने की मेज पर थोड़ा धैर्य दिखाएं और आम जापानियों की तरह सबसे सौजन्य और नम्रता से पेश आएं। लेकिन हमारे आठ साथी अन्ना के अनुरोध को हवा में उड़ाते रहे। जोर-जोर से राजनीतिक बहसों में उलझ कर अन्य लोगों की असुविधा से बेखबर, वे समय की पाबंदी को एक कमजोरी समझते रहे। छह दिनों तक अत्याचार सहने के बाद अन्ना ने अंतिम दिन उन्हें सबक पढ़ाने की सोची। कहा- ‘रात में भारतीय रेस्टोरेंट में भोजन के बाद हम ओसाका के अपने होटल लौटेंगे। ठीक नौ बजे बस में वापस नहीं पहुंचने वालों की प्रतीक्षा नहीं की जाएगी।’ नौ बजने में पांच मिनट पर अन्य सब आ गए, तब इस टोली के सदस्यों ने आना शुरू किया। अगले पंद्रह-बीस मिनटों में सात आए, लेकिन आठवां लापता था। अन्ना ने नौ बीस तक प्रतीक्षा की, फिर बस को चलने का आदेश दिया। इस पर सात एकजुट आवाजें उठीं कि रात में एक अनजान शहर में किसी प्रौढ़ व्यक्ति को अकेले छोड़ना क्रूरता थी। अन्ना ने सुझाया कि जो रुकना चाहें बस से, वे उतर सकते हैं। उतरा कोई नहीं, पर गुर्राते सब रहे।

अगली सुबह अन्ना ने बताया कि वे महाशय रात एक घंटे के बाद टैक्सी से लौटे। खुदरा पैसे नहीं थे, इसलिए अन्ना से पंद्रह सौ येन टैक्सी वाले को दिलवा कर सुबह चुकाने का वादा किया। लेकिन सुबह उन्होंने गर्व से कहा कि अन्ना को अपनी करनी की सजा भुगतनी चाहिए और उधार लौटाने से मना कर दिया। हम सबने उनकी भर्त्सना की, फिर चंदा करके अन्ना की भरपाई करने की सोची, जिसे स्वाभिमानी अन्ना ने ठुकरा दिया। उधर आठ कंठों से एकजुट आवाज आई कि भारत लौट कर अन्ना की शिकायत करके वे कंपनी से अन्ना को बर्खास्त कराएंगे। उन सबकी एकजुटता और प्रतिबद्धता ने हमें अवाक कर दिया। युओमी मुस्कराती रही। शायद केवल उसके लिए इसमें नया कुछ नहीं था।

 

 

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