तराजू पर भरोसा

आमतौर पर पत्रकारिता या मीडिया के लिए टिप्पणी की जाती है कि अब उसकी विश्वसनीयता घट गई है।

सोशल मीडिया।

इन दिनों भरोसा तराजू पर है। उसका सौदा-सुलह हो रहा है। तराजू पर रख कर उसका वजन नापा जा रहा है। भरोसा कम है या ज्यादा, इस पर विमर्श चल रहा है। यह सच है कि तराजू का काम है तौलना और उसके पलड़े पर जो भी रखा जाएगा, वह तौल कर बता देगा। लेकिन तराजू के पलड़े पर रखी चीज का मोल क्या होगा, यह हमें तय करना है। अब सवाल यह है कि क्या सभी चीजों को तराजू पर तौलने के लिए रखा जा सकता है? क्या भावनाओं का कोई मोल होता है? शायद नहीं। इनका न तो कोई मोल होता है और न कोई तौल। तराजू पर रखने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता है। भावना, विचार और इससे आगे विश्वास। ये सभी चीजें शाश्वत हैं। इनका कोई मोल या तोल नहीं है। इन सबका अस्तित्व है या नहीं है। यह कम या ज्यादा भी नहीं हो सकता है। भावना किसी के प्रति आपकी अच्छी या बुरी हो सकती है, लेकिन कम या ज्यादा कैसे होगी? विचार सकारात्मक हो सकते हैं, लेकिन इसे तौलेंगे कैसे? ऐसा ही एक शाश्वत शब्द है भरोसा। किसी व्यक्ति पर हमको भरोसा होगा तो पूर्ण होगा और नहीं होगा तो शून्य होगा। किसी पर हम भरोसा करते भी नहीं हैं और कहते हैं कि उस पर मेरा भरोसा कम हो गया। जब भरोसा ही नहीं रहा तो कम या ज्यादा का प्रश्न कहां से उत्पन्न होता है!

इन दिनों समाज में पत्रकारिता की विश्वसनीयता चर्चा में है। आमतौर पर पत्रकारिता या मीडिया के लिए टिप्पणी की जाती है कि अब उसकी विश्वसनीयता घट गई है। इस वाक्य को संजीदा होकर समझने की कोशिश किया जाए तो पता चलेगा कि मीडिया पर अविश्वास करते हुए भी कहा जा रहा है कि भरोसा घटा है, समाप्त नहीं हुआ है। दरअसल, मीडिया पर समाज का विश्वास कभी खत्म नहीं होता है, क्योंकि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की मान्यता प्राप्त इस संस्था की पहली जिम्मेदारी सामाजिक सरोकार की होती है। सत्ता, शासन और अदालत तक आम आदमी की तकलीफ को ले जाना और अवगत कराना मीडिया की जवाबदेही है। जब मीडिया अपनी जवाबदेही से पीछे नहीं हटता है तो समाज का उस पर भरोसा घट नहीं सकता है। हां, मीडिया पर समाज का भरोसा समाप्त हो सकता है। शून्य के स्तर पर जा सकता है, जब मीडिया अपनी जवाबदेही को भूल जाए। इस पर समाज के भरोसे को किसी तराजू में नहीं तौल सकते हैं, क्योंकि भरोसे का कोई मोल नहीं है।

इस समय हम सोशल मीडिया के भरोसे बेपनाह अपने विचार जाहिर कर रहे हैं। अभी सोशल मीडिया के एक साथी ने अपनी बात साझा की कि लेखकों को जनसंपर्क करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे एकाग्रता भंग होती है। इस बात में बहुत ज्यादा दम नहीं है, क्योंकि जब हम लेखक होते हैं तो हमें सिर्फ वही सूझता है, वही दिखता है और हम वही लिखते हैं जो हमारे मन को विचलित करती हैं। हमारा लिखा किसी के भरोसे को बढ़ाता होगा तो किसी के भरोसे को तोड़ता भी होगा। लेकिन यह अलग बात है। इस महादेश में अपनी बात पहुंचाने के लिए जनसंपर्क बढ़ाना जरूरी है और इससे बचना मुश्किल-सा है। हालांकि इसका समाधान भी है कि हम अपनी सहूलियत और जरूरत के मुताबिक जनसंपर्क कर सकते हैं। यहां तो जनसंपर्क को तराजू पर तौला जा सकता है और कीमत के स्थान पर इस बात का आकलन कर सकते हैं कि कब और कितना जनसंपर्क कैसे और कितना लाभदायी होगा। लेकिन लेखन में जो बात होगी, वह भरोसे की होगी। इसे हम तराजू पर नहीं तौल सकते हैं।

अक्सर साथियों से बात होती है, तब वे भी भरोसे के शाश्वत सत्य की अनदेखी कर जाते हैं। मीडिया के बड़े-बड़े मंचों पर दिग्गज पत्रकार भी इस बात को भूल जाते हैं कि भरोसा शाश्वत सत्य है। और जो शाश्वत है, उसे पाया जा सकता है या खोया जा सकता है। खोकर अपने पास नहीं रखा जा सकता और न पाकर उसे खोने का स्वांग किया जा सकता है। भरोसा टूटने का अर्थ रिश्तों पर पूर्ण-विराम लगना है और भरोसा पाने का अर्थ रिश्तों और गहराई को नापना है। भावना, विचार और भरोसा अमूर्त हैं। इसका कोई मोल नहीं। यह एक तरह से पानी की तरह है जो रहेगा हमारे साथ और टूटा तो भाप बन कर आसमान में विलीन हो जाएगा। यकीन मानिए, भरोसा बने रहने के लिए है या टूटने के लिए। हमारे चाल, चरित्र और व्यवहार पर निर्भर करता है कि हम भरोसे के लायक हैं या नहीं। लेकिन हम पर कम या ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता है। भरोसा अपने आप में पूर्ण है, उसे तराजू में तौलने की जरूरत नहीं है।

 

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