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दुनिया मेरे आगेः बड़े हो गए बच्चे

मेरे एक परिचित बता रहे थे कि हमारा बेटा आजकल पता नहीं कहां रहता है... हमें कुछ समझ नहीं आ रहा! हर समय चुप-चुप रहता है। कुछ पूछते हैं तो कुछ बताता नहीं, बल्कि नाराज हो जाता है मुझसे। पता नहीं अपनी कौन-सी दुनिया में खोया रहता है?

Author Updated: February 12, 2020 2:44 AM
प्रतीकात्मक तस्वीक (फोटो-pixabay.com)

विप्रम

छोटे बच्चे जब बड़ों की तरह व्यवहार करते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है। उन्हें देख कर लगता है कि वे बड़े हो गए हैं। इसके विपरीत बड़े बच्चे जब छोटे बच्चों की तरह कुछ हरकत करते हैं तो घर के ही नहीं, बाहर के लोगों का अचंभित हो जाना कोई बड़ी बात नहीं। बल्कि एक प्रश्न चिह्न भी खड़ा हो जाता है। आखिर यह सब क्यों और किसलिए? मैं यहां उन बड़े बच्चों की बात कर रहा हूं जो कहते कुछ नहीं, पर करते अपने मन की हैं। मन में इनके क्या कुछ चल रहा होता है, उसे बताए बिना वे सब कुछ कर देना चाहते हैं। फिर चाहते हैं कि इसकी खबर किसी को न हो। कोई कुछ पूछे नहीं। अगर कोई पूछता है तो इनका सीधा उत्तर होता है- ‘कुछ नहीं… कुछ भी तो नहीं’। जबकि कुछ तो अवश्य चल रहा होता है इन बड़े बच्चों के दिमाग में! पर ये बच्चे बताना नहीं चाहते। बताने में हो सकता है कि अपनी तौहीन समझते हों। मन ही मन न जाने किसके कहने पर या किसी से नाराज होकर ये बच्चे क्या कुछ पाल लेते हैं, जिसे किसी को बताने में संकोच करते हैं। हो सकता है अपने को लज्जित भी समझते हों।

मेरे एक परिचित बता रहे थे कि हमारा बेटा आजकल पता नहीं कहां रहता है… हमें कुछ समझ नहीं आ रहा! हर समय चुप-चुप रहता है। कुछ पूछते हैं तो कुछ बताता नहीं, बल्कि नाराज हो जाता है मुझसे। पता नहीं अपनी कौन-सी दुनिया में खोया रहता है? कहीं चाणक्य के नाम से यह लिखा हुआ पढ़ा था कि जो व्यक्ति सदा चुप-चुप रहता हो… किसी से कुछ कहता न हो… किसी के संग-साथ उठता बैठता न हो… तब पहले उसकी चुप्पी तोड़ी जानी चाहिए। पूछना चाहिए कि वह आखिर चाहता क्या है।

दरअसल, चुप रहने वाला बहुत ही घातक हो सकता है। भावावेश में वह कुछ भी कर सकता है। कइयों को अपनी इहलीला खत्म करते हुए देखा गया है। अपनी मन:स्थिति में वह भूल जाता है कि उसके पीछे माता-पिता, भाई-बहनों का क्या होगा! मेरे एक साहित्यकार मित्र ने मुझे बताया था कि उनकी बड़ी बेटी किसी से ज्यादा बात नहीं करती। वह अपने आपको आमतौर पर खुद में सीमित रखती है। वह एक दिन एक पुस्तक मेरी ओर बढ़ाती हुई बोली- ‘पापा, ये मैंने लिखी है… मेरी कविताओं का संकलन है ये। नाम है अपने घेरों में’। साहित्यकार मित्र तब चौंके ते। लेकिन उन्होंने वह पुस्तक मुझे देते हुए कहा कि भाई साहब, आप कृपा कर इसकी अच्छी-सी समीक्षा लिखिएगा। मैंने उसे उलट-पलट कर देखा और शुरुआती पृष्ठ पढ़े। मैं बहुत चकित था। अपने साहित्यिक पिता के लिए कवयित्री बेटी ने कहीं भी कोई जिक्र नहीं किया था। मेरे मन में यही विचार कौंध रहा है कि उनकी बेटी ने आखिर ऐसा क्यों किया होगा! क्या उसे अपने पिता से कोई शिकायत थी या फिर क्या वह चुपचाप अपने में सिमटी अचानक बड़ा बनना चाहती थी! इसकी वजह उसकी चुप्पी में छिपी रही होगी, लेकिन समय रहते उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

मेरे एक पड़ोसी बता रहे थे कि कोने वाले फ्लैट की माताजी का जो दोहता आया हुआ था, वापस कनाडा चला गया। मैंने सोचा कि इसमें नया क्या है। मुझे चुप देख कर वे बोले- ‘वह अपनी नानी को लेने आया था। उन्हें पालम हवाईअड्डे पर भी ले गया था। बेचारी माता जी सुबह से शाम तक उसका इंतजार करती रह गईं। पर दोहिता न लौटा। पुलिस की छानबीन से भेद खुला कि लड़की का लड़का तो चुपचाप कनाडा के लिए निकल गया। टिकट लेकर आने का तो बहाना था। जब पुलिस माता जी को यहां कॉलोनी लाई तो पता चला कि लड़का तो फ्लैट भी बेच कर चला गया। यह सुन कर मैं सन्न रह गया। किसी ने सोचा कि इस बुजुर्ग महिला का क्या होगा!

बड़े बच्चे कुछ सोचते नहीं। इन्हें तो जो करना है तो करना है। हमारे एक संबंधी का बेटा है जो कभी स्थिरता से कुछ नहीं सोचता। एक बार मैंने उससे पूछा तब उसने बताया कि वह एक बिजनेस कर रहा है अपने एक दोस्त के साथ। कुछ दिनों बाद पता चला कि उसने कहीं और काम पकड़ लिया है। फिर कुछ समय बाद पता चला कि उसने वह काम छोड़ दिया है। अब अपने पापा को मना रहा है कि वह जो भी करगा अकेले ही करेगा। यहां बेटे का दिमाग किधर चल रहा है, पिता को कुछ पता नहीं। हालांकि पता तो तब चले, जब बच्चा कुछ बताए।

कभी कभी सोचता हूं कि ये बड़े बच्चे अपने मन में ऐसा क्या और क्यों एक गुस्सा-सा पाले फिरते हैं। कहीं-कहीं इसे गुस्सा न कह कर एक जुनून भी कह सकते हैं। बड़े बच्चे हो सकता है अपने बड़ों को अचानक कुछ नया दिखा देना चाहते हों। बस कोई इन्हें रोके नहीं,टोके नहीं। न ही इन्हें किसी की मदद चाहिए। फिर भी मेरे मन में है कि ये बच्चे कब होंगे बड़े!

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