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दुनिया मेरे आगे- यादों के मेले

मैं भी कुछ बच्चों के साथ खेल देखने लगा तो बचपन की यादें ताजा हो गर्इं कि किस तरह मदारी के कहने पर हम भी गोला बना कर बैठ जाते थे।

Author Published on: September 19, 2017 5:39 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

चांद खां रहमानी 

बचपन में जो चीजें मुझे बहुत आकर्षित करतीं थीं, उनमें मदारी का तमाशा, भालू का खेल, नटों की कलाबाजियां, संपेरे का नेवला और सांप की लड़ाई, स्वांग (नौटंकी) और मेला। शायद हर बच्चे को यह सब अच्छा लगता होगा। उस समय मनोरंजन के सस्ते और सुलभ साधन थे, जिनसे बच्चों का मन आसानी से खुश किया जाता था। स्वांग बड़ों का मनोरंजन ज्यादा करता था। खेल दिखाने वालों की कलाबाजियां लोगों को अचंभित करती थीं। दिल्ली में बसने के बाद अगर कहीं मदारी का मजमा दिखाई दिखा भी तो व्यस्तता के चलते रुक कर नहीं देख पाया। लेकिन हाल ही में कॉलोनी में घर के सामने मदारी आया और एक जगह बैठ कर खेल दिखाने लगा। मैं भी कुछ बच्चों के साथ खेल देखने लगा तो बचपन की यादें ताजा हो गर्इं कि किस तरह मदारी के कहने पर हम भी गोला बना कर बैठ जाते थे। मदारी अपनी डुगडुगी और बांसुरी बजाता हुआ मजमे के अंदर चक्कर लगाता था।

जब बच्चों के साथ महिलाओं और बाकी लोगों की भीड़ जमा हो जाती थी तो वह अपने एक बच्चे के साथ खेल शुरू कर देता था। जब मदारी के साथ कोई बच्चा नहीं होता था तो वह मजमे में बैठे लोगों में से किसी किशोर को जमूरा बना कर बैठा कर खेल शुरू करता था। वह अपने ‘जादुई’ थैले में से लकड़ी का छोटा डंडा निकाल कर जमीन पर रगड़ता था, फिर हाथ में थोड़ी मिट्टी उठा कर एक सिक्के का दो बना देता था। उस समय पांच या दस पैसे के सिक्के से कई सिक्के बना देना कितना कौतूहल पैदा करता था! उस समय मदारी या दूसरे खेल दिखाने वाले सबसे बड़ा सवाल एक रुपए का करते थे, कोई अमीर आदमी उनकी मांग को पूरा कर देता था। हम बच्चे अपने घर से एक कटोरी अनाज या आटा दे आते थे, क्योंकि तब लोगों के पास पैसे कम ही होते थे। तब ज्यादातर अनाज से ही लेन-देन होता था। आज सब काम पैसे से ही चलता है। हालांकि ‘कैशलेस’ के शोर में एक खबर यह भी आई थी कि एक इलाके में लोगों ने नकदी के अभाव में सामान के बदले सामान का लेन-देन शुरू कर दिया था।

खैर, मदारी चला गया, लेकिन यादों ने पीछा नहीं छोड़ा। जब गांव में किसी लड़की की शादी होती थी तो लड़की के अभिभावकों पर गांव के लोग यह दबाव देते थे कि वर पक्ष से कह कर बरात में स्वांग जरूर मंगाना। गरीब हो या अमीर, वधू पक्ष की इस मांग को देखते हुए वर पक्ष स्वांग की कंपनी या मंडली जरूर लाता था। उन दिनों बरात का आमतौर पर तीन दिन रुकना जरूरी था। इसलिए स्वांग लोगों के मनोरंजन का साधन था। रात होते ही फणीश्वरनाथ रेणु की मिट्टी के तेल से जलने वाली पंच ‘लाइटें’, जिन्हें स्थानीय बोली में ‘हंडा’ कहते थे, जलना शुरू होती थीं। स्वांग शुरू होने से एक घंटा पहले नगाड़ा बजना शुरू हो जाता था, ताकि दूसरे गांवों के लोग भी समय से देखने आ सकें। दिलचस्प है कि यह देखने के लिए लोग कई किलोमीटर दूर स्थित गांवों से भी चले आते थे।
इन परंपरागत मनोरंजनों को सिनेमा, क्रिकेट और शहरीकरण धीरे-धीरे निगलने लगे और अब ये शायद ही कहीं दिखते हैं। उस समय जादूगरों के कारनामे और सर्कस महंगे माने जाते थे क्योंकि इन पर टिकट लगती थी जिसमें पैसा खर्च होता था, जो था नहीं। दूसरे शहर या कस्बे में जाना पड़ता था।

देश ने तरक्की की तो शहरीकरण बढ़ा। लोग गांव छोड़ कर शहरों की तरफ दौड़ने लगे। यहां उन्हें गांव के मुकाबले ‘स्वर्ग’ दिखाई देने लगा। आज शहर में सिनेमा हॉल हैं, मल्टीप्लेक्स हैं, बहुमंजिला इमारतें हैं, चौड़ी सड़कें हैं, मॉल हैं, भीड़ है, सड़कों पर कारों, बसों और मोटरसाइकिलों का रेला है। लेकिन यहां स्वांग नहीं हैं, न कलाबाजों के खेल हैं, न मदारी। गांव जैसी झुग्गियां तो हैं, मगर उनमें गांव जैसा खुलापन और खुली हवा नहीं है। दिल्ली से सटे गाजियाबाद में मदारियों की एक छोटी-सी बस्ती है, लेकिन ज्यादातर मदारी इस परंपरागत काम को छोड़ चुके हैं या छोड़ रहे हैं। कुछ लोग अपने बच्चों को पढ़ा भी रहे हैं। दरअसल, शहरों में बच्चे अब मदारी का खेल देखने में कम दिलचस्पी लेते हैं। वे कंप्यूटर और मोबाइल के गेम में उलझ कर रह गए हैं। अब जमीनी और मूर्त मनोरंजन शायद किस्से-कहानियों में भी न मिलें।गांव के जिस छोटे मेले में दस-बारह रेहड़ियां होती थीं, जिन पर जलेबी, बिसातखाने के सामान, बच्चों के खिलौने, कुछ मौसमी फल, महिलाओं के शृंगार का सामान जैसी छोटी-मोटी चीजें होती थीं, उससे कहीं बहुत ज्यादा भीड़ आज दिल्ली में उसी तरह के दिखने वाले किसी भी साप्ताहिक बाजार में होती है। लेकिन इसमें घुटन और घबराहट महसूस होती है, जबकि गांव के मेलों में उल्लास, उत्साह और अपनापन लगता था।

 

 

 

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