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दुनिया मेरे आगे- दिखावे के दिवस

ज्यादा उम्र के लोग भी मात्र पैसा कमाने या उसे जोड़ने के नुस्खों में जुटे हैं। एक-दूसरे की होड़ में न जाने कितना पैसा बर्बाद कर देते हैं, लेकिन गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करने के लिए कोई होड़ दिखाई नहीं देती।

वुमेन्स डे किसी एक ग्रुप या संस्था तक सीमित नहीं है, यह सरकार, महिला संस्थानों और कारर्पोरेशन द्वारा मनाया जाता है।

हालांकि देश ने आजादी के बाद से ही तरक्की के नए-नए सोपानों को छुआ है, लेकिन देश विकासशील से विकसित होने की राह में निरंतर जूझ रहा है। विज्ञान के युग में नई-नई तकनीकों ने इंसान को सुविधाभोगी बनाया है, जिसमें सच्चाई अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है। ऐसे परिवेश में इस तथ्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि आज युवा पीढ़ी का अधिकतर हिस्सा भटकाव के रास्ते पर है। दुखद यह है कि वह सिर्फ मनोरंजन और सुविधा को अपने लिए जरूरी मानता है और इस क्रम में वह किसी गलत और अहितकर काम को अंजाम देने में नहीं हिचकता। युवा पीढ़ी सही और गलत का अंतर नहीं समझ पा रही है। ज्यादा उम्र के लोग भी मात्र पैसा कमाने या उसे जोड़ने के नुस्खों में जुटे हैं। एक-दूसरे की होड़ में न जाने कितना पैसा बर्बाद कर देते हैं, लेकिन गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करने के लिए कोई होड़ दिखाई नहीं देती। दिखावा, होड़, नकल, प्रतियोगिता के इस युग में सही गलत का आकलन करता कोई नहीं दिखता। आज लगभग हर व्यक्ति के हाथ में मोबइल जरूर मिल जाता है। समय के अभाव की दुहाई देने वाले भी मोबाइल पर अपनी अंगुलियों को नहीं रोक पाते। उन्हें मोबाइल के जरिए तुरंत अपनी जरूरतों के बारे में पता लग जाता है। दूसरा पहलू यह भी है कि लत लगने के कारण समय बर्बाद करने का मोबाइल एक बड़ा साधन भी बना है। अमूमन लोग भी किसी सामाजिक बुराई के खिलाफ इतने जागरूक नहीं दिखते, जितना चॉकलेट दिवस, वेलेंटाइन दिवस, किसी का जन्मदिन या अन्य दिवसों को लेकर उत्साहित दिखते हैं। लेकिन क्या कभी किसी को रोटी दिवस मनाते देखा गया है? क्या कभी मानवीयता दिवस मनाया जाता है? क्या किसी ने इस बात की पहल की है कि कोई ऐसा दिवस मनाया जाए, जो भूखे-प्यासे को रोटी खाने को मिल जाने की मांग का प्रतीक हो। अगर कोई भूख से व्याकुल होकर मरता है तो ऐसे में अमीर का चॉकलेट, गुलाब या वेलेंटाइन दिवस पर बेहताशा खर्च कर ये दिवस मनाना कितना बेमानी है!

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यह अजीब है कि जहां करोड़ों लोगों को भरपेट खाना नसीब नहीं होता, वहीं तरह-तरह के शौक में बेतहाशा खर्च किया जाता है। सच्चाई यह है कि अमीरी के प्रदर्शन या पाखंड भरे शौक पूरे करने वाला यह समाज आज भटक-सा गया है, जिसमें युवा पीढ़ी की भागीदारी सबसे ज्यादा है। वह केवल अपने शौक पूरा करने के लिए मनोरंजन के नाम पर मगन हो जाती है और भूल जाती हैं कि इस देश में ऐसे कितने भूखे लोग बैठे हैं, जिनके बारे अगर यह पीढ़ी सोचने लगे तो संवेदनशीलता को समझने की सार्थकता अधिक होगी। अगर हम गरीबों की परवाह नहीं कर पैसा बर्बाद कर अपनी खुशियां मनाते हैं तो हम अभाव में मरते लोगों के जीवन पर प्रहार करने के दोष से नहीं बच सकते। आज की युवा पीढ़ी जन्मदिन और शादी-विवाह आदि के जश्न को बिना शराब के नहीं मना पाती और उसे मनोरंजन के नाम पर तसल्ली तभी होती है, जब उनका सेवन किया जाए। नशा या मादक पदार्थों का सेवन, छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई कर बैठना, गुस्से की स्थिति में खुद को नियंत्रित नहीं कर पाना, बुजुर्गों का सम्मान नहीं करना, कई बार उन्हें घर से बेदखल कर देना, प्रेम में विफल होने पर लड़कियों पर तेजाब फेंकना या उनकी हत्या कर देना जैसे कितने ही उदाहरण हैं जो यह साबित करने के लिए काफी हैं कि समाज में मानवीय मूल्यों का हनन किस स्तर तक जा पहुंचा है।

अगर हम दिखावे के दिवसों का जश्न मनाने के बजाय मानवीय संवेदनाओं से प्रेरित दिवस मनाएं तो यह शायद सबके लिए ज्यादा अच्छा होगा। इसके लिए खासतौर से शिक्षक वर्ग और स्कूल-कॉलेज चलाने वाली संस्थाओं को आगे आना होगा। जरूरत इस बात की है कि बच्चों के अंदर अच्छी बातों और भावनाओं का विकास किया जाए। सामाजिक जड़ता और भेदभाव के बरक्स एक बराबरी पर आधारित समाज के लिए पहल की जाए। ऐसी स्थिति में बच्चों के भीतर मानवीय गुणों का विकास होगा। ‘सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा’ का भाव तभी अपनी वास्तविकता पर खुशी मना सकता है, जब हम इंसान को पेट भर भोजन, रोजगार, शिक्षा और न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधा देने का इंतजाम कर पाएं। अभी तो ये चीजें हमारे अभियान में भी शामिल नहीं हैं। अंधेरे की गर्त में जाता समाज क्या खुद को संभाल पाएगा और नई पहल करके बुराइयों को खत्म करने का बीड़ा उठा पाएगा, यह सवाल आज सामने एक चुनौती बन कर खड़ा है। देश में संसाधनों की प्रचुरता है। अगर बिना किसी के अधिकार छीने इनका यथोचित उपयोग हो तो देश से गरीबी का उन्मूलन किया जा सकता है। समाज से विषमता का उन्मूलन और कतार में बैठे अंतिम व्य्

 

 

 

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