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दुनिया मेरे आगे- झूठ के डेरे

हमारे संज्ञान में तब भी यह कभी नहीं आया था कि कोई बाबा किसी भव्य महलनुमा आश्रम में रहते होंगे, उनके लिए मरने या मारने वालों की पूरी की पूरी फौज तैयार रहती होगी।

Author September 6, 2017 5:32 AM
राम रहीम को बलात्‍कार व यौन शोषण के मामले में पहले ही बीस साल की जेल हो गई है।

ओम वर्मा

 

बाबा शब्द हमारे जीवन में दो बार प्रवेश करता है। पहली बार बाल्यकाल में और दूसरी बार बाल्यकाल के बाद। हमारे बाल मन में बाबा के नाम पर अक्सर ऐसे गूढ़ व्यक्तित्व की छवि स्थापित हो चुकी होती है जो न सिर्फ कुछ अलौकिक शक्तियों का स्वामी होता है, बल्कि माता-पिता के सामने अनावश्यक जिद करने वालों को ह्यपकड़ कर भी ले जा सकता है। मेरे जैसे कई तत्कालीन बच्चे बाहर बाबाओं को देख कर घर में छिप जाया करते थे। हालांकि बाबाओं को लेकर तब डर जरूर बना हुआ था, लेकिन हमारे संज्ञान में तब भी यह कभी नहीं आया था कि कोई बाबा किसी भव्य महलनुमा आश्रम में रहते होंगे, उनके लिए मरने या मारने वालों की पूरी की पूरी फौज तैयार रहती होगी, वे अन्य कोई खास यानी ऐसा काम भी करते हैं, जिसकी वजह से उन्हें जेल जाकर जमानत के लिए भी तरसना पड़ जाए या खुद न्यायपालिका को उनके लिए पीले चावल भिजवाने पड़ें।

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अब जाकर मुझे समझ में आया कि बड़े होने पर ही क्यों हमारे मुंह से यह निकलने लगता है कि बार-बार आती है मुझको, मधुर याद बचपन तेरी..!ह्ण शायद उसका एक कारण हमारे बालमन में बसा बाबाओं का वह रहस्यलोक भी हो! दरअसल, जीवन की रामायण में बालकांड के बाद के अध्यायों में बाबाओं की जो छवि बनती है, वह सर्वथा भिन्न है। वह एक ऐसी अवस्था होती है जब हम सीख और समझ कर चीजों और विचारों को ग्रहण कर रहे होते हैं। तब हमारे लिए ह्यबाबाह्ण नामक जातिवाचक संज्ञा के ध्वनित होते ही एक ऐसे दिव्य व्यक्तित्व का अक्स उभरने लगता है, जिसकी विशाल जटाएं, लंबी दाढ़ी, कपाल पर लंबा-चौड़ा तिलक और बड़े-बड़े सम्मोहक या आग्नेय नेत्र हों। उसे सत्य की खोज में निकला हुआ परिव्राजक या योगी माना जाता है, न कि असत्य या मिथ्या जगत के मायाजाल में उलझा हुआ कोई भोगी!

लेकिन जीवन के लंका कांड में हम देखते हैं कि जिसकी कृपा पाने के लिए शीश कटवाना भी मामूली कीमत समझते थे, उसने हमारी मासूम बच्चियों की अस्मिता और सम्मान का शीश पहले ही काट लिया है। जो हमें सिर्फ ईश्वर की शरण में जाने का उपदेश देता रहता था, वह ख्रुद ही बाउंसरों और कई कमांडो की शरण और उनके सुरक्षा घेरों में इधर-उधर विचरण करता है। जो हमें ज्ञान बांटता था कि हम हर पल ईश्वर की निगाह में हैं, वह हर पल हम पर गुप्त कैमरों से निगाह रखता रहा। वह हमें माया-मोह के बंधनों से मुक्त करवाते-करवाते खुद की माया का भंडार भरने लगता है और ह्यमारीचह्ण से बड़ा मायावी बन कर सामने आता है। वह हमें ह्यइंसांह्ण बनने की शिक्षा देते-देते खुद हैवान बन जाता है। जब उसके ह्यडेरेह्ण का पूरा ढांचा और उसकी कारीगरी सामने आती है तो उसके आगे डरावनी फिल्मों के दृश्य फीके लगने लगते हैं। बलात्कारियों में भी अब दो श्रेणियां साफ देखी जा सकती हैं। एक वे जिन्हें खोजने के लिए कुछ देशभक्त मोमबत्तियां जला कर अपना आक्रोश जाहिर करके दबाव बनाते हैं और दूसरे वे जिन्हें बचाने के लिए उनके भक्तगण गाड़ियां जला-जला कर अपना विरोध प्रकट करते हैं!

वक्त की जरूरत है कि इस बदनाम ह्यबाबागीरी को खारिज किया जाए और नई हीरोपंती गढ़ी जाए। क्यों न हम भी किसी फिल्म की कहानी की तरह अपने आसपास के जीवन से नायकों की खोज करें और कानून के दायरे में उनकी मदद लेकर व्यवस्था के अपराधियों का इलाज करें। ऐसे तमाम बाबा हैं जिनकी सारी संपत्ति दिल्ली जैसे छोटे राज्य का बजट बना सकती है। और तो और, जिंदा बाबा करोड़ का और मरा भी तो सवा करोड़ से कम का नहीं होता! तभी तो भक्तगण उसकी ह्यमिट्टीह्ण को बाबा के ह्यसमाधिस्थह्ण होने के भ्रम में मिट्टी में विलीन नहीं होने देते हैं। तो क्यों न ऐसे बाबाओं के आश्रम को गुप्त विद्याओं का अध्ययनपीठ यानी ह्यचेयरह्ण घोषित कर दिया जाए? जो अनुयायी बाबा के लिए लंबे समय तक पुलिस से लोहा ले सकते हैं, करोड़ों की संपत्ति तहस-नहस कर सकते हैं, क्या वे अपने बाबा के आह्वान पर सीमा पार से प्रवेश कर रहे घुसपैठियों से टक्कर नहीं ले सकते? बाबाओं के डेरों को नेस्तनाबूद करने के बजाय पर्यटन विभाग को देकर या होटल में बदल कर तो देखिए, माया का ढेर लग जाएगा! बाबा के आदेश पर ये अनुयायी अगर अपने इन्हीं हथियारों के साथ उग्रवादियों या आतंकवादियों से जा भिड़ें तो शायद उनका नामोनिशान मिट सकता है और कश्मीर जैसे कई इलाके सचमुच ह्यस्वर्गह्ण बन सकते हैं!

 

 

 

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