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दुनिया मेरे आगेः दिखावे का रोग

आजकल यातायात और पार्किंग की समस्या हर शहर में आम हो चुकी है। इसके पीछे सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है वाहनों की बढ़ती संख्या। इससे आगे बढ़ कर देखें तो वाहनों की संख्या का मूल कारण है दिखावे की मानसिकता।

Author Published on: April 4, 2019 3:16 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

विनय मोघे

आजकल यातायात और पार्किंग की समस्या हर शहर में आम हो चुकी है। इसके पीछे सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है वाहनों की बढ़ती संख्या। इससे आगे बढ़ कर देखें तो वाहनों की संख्या का मूल कारण है दिखावे की मानसिकता। हर व्यक्ति चाहता है कि उसके पास कार हो, भले ही उस व्यक्ति के लिए उसकी उतनी उपयोगिता न हो। लेकिन अगर उसके दोस्त या रिश्तेदारों के पास कार है तो उसके पास भी होनी ही चाहिए। मेरे एक मित्र हैं। मेरा मानना है कि उन्होंने भी सिर्फ दिखावे के लिए सबसे नए मॉडल की कार खरीदी है, जिसे वे कभी-कभार चलाते हैं। हालांकि हर किसी के लिए कार खरीदना इतना आसान भी नहीं है कि केवल दिखावे के लिए कोई अपनी लाखों की जमा पूंजी खर्च कर दे। मगर बैंक और फाइनेंस कंपनियों ने कार खरीदना सुलभ कर दिया है कि जिन्हें आवश्यकता नहीं है या जिनके पास महंगी कार खरीदने के लिए पर्याप्त धन नहीं है, वे भी दिखावे के लिए ही सही, कार खरीद लेते हैं। इसके बाद जब वे कर्ज की किस्तें नहीं चुका पाते, तब वित्तीय संस्था द्वारा ऐसी कारें जब्त कर बेच दी जाती हैं, जिसे फिर कोई व्यक्ति दिखावे के चक्कर में खरीद लेता है।

शायद लोगों की इसी भूख को देखते हुए आजकल अक्सर नए-नए मॉडल की कारें बाजार में आ रही हैं। जाहिर है, दिखावे का जोर यहां भी हावी है। बिल्कुल नए मॉडल की कार खरीदने के चक्कर में लोग पहले पुरानी कार को बेचने का जुगाड़ करते हैं। कई बार पुरानी कार की कीमत बहुत कम रखी जाती है। ऐसे में कोई न कोई ग्राहक मिल ही जाता है जो फिर इसे सड़क पर ले आता है। जो लोग किसी भी तरह नई कार खरीदने का दिखावे का शौक पूरा नहीं कर पाते, वे ऐसी पुरानी कारों को खरीद कर अपना शौक पूरा करते हैं। कहने का आशय यह है कि जरूरत हो या नहीं हो, नई हो या पुरानी, कुछ लोगों के लिए कार दिखाना जरूरी है।

आजकल त्योहारों पर नई कार लेने का नया चलन है। त्योहार के दिन किसी वाहन के शोरूम में वाहन खरीदने वालों की भीड़ देख कर लगेगा कि शायद वाहन मुफ्त में बांटे जा रहे हैं। इन तमाम ग्राहकों में बहुतायत में ऐसे होते हैं जो सिर्फ दिखावे के चक्कर में वाहन खरीद रहे होते हैं। त्योहार कोई भी हो, उसकी खुशियां तब तक पूरी नहीं मानी जातीं, जब तक नई कार घर के सामने न खड़ी हो। अब तो यह भी देखा जाता है कि एक ही परिवार में दो-तीन कारें होती हैं। परिवार के कुल जमा तीन सदस्यों के लिए तीन अलग-अलग कारें। कोई सदस्य एक दूसरे की कार का उपयोग नहीं करता, भले ही घर में धूल खाती पड़ी रहे।
मेरे एक मित्र हैं। उनके बेटे ने अपने जन्म दिन पर पहले तो अपने लिए मोटरसाइकिल की फरमाइश की, पर जब उसके मित्र ने अपने जन्मदिन पर कार खरीदी तो वह भी बाइक की जगह कार लेने की जिद पर अड़ गया जो उसके पिता ने पूरी की। दरअसल, दुपहिया और सार्वजानिक वाहनों का उपयोग करने वालों को आजकल हेय दृष्टि से देखा जाता है।

कई लोग ऐसी हेय दृष्टि से बचने के लिए भी कार खरीदने का दुस्साहस कर बैठते हैं। इनमें से कई बाद में पछताते भी हैं। दुपहिया वाहन या सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग करने में कोई हीन भाव नहीं होना चाहिए, बल्कि यातायात और पार्किंग की समस्या से बचने के लिए इसे बढ़ावा मिलना चाहिए। पर हमारे समाज में दिखावे का ज्यादा महत्त्व है, इसीलिए लोग यह कहने में शर्म महसूस करते हैं कि उनके पास कार नहीं है।

मेरे कहने का यह मतलब कतई नहीं है कि कार खरीदी ही न जाए। मेरा खयाल है कि कार तब खरीदी जाए जब उसकी वास्तव में उपयोगिता हो। आप या आपके परिवार का कोई सदस्य उसे चलाने वाला हो। अधिक दूरी तक आने-जाने के लिए उसका उपयोग होने वाला हो। हमेशा चलाए जाने वाले मार्ग पर यातायात जाम जैसी समस्या न हो। घर और अन्य जगहों पर पार्किंग के लिए पर्याप्त जगह हो। कई बार यह देखा जाता है कि लोग कार तो खरीद लेते हैं, लेकिन पार्किंग सड़क के किनारे करते हैं, क्योंकि घर में पर्याप्त जगह नहीं होती।

अब समय आ गया है कि हम वाहन खरीदते समय इस बात का ध्यान रखें कि कहीं हमारा वाहन हमारे शहर की यातायात समस्या को और बढ़ा तो नहीं देगा! कहीं हमारे वाहन से पार्किंग की समस्या में इजाफा तो नहीं होगा! क्या यह वाहन सचमुच में हमारी आवश्यकता है या कि सिर्फ दिखावे या किसी से बराबरी करने के लिए हम इसे खरीद रहे हैं! इस मामले में हम खुद अपनी समस्या का समाधान कर सकते हैं।

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