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दुनिया मेरे आगे: संकट का पाठ

सही है कि बच्चों की सुरक्षा के कारण स्कूल की इमारत को बंद रखना जरूरी है, लेकिन शिक्षा को बंद नहीं रखा जा सकता। अगर बच्चों को चार महीने शिक्षा से दूर रखा गया तो देश कई साल पीछे चला जाएगा। स्कूल में बच्चा सिर्फ पढ़ाई ही नहीं करता है, बल्कि वहां उसका शरीरिक-मानसिक और भावनात्मक विकास भी होता है।

घरों में ऑनलाइन पढ़ते बच्चे।

अमिता सक्सेना
दुनिया शायद अब तक के सबसे बड़े संकट से जूझ रही है। मौजूदा दौर की मारामारी ने हर किसी के जीवन में हलचल मचा दी है। इस पर महामारी ने जीवन की सहजता को पूरी तरह बाधित कर दिया है। भारत में इतनी अधिक आबादी है कि इसमें किसी नियम-कायदे को पूरी तरह से अमल में लाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। इसमें महामारी के संक्रमण को रोकने के मकसद से पूर्णबंदी लागू की गई और इसे कमोबेश कामयाबी के साथ अमल में भी लाया गया। हालांकि यह सच है कि जिस महामारी से हम जूझ रहे हैं, उससे लड़ने में मुख्य रूप से हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता की ही बड़ी भूमिका है। लेकिन असली चिंता बच्चों और बुजुर्गों की हो आती है।

इस मामले में ज्यादातर नागरिकों ने जागरूकता और सहजबोध की वजह से जरूरी सावधानी बरती है। लेकिन इसके समांतर दूसरी कई समस्याएं खड़ी हुई हैं। मसलन, आर्थिक गतिविधियां जिस बुरी तरह प्रभावित हुई हैं, उसमें बहुत सारे लोगों के सामने संकट और ऊहापोह की स्थिति पैदा कर दी है। एक तरफ नौकरी और उसकी तनख्वाह पर निर्भर लोगों की लाचारी यह है कि उनके सामने यह आश्वासन था कि नौकरी से नहीं निकाला जाएगा, वेतन नहीं रोका जाएगा, वहीं उनके साथ हुआ उल्टा। नौकरी गई, कई जगहों पर तनख्वाह नहीं मिली या कटौती की गई और किराए के घर तक छोड़ने की नौबत आ गई।

हालांकि कई मकान मालिकों ने कुछ हद तक किराए माफ भी किए। हमने पूर्णबंदी में अपनी घरेलू सहायिका को बिना उसकी सेवा लिए वेतन दिया। लेकिन हकीकत यह है कि बहुत सारी ऐसी महिलाओं की रोजी-रोटी चली गई है। हाल ही में एक खबर आई थी एक कारखाने में काम नहीं हुआ, मालिक की कमाई शून्य थी, फिर भी उसने सभी कर्मचारियों को आधा वेतन दिया। बाद में कर्मचारियों ने धरना दिया और पूरे वेतन के लिए हंगामा किया।

लेकिन इसका जो दूसरा असर शिक्षा जगत पर पड़़ा है, उसका कोई तार्किक समाधान कैसे होगा, यह लोगों के लिए समझना मुश्किल हो रहा है। खासतौर पर स्कूली शिक्षा पूरी तरह बाधित होती हुई दिख रही है। यों इसमें किए गए वैकल्पिक इंतजामों की वजह से स्कूल भले बंद हों, लेकिन शिक्षा को जारी रखने की कोशिश की गई है। स्कूल बंद होने पर बहुत सारे शिक्षकों को वेतन की चिंता प्राथमिक नहीं थी, बच्चों के भविष्य की चिंता उन्हें सता रही है।

हालांकि एक खासी तादाद वैसे बच्चों की है, जो आज लैपटॉप या स्मार्टफोन के साथ जीते हैं, लेकिन दूसरी ओर बहुत सारे शिक्षक भी ऐसे हैं, जिन्हें कंप्यूटर नहीं चलाना आता। उन सबके सामने चुनौती है आनलाइन कक्षाएं लेने की। सबने हार नहीं मानी और तकनीक को खुले दिल से सीखा। इस तरह फिलहाल जो सीमा है, उसमें पढ़ाई-लिखाई को जारी रखने की पूरी कोशिश की जा रही है। हालांकि कहीं-कहीं ये आवाजें भी उठ रही हैं कि स्कूल बंद हैं तो फीस नहीं ली जाए। यह तो विचार का विषय है, लेकिन सरकार का प्राथमिक दायित्व ठप पड़े स्कूलों की स्थिति के बावजूद बच्चों को शिक्षा मुहैया कराना होना चाहिए।

लेकिन इस स्थिति में कई प्रश्न विचार के लिए उपस्थित हो गए हैं। अब तक कक्षाओं में सामने बैठ कर पढ़ाई होती थी। बच्चे के भाव देख कर शिक्षक समझ जाते थे कि वह कितना समझा या अभी भी उसे संदेह है। कक्षा में एक शिक्षक चालीस बच्चों को एक साथ सिर्फ पढ़ाता ही नहीं है, बल्कि उनको भावनात्मक सुरक्षा भी देता है। अगर बच्चा बीमार हो तो शिक्षक मां बन कर उनका ध्यान रखता है। बच्चे अपने घर की समस्या को अपने माता-पिता को नहीं बता पाते, लेकिन शिक्षक को बता देते हैं। शिक्षक एक सलाहकार की भूमिका निभाते हैं और बच्चे की मदद करते हैं।

बच्चे स्कूल में साथी बच्चों से काफी सीखते हैं। कई बार कोई एकाध बच्चा सभी बच्चों के साथ तालमेल नहीं पाते, तो यह व्यक्तित्व पर बुरा असर डालता है। ऐसे में शिक्षक बच्चे को अंतमुर्खी होने से बचाते हैं। वह शिक्षक ही है जो बच्चे के गुणों को गुलाब की खुशबू की तरह फैला देते हैं और उसकी कमियों को दूर कर देता है या छिपा देता है। बच्चे की आंखें क्लास में कहीं भी हों, शिक्षक समझ लेते हैं कि उसके मन की आंखें क्या देख रही हैं!

सही है कि बच्चों की सुरक्षा के कारण स्कूल की इमारत को बंद रखना जरूरी है, लेकिन शिक्षा को बंद नहीं रखा जा सकता। अगर बच्चों को चार महीने शिक्षा से दूर रखा गया तो देश कई साल पीछे चला जाएगा। स्कूल में बच्चा सिर्फ पढ़ाई ही नहीं करता है, बल्कि वहां उसका शरीरिक-मानसिक और भावनात्मक विकास भी होता है। कई बच्चों का कहना है कि वे स्कूल आने को तड़प रहे हैं। बच्चों को बताने की जरूरत है कि स्कूलों की बंदी तात्कालिक है और उनकी सुरक्षा के मद्देनजर ही है। हम सब यही चाहते हैं कि सब कुछ जल्दी सहज हो और स्कूली शिक्षा फिर से रोशन हो।

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